राष्ट्र को तीव्र विकास के पथ पर ले जाएगा ‘मोदी प्लान’

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी यूरोप की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गयी थी। उनकी टूटी अर्थव्यवस्था से अमेरिका को चिंता हो गयी कि सोवियत साम्यवादी विचारधारा इस क्षेत्र को अपनी जकड़ में ले लेगा। आखिरकार, साम्यवाद पूर्वी जर्मनी (एक समय ऐसा भी राष्ट्र था – साम्यवाद की विफलता के बाद इसका विलय बाद में पश्चिमी जर्मनी में हो गया जो आज का जर्मनी है) तक आ चुका था।

साम्यवाद के दुष्प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका ने पश्चिमी यूरोप में इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचा) के निर्माण के लिए आज की मुद्रा के अनुसार नौ लाख करोड़ रुपये (120 बिलियन डॉलर) झोंक दी थे। इस विशाल मदद का प्लान तात्कालिक अमेरिकी विदेश मंत्री जॉर्ज मार्शल ने बनाया था; अतः उनके नाम पर इसे ‘मार्शल प्लान’ कहा गया।

इंफ्रास्ट्रक्चर में पैसा इसलिए झोंका गया क्योकि इंफ्रास्ट्रक्चर (रेल, हवाई अड्डा, बंदरगाह, हाईवे, बिजली, संयंत्र इत्यादि) और भवनों के निर्माण से नागरिकोण को रोज़गार मिला; कई अन्य सहायक उद्योगों जैसे कि स्टील, सीमेंट, कार, रेस्टोरेंट, होटल, पर्यटन को भी बढ़ावा मिला। साथ ही, इस निर्माण ने यूरोप में अमेरिकी वस्तुओं के लिए बाज़ार स्थापित कर दिया।

मार्शल प्लान इतना सफल हुआ कि चार वर्षो के अंदर पश्चिमी यूरोप की अर्थव्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध पूर्व वाली स्थिति से भी सुदृढ़ हो गयी और इस प्लान को समाप्त कर दिया गया।

समृद्धि और रोज़गार का यही मार्ग जापान, कोरिया और 20 वर्ष पहले चीन ने अपनाया था। इन सभी राष्ट्रों ने ओलम्पिक खेलों के आयोजन से भी विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया।

भारत में अर्बन नक्सल और काँग्रेसी शाही परिवार, मोदी सरकार के द्वारा प्लान की जाने वाली और चलायी जा रही इंफ्रास्ट्रक्चर और भवन निर्माण योजना की भारी आलोचना कर रहा है। कोरोना वायरस के प्रकोप की आड़ में, निर्धनों के कल्याण के नाम पर यह लोग बुलेट ट्रेन और संसद भवन के पुनर्निर्माण को स्थगित करने की मांग कर रहे है। कुछ ही समय में यह लोग नॉएडा में नए अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट के विरोध में भी खड़े हो जाएंगे।

एक समय यही लोग गुजरात के नर्मदा बाँध के निर्माण के विरोध में भी खड़े थे। वह तो भला हो मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का कि इन लोगों के भीषण अवरोध के बावजूद वे बाँध का निर्माण पूरा करवा पाए।

लेकिन इसी काँग्रेसी शाही परिवार ने एशियाई खेलों और कामनवेल्थ खेलों का आयोजन करवाया जिसमें भ्रष्टाचार के कीर्तिमान स्थापित कर दिए। उनके बनाये हुए स्टेडियम में राजनीतिक सभाएं होती हैं। इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र काँग्रेसियो और अर्बन नक्सल के रोज़गार का साधन बन गया। राजीव गाँधी, इनके परिवार और देशी-विदेशी मित्रों के निजी अवकाश के लिए नौसेना का जहाज़ और पूरे टापू का प्रशासन ड्यूटी पर लगा दिया जाता था।

एक तरह से यह लोग चाहते हैं कि सरकार आम जनता में धन का वितरण कर दे। उस धन को निर्धन परिवार खा-पीकर खर्च कर देगा जबकि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया – जिससे सतत आय और समृद्धि का सृजन होता है – के लिए कुछ भी नहीं दिखाई देगा।

लेकिन बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर (बिजली संयंत्र, गृह निर्माण, सभी घरों में नल से पानी, सड़क, रेल, पानी, बंदरगाह, स्वच्छता, एयरपोर्ट, बैंकिंग, तकनीकी संस्थान, इत्यादि) निर्माण की प्रक्रिया से ही सहायक उद्योगों जैसे कि कच्चे तेल के उत्पाद, ईंट-गिट्टी, खनिज, स्टील, सीमेंट, परिवहन, कार, रेस्टोरेंट, होटल, पर्यटन, ठेकेदारी, सेवा और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को भी बढ़ावा मिलेगा जिससे रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे, राष्ट्र में समृद्धि आएगी।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष स्वतंत्रता दिवस के सम्बोधन में बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए अगले पांच वर्षो में 100 लाख करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की और कहा था यह निर्माण जीवन स्तर में सुधार के अलावा नए रोज़गार के अवसर पैदा करेगा।

इसी सप्ताह वित्त मंत्रालय ने कहा कि देश में बुनियादी ढांचा बनाने और रोज़गार सृजन वाली परियोजनाओं में से 44 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाएं कार्यान्वयन के तहत हैं, 33 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाएं चालू होने वाली है, और 22 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं का विकास हो रहा है। कुल 71 प्रतिशत निवेश ऊर्जा क्षेत्र, सड़कें, शहरी विकास और रेलवे में है।

मार्शल प्लान के अंतर्गत किये गए कुल नौ लाख करोड़ रुपये (आज के डॉलर के दाम के अनुसार) ने पश्चिमी यूरोप को विकसित बना दिया। भारत में इससे दस गुने से अधिक का निवेश अगले पांच वर्षो में होने जा रहा है।

मोदी सरकार द्वारा किये जा रहे अति विशाल और व्यापक इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यों का असर रोज़गार और राष्ट्र के आर्थिक विकास पर दिखाई देगा।

‘मोदी प्लान’ भारत को मध्यम आय वाले राष्ट्रों की श्रेणी में इसी दशक में खड़ा कर देगा।

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