सनातन जीवन संस्कृति से ही निष्फल हो सकेगी हॉकिंग की पृथ्वी छोड़ने की चेतावनी

स्टीफन हॉकिंग का नाम ज़रूर सुना होगा। विज्ञान के युग में महान भौतिकशास्त्री को कौन नहीं जानेगा। उनकी एक चर्चित पुस्तक है ‘अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ टाइम (समय का संक्षिप्त इतिहास)’।

मैंने करीब दस-पंद्रह वर्ष पूर्व पढ़ी थी, तब बेहद आकर्षित हुआ था। यहाँ तक कह दिया था कि वे एक वैज्ञानिक से अधिक प्रभावशाली लेखक हैं। असल में उनके शब्द-संसार ने मोह लिया था।

पुस्तक में जब वो कहते हैं कि इस संसार का निर्माण अगर ईश्वर ने किया है तो उसके पूर्व वो क्या कर रहा था। और जब वे पूछते हैं कि अगर समय का प्रारम्भ किसी बिंदु पर हुआ है (जिसका संबंध वो अपनी ब्लैक होल थ्योरी से जोड़ते हैं) तो इसके पूर्व क्या था।

इन बातों में उनकी दार्शनिकता उभरती है और वे प्रकृति के रहस्य को रोचकता के साथ प्रस्तुत करते नजर आये थे। हाँ, लेकिन पुस्तक के अंत तक जब वो इसे सही सही समझा नहीं पाए तो निराशा ज़रूर हुई थी। और मैं जवाब ना मिल पाने के कारण अतृप्त ही रह गया था।

तब तक मैंने वैदिक शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया था। वो तो अब भी पूरा नहीं कर पाया हूँ और शायद कभी पूरा कर भी ना पाऊं, मगर हाँ थोड़ा चिंतन मनन ज़रूर करने लगा हूँ। सनातन जीवन दर्शन की चंद बूंदों ने ही इतनी ऊर्जा भरकर कल्पना के द्वार खोल दिए कि श्रीमान हॉकिंग महोदय के सवालों पर बात कर सकता हूँ।

अब उपरोक्त दोनों सवाल बचकाने लगते हैं। सवाल तो यह बनता है कि क्या समय का कोई अस्तित्व है भी? नहीं। सिर्फ परिवर्तन ही प्रकृति का मूल स्वभाव है। और प्रकृति के इस स्वभाव को जीवन-दर्शन का आधार बनाकर, सनातन ने बहुत ख़ूबसूरती से शब्दों में पिरोया और आमजन के बीच परोसा है। यह तो विज्ञान को भी पता है कि उसका समय सिर्फ पृथ्वी से ही संदर्भित है, वो अंतरिक्ष में जाकर अपरिभाषित हो जाता है, क्योंकि वहाँ दिन रात नहीं होता।

और जहां तक रही बात इतिहास की, तो वो आधुनिक युग के बुद्धिजीवियों का बौद्धिक विलास है। क्योंकि वे सिर्फ लिखे को ही प्रमाणित इतिहास मानते हैं, मानों लेखन कला के पूर्व सृष्टि में कोई घटनाक्रम हो ही नहीं रहा था। अब कोई इनसे पूछे कि पृथ्वी का क्या इतिहास है? और फिर हम तुम्हारी बताई बातें ही क्यों माने, क्योंकि कॉपी-पेन्सिल लेकर तो तुम भी वहाँ नहीं खड़े थे।

सनातन संस्कृति ने तो फिर भी इस का प्रयास कर रखा है। पौराणिक कथाओं में उसने अपनी स्मृतियों को हजारों साल तक ज़िंदा रखा। आप बेशक इसे ना मानो, मगर इन कथाओं और हमारी परम्पराओं में आदिकाल की झलक को देखा जा सकता है।

काश हॉकिंग ने अन्य प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की तरह वैदिक दर्शन को पढ़ा होता। यकीनन उन्होंने महाकाल का नाम नहीं सुना होगा। यूं तो महादेव के इतने रूप-स्वरूप और सबकी इतनी अंतहीन व्याख्या है कि चंद शब्दों में उसे यहां प्रयास करना भी मूर्खता होगी। मगर सनातन में अपने अनुभव को अपने ढंग से देखने समझने की पूरी स्वतंत्रता है। इसलिए अपनी बात रख रहा हूँ।

एक दिन एक मित्र कहने लगे कि भगवान शिव को संहार का देवता माना जाता है तो फिर उन्हें सृष्टि की उत्पत्ति प्रक्रिया से जोड़ कर कैसे देखा जा सकता है, वो सृजन के आदिस्रोत कैसे हुए, वो लय और प्रलय दोनों के एकसाथ अधिपति कैसे हो सकते हैं?

