बहुत गर्म और कठोर होता है राजनीतिक यथार्थ का धरातल

गोपाल कांडा के दूषित चरित्र के कलंकित अतीत का बचाव किसी भी तर्क द्वारा सम्भव नहीं है।

लेकिन क्या यह सच नहीं है कि गोपाल कांडा मात्र एक व्यक्ति नहीं, बल्कि ऐसी राजनीतिक विकृति है जिसने पिछले 4-5 दशकों के दौरान हमारे लोकतंत्र की जड़ों तक अपनी गहरी पकड़ और पैठ बना ली है।

सच यह भी है कि किसी भी सभ्य समाज के स्वस्थ लोकतंत्र की कोख से जन्मी किसी सरकार में गोपाल कांडा सरीखी किसी भी विकृति का कोई स्थान नहीं हो सकता। लेकिन क्या सिर्फ इतना कह कर पल्ला झाड़ा जा सकता है?

परम राजनीतिक ज्ञान-ध्यान की उपरोक्त चरम अभिव्यक्ति से पहले यह भी जानना जरूरी है कि…

मीडियाई गुलाबो-सिताबो सरीखी न्यूज़चैनली एंकरों को भले ही याद ना हो लेकिन मैं नहीं भूला हूं कि मई 1996 में राजनीति को ऐसी ही विकृतियों से बचाने का प्रयास करते हुए अटल जी ने यह कहकर केवल 13 दिन पुरानी अपनी सरकार गिरा दी थी कि, “ऐसा नहीं है कि मंडी में माल नहीं था और वह बिकने को तैयार नहीं था। लेकिन हमने वो माल नहीं खरीदा, हमने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।”

लेकिन अटल जी के उस सिद्धान्तपरक राजनीतिक त्याग और बलिदान का परिणाम यह हुआ था कि उनकी सरकार गिरा कर जो सरकार बनाई गई थी, उस सरकार को वो कुख्यात डकैत फूलन देवी भी समर्थन दे रही थी जिसने एक पंक्ति में खड़ा कर के 19 नौजवान राजपूतों को जातीय विद्वेष में गोलियों से भूनकर मौत के घाट उतार दिया था। दर्जनों अन्य हत्याकांडों में भी फूलनदेवी नामजद थी।

उस सरकार को वो लालू यादव भी समर्थन दे रहा था जो चारा घोटाले में आकंठ लिप्त होने के कारण जगकुख्यात हो चुका था। ऐसे और भी दर्जनों कुख्यात नाम थे जो उस सरकार के तारणहार समर्थक की भूमिका में थे।

अपने सिद्धान्तपरक राजनीतिक त्याग और बलिदान के ऐसे शर्मनाक हश्र से अटल जी ने कठोर और कड़ुआ सबक सीखा था। यही कारण है कि 1998 में जब उन्हें अवसर मिला था तो उन्होंने राजनीति की मंडी के माल की खरीदारी में कोई हिचक नहीं दिखाई थी।

उनका वह निर्णय भारतीय राजनीति का एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। आज केन्द्र में भाजपा की मोदी सरकार की नींव का पहला पत्थर अटल जी के उसी निर्णय के कारण भारतीय राजनीति में आए निर्णायक मोड़ ने ही रखा था।

जब उपरोक्त घटनाक्रम घट रहा था उस समय वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी और वर्तमान गृहमंत्री अमित शाह राजनीति के विद्यार्थी की भांति उस घटनाक्रम को गम्भीरता के साथ करीब से देख सुन और समझ रहे थे।

यही कारण है कि गोपाल कांडा सरीखी राजनीतिक विकृतियों से राजनीतिक दूरी या निकटता से होने वाले दूरगामी ‘हानि-लाभ’ का पाठ वो मीडियाई “गुलाबो-सिताबो” की जोड़ियों से नहीं पढ़ते सीखते। क्योंकि राजनीतिक यथार्थ का धरातल न्यूज़चैनली हवाई घोड़ो की सवारी की तरह सरल सहज सुखद नहीं होता। इसके बजाय राजनीतिक यथार्थ का धरातल बहुत गर्म और कठोर होता है।

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