हिंदुत्व का मूल नींव में है तब तक ही सुरक्षित है इमारत

राजनीति का मुझे अधिक नहीं पता, और फिर ना तो मैं राजनैतिक विश्लेषक हूँ ना ही भविष्यवाणी जैसा कुछ कर सकने का दिव्य ज्ञान प्राप्त है।

हाँ, एक चिंतक और लेखक होने का प्रयास निरंतर करता रहता हूँ। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि ‘वैदिक सनातन हिंदुत्व‘ का प्रबल समर्थक हूँ, इतना कि इस विषय पर इसी नाम से एक पुस्तक तक लिख दी, जिसमें किसी और की लाइनों को छोटी करने की जगह मैंने अपनी संस्कृति की लाइनों को बड़ा करने का प्रयास किया है।

हिंदुत्व के अतिरिक्त ना कुछ और सोचता हूँ ना सोचने की गुंजाइश छोड़ता हूँ। और ऐसा करने के मेरे पास पर्याप्त कारण हैं, जिनमें से एक प्रमुख है कि दुनिया की सभी सभ्यता संस्कृति में से हिंदुत्व ही मानवता के सर्वाधिक करीब है।

मेरा ऐसा मानना है कि दुनिया में अगर मानवता बच सकती है तो केवल सनातन जीवन दर्शन से। हिंदुत्व के कट्टर आलोचक भी मानेंगे कि यह सभी पंथ मज़हब सम्प्रदाय के बीच सर्वश्रेष्ठ धर्म है। तथाकथित बुद्धिजीवियों को भी BEST OUT OF WORST तो कहना ही पड़ेगा।

यहां सवाल उठता है कि जब मेरे पास सर्वश्रेष्ठ जीवन दर्शन है तो ऐसे में भला मैं क्यों कुछ और का चुनाव करूंगा। फिर चाहे वो लेखन में हो या फिर जीवन में। और अगर करता हूँ तो पहली बात कि उससे होने वाले दुष्परिणाम के लिए भी मैं स्वयं ही जिम्मेवार होऊंगा और अंत में मूर्ख भी कहलाऊंगा।

तो क्या मैं मूर्ख बनना चाहूंगा? मैं क्या, कोई भी नहीं बनना चाहता। यही कारण है BEST OUT OF WORST जीवन दर्शन का व्यवहारिक पक्ष है। किसी भी चुनाव में यह मूल सिद्धांत होता है।

जानवर भी प्राकृतिक रूप से यही करते हैं। फिर चाहे उन्हें शिकार ही क्यों ना करना हो। वो उसी को लक्ष्य बनाते हैं जो पकडे जाने में सबसे आसान हो अर्थात आसान में BEST हो।

पकड़े जाने वाला निरीह जानवर भी BEST OUT OF WORST राह पकड़ता है, बचने के लिए। सामान्य जीवन में स्वाभाविक रूप में मानव भी यही सिद्धांत अपनाता है और सदैव बेहतर विकल्प बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहता है।

और बात जब भी किसी चुनाव की आती है उस वक्त के BEST OUT OF WORST को चुनता है। अगर ऐसा करने से चूकता है तो उसको फिर भोगता भी है। मानव जीवन से लेकर देश समाज के सामने ऐसी चुनौती आती रहती है। और जब कभी भी चुनाव करने में चूक होती है तो वो समाज देश उसका भुगतान करता है। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है।

अब बात आती है कि यह सब कहने का यहां संदर्भ क्या है? कुछ सवालों के सीधे सीधे जवाब नहीं दिए जाते, ना ही दिए जाने चाहिए। क्योंकि उनका प्रभाव गहरा और स्थाई नहीं होता।

यहां आजकल राजनीति और राज्य के चुनाव पर बात हो रही है। इसमें कोई शक नहीं कि प्रजातंत्र भीड़तंत्र है। मगर क्या भीड़ अपना अहित करती है? दूसरे शब्दों में कहें तो क्या भीड़ मूर्ख होती है?

कल शाम एक्ज़िट पोल के नतीजों को सही मानें तो वे ऐसा ही कुछ बयान करते हैं। आप पूछ सकते हैं कि ऐसा कैसे? इस सवाल के जवाब में मैं कुछ एक सवाल करना चाहूंगा।

इन राज्यों की वर्तमान सत्ता के नेतृत्व ने क्या ऐसा कुछ किया है जो जनता के लिए हानिकारक, अहितकारी हो? क्या वे जनविरोधी थे? नहीं।

उलटे, ध्यान से देखने पर यह साफ़ नज़र आता है कि इन सब ने कोई बड़ी गलती नहीं की है, बल्कि इनके शासन में कमियों से अधिक अनगिनत अच्छाइयाँ दिखाई देंगी।

तो फिर ऐसे में भीड़ सत्ता परिवर्तन क्यों करना चाहेगी? और फिर कम से कम वो अच्छे से बुरे विकल्प की ओर तो नहीं जाएगी। जाना नहीं चाहिए। संक्षिप्त में कहें तो वो BEST OUT OF WORST के मूल से क्यों दूर होना चाहेगी।

और अगर दूर जाती है तो क्या वो इससे होने वाले दूरगामी दुष्परिणाम से बच सकती है? नहीं।

इसे एक उदाहरण से समझते हैं। बात हिंदुत्व से शुरू हुई थी, तो उसी को केंद्र में रखते हैं। 1947 में पाकिस्तान बना, उस से संबंधित लोगों ने जो कुछ भी चुना वो BEST OUT OF WORST नहीं था। आज वो कहाँ हैं किसी से छिपा नहीं। हिंदुत्व और हिन्दुस्तान की देवभूमि से कटने का भुगतान मात्र सत्तर साल में इस स्तर का करना होगा यह उनने भी नहीं सोचा होगा।

सोच तो हम भी नहीं रहे हैं, यही कारण है जो अनेक गलत चुनाव हम 1947 से करते आये हैं। परिणामस्वरूप पतन के इस कगार पर पहुंचे हुए हैं। और अगर जो कुछ बचे हैं तो सिर्फ इसलिए कि हमारे पास हिंदुत्व का मूल अब तक हमारी नींव में है। जब तक यह नींव में है तब तक इमारत सुरक्षित है।

क्या हम जानते नहीं कि इसी हिंदुत्व से हमें दूर करने के कई सफल प्रयास हुए हैं। कई षड्यंत्र रचे गए हैं। और ऐसा करने वालों का चुनाव हमने ही अनगिनत बार कर रखा है। ये वही लोग हैं जो हमें पाकिस्तान बनाने पर तुले हैं।

तो क्या हम ऐसा बनना चाहेंगे? नहीं, तो फिर इससे बचने का एकमात्र मार्ग है हिंदुत्व, और हिंदुत्व के समर्थन में BEST OUT OF WORST कौन है हम सब को पता है। जब पता है फिर भी हम गलत चुनाव करते रहेंगे तो यह देवभूमि हमें कब तक माफ़ करेगी।

भारत माता की परीक्षा लेना बंद कीजिये। जो कुछ बीत चुका उससे बंध कर रुकने का कभी कोई औचित्य नहीं होता। अगर परिणाम सकारात्मक आते हैं तो उससे प्रेरित होकर और अगर नकारात्मक आते हैं तो उससे सबक लेकर, बिना किसी शक और शंका के 2019 की तैयारी में जुट जाइये।

भारत माता की जय

राजाओं से अधिक ऋषियों को महत्व देने से श्रेष्ठ और आदर्श बनी सनातन संस्कृति

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