सवाल सरल और स्पष्ट है तो जवाब भी सीधा सरल होना चाहिए। और मैं अपने ज्ञान से, जो अभी आधा अधूरा ही है, इतना भर कह पाया था कि विनाश के बाद ही पुनर्निमाण सम्भव है। सृजन और संहार, एक चक्र है, जो सतत है, निरंतर है।

ठीक उसी तरह से जैसे कि मृत्यु और जन्म का एक चक्र है। सूर्यमंडल का एक चक्र है। पृथ्वी पर ऋतुओं और दिन-रात का चक्र है। ऐसे ही ब्रह्माण्ड में अनेक चक्र हैं। यह चक्र और कुछ नहीं बल्कि परिवर्तनशीलता ही है। और इसके देवता हैं आदिदेव भोलेनाथ। यही कारण है जो वे सर्वशक्तिमान माने गए हैं।

परिवर्तन ही अंतिम सत्य है। इस दृष्टि से देखते ही हॉकिंग महोदय को समझ आ जाता कि ईश्वर सृजन के पूर्व क्या कर रहा था, वो अपनी पुरानी सृष्टि का संहार कर रहा था।

कुछ ऐसा ही आधुनिक वैज्ञानिक ब्लैकहोल थ्योरी में कल्पना कर रहे हैं जिसमें वे ब्रह्माण्ड को संकुचित और फिर विस्तारित होने की बात करते हैं। मगर यह बात तो वैदिक ऋषि सदियों पहले कह गए। परिवर्तन अर्थात चक्र। तभी वे मंदिर की परिक्रमा करवाते हैं, नदी की परिक्रमा भी। ठीक उसी तरह जैसे परमाणु अणु के चक्कर लगाता है, चन्द्रमा पृथ्वी के।

सीधे सीधे कहना हो तो हर कोई अपने मूल के चक्कर लगाता है, जैसे बच्चा अपनी माँ के चारों ओर घूमता है। गणपति भी तो माता-पिता के चारों ओर घूम आये थे। और जहां तक रही बात समय के प्रारम्भ की तो किसी भी चक्र में कोई प्रारम्भिक बिंदु नहीं होता।

प्रकृति में चक्र की यह व्याख्या, जहां आम सवाल, ‘मुर्गी और अंडे में पहले कौन’ का जवाब देती है, वहीं यह पुनर्जन्म और आत्मा का विनाश नहीं होता इन बातों को भी प्रमाणित करती है। संक्षिप्त में कह सकते हैं कि हम सब परिवर्तन के किसी चक्र पर सवार हैं।

यह लेख यही नहीं समाप्त हो जाता। वैज्ञानिक महोदय की अन्य किताबों ने फिर मुझे निराश ही किया था। उन पर बात फिर कभी। मगर हॉकिंग महोदय के एक कथन ने मुझे विचलित किया था, इतना कि मैंने विस्तार में अपनी पुस्तक ‘वैदिक सनातन हिंदुत्व‘ लिख दी।

हुआ यूं कि उनका यह कथन कि इस सदी के अंत तक हमें पृथ्वी छोड़ देनी पड़ेगी, जब मैंने पढ़ा, तो मेरी पहली प्रतिक्रिया थी, ‘क्यों भाई तब तक हम इतना कचरा फैला चुके होंगे कि पृथ्वी रहने लायक ही नहीं बचेगी इसलिए?’

इस संदर्भ में मेरा सरल सा सवाल है कि क्या हम अंतरिक्ष में अपने साथ सभी जीव-जंतु पेड़ पौधे ले जा पाएंगे? अगर नहीं तो फिर यह पलायन किस काम का। इसी दौरान अंगरेज़ी की एक चर्चित फिल्म देखी थी WALL-E, जिसमें मानव सभ्यता को अंतरिक्ष में रहते दिखाया गया है। इसे देखकर कोई भी यहां से जाना नहीं चाहेगा।

लेकिन यह तभी सम्भव है जब विश्व, वैदिक काल से चली आ रही सनातन जीवन संस्कृति, जिसका नाम हिंदुत्व हैं, को अपनाये। आप को यकीन नहीं होगा, हैं ना? अगर करना है तो यह पुस्तक एक बार पढ़ें।

कोई बात तो होगी जो हजारों साल से, वैदिक सनातन संस्कृति, हम हिन्दुओं की परम्पराओं में आजतक जीवंत है, जबकि पश्चिम की विज्ञान संस्कृति का यह हाल है कि वो दो-चार सौ साल में ही ऐसे हांफने लगी कि स्टीफन हॉकिंग को पृथ्वी छोड़ने की सलाह तक देनी पड़ गई।

काश, वैज्ञानिक महोदय जीवित होते, तो मैं उन्हें अपनी पुस्तक ‘अगली सदी का एकमात्र प्रवेशमार्ग – वैदिक सनातन हिंदुत्व’ जरूर भेजता। यह बेशक हिंदी में है मगर उतनी ही सरल है जितना हमारा जीवन और यह प्रकृति। यह दीगर बात है कि हमने सब कुछ क्लिष्ट कर दिया है।

क्यों और किसके लिए लिखी गई ‘वैदिक सनातन हिंदुत्व’

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