ज़िंदा कौमें सिर्फ फेसबुक-ट्विटर पर नहीं लड़तीं

कुछ नहीं लिखा… जानबूझकर… क्योंकि मालूम था कि कमलेश तिवारी के बलिदान का मामला भी चंद दिनों में ठंडा हो जाएगा। इसमें कुछ किया नहीं जा सकता। मुख्यधारा की मीडिया पर कब्ज़ा लिबरल और वामियों का है। उन्हें कमलेश तिवारी को अखलाक या पहलू खान की तरह जिलाए रखने में कोई रुचि नहीं है।

सबसे खतरनाक है हिंदुओं की आत्मसंतुष्टि। सरकार बनाकर और फेसबुक पर थोड़ा सा दबदबा बनाकर हम संतुष्ट हैं। यह सोशल मीडिया एक इको चेंबर है जहां हम अपनी ही आवाज़ सुनते हैं।

यदि हम और आप, राष्ट्रवादी और हिंदुत्व के हितचिंतक हैं, तो स्वाभाविक है हमारे मित्र भी ऐसे ही होंगे। इसलिए हर टिप्पणी पर कुछ लाइक्स और कमेंट मिल जाते हैं और हमारे अहम को खुराक मिल जाती है।

लेकिन इसके अलावा क्या है? जिस दिन सरकार नहीं रही, उस दिन क्या होगा?

कोई भी याद कर ले भारत रत्न प्रणब मुखर्जी की भूमिका। चुनाव आते ही वो 15 दिन में चार बार असहिष्णुता पर बयान दे डालते थे जो सभी अखबारों की लीड होता था। आज राष्ट्रपति कोविंद कुछ भी बोलें वो अंदर के पन्नों पर कहीं लग गया तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं।

बात इतनी है कि आज राष्ट्रपति भाजपा के हैं तो हमें असहज करने वाला बयान नहीं देंगे। लेकिन जिस दिन नहीं रही, उस दिन अखलाक और पहलू खान जैसों के मुकदमों पर अदालती सुनवाइयां भी अखबारों की लीड खबर होगी जैसे 2002 से 2014 के बीच गुजरात दंगों की होती थी। लिबरल मीडिया अभी बस चुप है मौके के इंतजार में। मिलते ही कसर निकाल लेंगे।

कमलेश तिवारी के मामले में हम फिर भी भाग्यशाली रहे जो मामला चर्चा में आया। ज्यादा रोना-धोना भी ठीक नहीं। अभी बहुत से कमलेश तिवारियों को अपने शीश कटाने होंगे।

मुद्दा जो है वो ये कि आप ज़मीन पर कहां हैं? क्या जो अच्छे संगठनकर्ता हो सकते हैं, वो ज़मीन पर कुछ कर रहे हैं? जो धर्म की पुनरप्रतिष्ठा के लिए कुछ आर्थिक सहयोग करने में सक्षम हैं, वो कुछ कर रहे हैं? कितने अधिवक्ता हिंदुत्व से जुड़े मामलों को अदालतों में ले जाने के लिए तैयार हैं?

जब तक ये नहीं होगा, तब तक हम फेसबुक, ट्विटर पर ही क्रांति करते रहेंगे। लेकिन ज़िंदा कौमें सिर्फ फेसबुक, ट्विटर पर ही नहीं लड़तीं। असली लड़ाई गलियों, सड़कों और खेतों में लड़ी जाती है। विजेता वही होता है जो ज़मीन पर जीतता है।

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