भंसाली… दम है तो ‘कफूर-खिलजी : एक अमर प्रेम’ फिल्म बनाओ

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यह संजय भंसाली क्या पिटा कि सारे तथाकथित सेक्युलर, बुद्धिजीवी, कलाकार और फ़िल्मी जमात ‘सृजनात्मकता का अधिकार’, सिनेमेटिक क्रिएटिविटी का झंडा बुलन्द किये कूद पड़े है.

इन्हें ऐतिहासिक चरित्रों को तोड़-मोड़ कर, गाने अफसानों से थाली पर सजा कर जनता को पेश करने की आज़ादी चाहिए है. इन्हें हिंदुत्व के प्रतीकों से छेड़खानी करने का अधिकार चाहिए है.

इन भारत की संस्कृति और माटी से दूर, विक्षिप्त लोगों में यह धृष्टता करने की हिम्मत कहाँ से आ गयी है? पिछले दशकों में ऐसा क्या हुआ है कि आज वह निर्लज्जता कर रहे हैं और राजनैतिक वर्ग से लेकर मीडिया उनका समर्थन कर रही है?

इस सबको समझने से पहले हमें भारतीय बम्बईया सिनेमा के इतिहास में जाना होगा.

एक जमाने में जब भारत में सिनेमा नहीं था तब कहानियों और किस्सों पर नौटंकियां बनती थी. जिसमें ज्यादातर या तो धार्मिक होते थे या फिर इतिहास के चरित्रों को कहानियों में फेंट कर दिखाया जाता था.

इन किस्सों का यथार्थ से कोई भी मतलब नहीं होता था. वह बस भारत की गुलाम जनता को जीवन की कड़वी हकीकत से सपनों की दुनिया में जीने का मौका देता था.

अब क्योंकि हिन्दू गुलाम था इसलिए पश्चिम से आये आतताइयों और मुगलों के चरित्रों को नौटंकी में एक अलग रूप में गाने बजाने के साथ दिखाया जाता था.

यह लैला मजनू, शीरीं फरहाद, सलीम अनारकली इत्यादि के किस्से सब कोरी कल्पना थी, जो हमारी संस्कृति के हिस्से नहीं थे लेकिन उनको नौटंकी की माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारा बनाया गया है.

उसके बाद जब मुम्बई में पारसी थिएटर का उदय हुआ. तब इनमें ऐतिहासिक भारतीय चरित्रों की शूरवीरता को विशेष स्थान मिला क्योंकि वह भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का काल था.

1947 में जब भारत आज़ाद हुआ तो भारत के हिंदुत्व वाले मूल चरित्र में बदलाव लाने के लिए वामपंथियों ने इसमें घुसपैठ की और एक अलग मंच बनाया. दरअसल जो हम आज देख रहे हैं, उसकी जड़ स्वतन्त्रता के बाद से ही पड़ गयी थी.

मुम्बई के सिनेमा और थिएटर में वामपंथी जमात ने, बुद्धिजीविता के नाम पर पहले ही अपना कब्ज़ा जमा लिया था. उन्होंने शुरू में इसे वर्ग संघर्ष और आम गरीब आदमी की चाशनी में परोसा, जिसकी परिणति 70 के दशक में समानांतर फिल्मों के रूप में हुयी थी.

वामपंथी माहौल की इप्टा, एनएसडी, फिल्म इंस्टिट्यूट पुणे आदि से निकली पौध जहाँ सृजनात्मकता लायी, वहीं तब तक के वामपंथियों के अघोषित एजेंडे को भी ले कर आयी.

इसी के साथ सेक्युलरता की परिभाषा गढ़ी जाने लगी जहाँ हिन्दू चरित्र नकारात्मक और मुस्लिम चरित्र को सकारात्मकता के नाम पर बदले जाने के प्रयास होने लगे. मुम्बई फिल्म इंडस्ट्री पर दाऊद इब्राहिम की पकड़ बनने के बाद, इसका इस इंडस्ट्री के हर क्षेत्र में व्यापक स्तर पर प्रयोग होने लगा.

इसका सीधा प्रभाव यह हुआ कि व्यवसायिकता की दौड़ में लगी प्रगतिशीलता की 40-50 के दशक की कलाकार पीढ़ी, 80-90 के दशक के आते-आते, फाइव स्टार होटल में 2000 रूपए की स्कॉच और 5000 प्लेट का खाना खाने वाली बन गयी थी.

आज भारतीय सेक्युलर राजनीतिज्ञों और बुद्धिजीवियों ने, भारत और भारतीयता की अवधारणा की ठेकेदारी इन्हीं कलाकारों के हाथों दे रक्खी है जिनके लिए हिंदुत्व एक अपराधबोध बन गया है. यह हिंदुत्व व भारतीय प्रतीकों पर कुठाराघात करना अपना सेक्युलरीय धर्म समझते हैं.

अब मेरा संजय भंसाली से प्रश्न है कि उसे खिलजी से इतनी ही मुहब्बत है तो अपनी क्रिएटिविटी को धरातल पर पंख क्यों नही देते है?

क्यों नहीं लैला मजनू, बाजीराव मस्तानी की तर्ज़ पर ‘कफूर खिलजी : एक अमर प्रेम’ बनाते है?

भंसाली को कहानी नहीं मालूम तो हम सुना देते हैं. यह कहानी किसी लेखक की कल्पना नहीं है बल्कि यह कहानी इतिहास में ही दर्ज है.

अलाउद्दीन खिलजी के गुजरात पर चढ़ाई के दौरान एक लड़के को पकड़ कर गुलाम बनाया गया था. कहते है वह बेहद खूबसूरत बच्चा था.

उसको जब पकड़ा गया तो उसके अंडकोष (टेस्टिकल्स) काट कर हिजड़ा बनाया गया और उसको इस्लाम कबूल करवाया गया. उसका नया नाम मलिक कफूर रक्खा गया.

अलाउद्दीन खिलजी एक व्यभिचारी सुल्तान तो था ही, वह समलैंगिक भी था, उसे लौंडेबाजी का शौक था. जब उसकी निगाह मलिक कफूर पर पड़ी तो वह अपना दिल दे बैठा.

खिलजी ने उस गुलाम लड़के को अपनी यौन इच्छा के लिए 1000 दीनार में खरीद लिया था. इसी लिए यह मलिक कफूर, इतिहास में ‘हज़ार दीनार कफूर’ के नाम से भी जाना जाता है.

खिलजी इस कफूर की मुहब्बत में इतना गिरफ्तार था कि उसे पहले सिपाही और बाद में उसे अपनी फौज का सेनापति बना दिया था.

फिर इसी कफूर ने बाद में 1316 में अलाउद्दीन खिलजी को मरवा कर खुद सत्ता हथिया ली थी लेकिन अंत में खिलजी के तीसरे बेटे मुबारक के हाथों मारा गया था.

संजय भंसाली, कहानी में तो दम है लेकिन मैं जानता हूँ कि तुम नही बना पाओगे क्योंकि तब तुम्हारी सारी प्रगतिशीलता और क्रिएटिविटी, तुम्हारे अंडकोषों (टेस्टिकिल्स) में उतर आयेगी और मलिक कफूर बनाये जाने के डर से तुम्हारी सारी सिनेमैटिक क्रिएटिविटी कपूर बन उड़ जायेगी.

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