MeToo : एक क्रांतिकारी क़दम जो अब बन कर रह गया है एक मज़ाक

#MeToo अपने आप में एक क्रांतिकारी क़दम था जो अब एक मज़ाक बन कर रह गया है… नक्कालों कर कारण असली चीज भी कम बिकती है।

पहले पहल #Sweetu और बाद में बन जाये #MeToo… ये नज़रिया मुद्दे का उपहास नहीं उड़ाता ये सच का आईना है उनके लिए जो अति स्त्रीवादी बनने के चक्कर में स्त्रियों की कुटिलता को देखने से इनकार करते हैं।

जब कोई मुद्दा सामाजिक रुग्णता की तरफ़ इशारा कर तो उसके लिए पूरा समाज दोषी होता है जिसमें स्त्री पुरुष बच्चे बूढ़े सभी शामिल हैं… किसी एक कौम को कॉर्नर कर के सारा बिल उसके नाम फाड़ना और बड़ी मूढ़ता होती है।

मेरे देखे…

ये फेमिनिज़्म के झंडे को फैशन और पैशन के कॉकटेल गटकने के बाद हवा में लहराने वाले/वालियों के कारण ही स्त्रियों के पक्ष में होने वाली बात भी उनके विरोध में चली जाती है।

स्त्रीवादी स्त्री की महत्ता को बताने के लिए पुरुषों को छोटा साबित करने के प्रयास करने लगते हैं… women equality के नाम पर पुरुषों द्वारा की जा रही मूढ़ताओं (शराब/ सिगरेट/ व्यभिचार/ मुक्त यौनाचार/ भ्रष्टाचार/ bully करना… इत्यादि) को बराबरी से महिलाओं को करने देने की वक़ालत करते हैं…

स्त्री विमर्श पर किसी पॉजिटिव सार सामने आने के बजाए एक विवादित स्थिति सामने आती है अक्सर… जहाँ बेवजह विक्टिम कार्ड के बहाने कुछ निजी फायदा उठाते तो कुछ परपीड़ा से कोई आनंद लूटते नज़र आते हैं।

#MeToo का मुद्दा भी एक खेल सरीखा शक़्ल इख़्तियार कर रहा है भारत में…

इकतरफा public shaming चल रही है…

मामले की सत्यता को परखे बिना अब एजेंडे के तहत नाम बदनाम किया जा रहा है…

TV चैनल्स और न्यूज़ वाले चटखारे ले कर भुना रहे हैं इसे और इन सबके बीच असल भाव ग़ायब हो चुका है।

मर्ज़ी से ऐश करने वाली या प्रमोशन/फेवर के लिए ‘कोम्प्रोमाईज़’ करने वाली कई महिलाओं का ज़मीर एक दम से सोशल मीडिया पर जाग रहा है… मख़ौल बन कर रह गया है यह क्रांतिकारी शब्द #MeToo…

उत्पीड़न की स्वीकारोक्ति एक साहसिक क़दम है जो मानसिक रूप से इस पीड़ित/पीड़िता को मज़बूत कर जाता है… मग़र इस प्लेटफार्म को जब प्रोपेगैंडा और पॉपुलैरिटी के लिए यूज़ किया जाए तो असल मुद्दा तो हाशिये पर जाने को बाध्य है..!!

#MeToo सिर्फ़ स्त्रियों का मुद्दा नहीं, वह बच्चों, पुरुषों का भी मुद्दा है… जिस देश में 70% बच्चे किसी न किसी तरह के चाइल्ड एब्यूज़ का शिकार रहे हों, जिस देश की न्यायालय मैरिटल रेप को सामाजिक विश्लेषण के लिए सामने लाने की सलाह देते हुए कहे कि 85% विवाहित महिलाएं मैरिटल रेप की शिकार हैं… जिस देश में सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि 498 और 376/377 का भरपूर दुरुपयोग निर्दोष पुरुषों के खिलाफ़ होता आ रहा है… उस देश में #METOO के लिए बहुत से आयाम खुले हुए हैं।

ख़ैर… इस क्रांतिकारी मुहिम की मूलभावना फिर से जागे.. यही अपेक्षा और प्रार्थना..!!

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