राजाओं से अधिक ऋषियों को महत्व देने से श्रेष्ठ और आदर्श बनी सनातन संस्कृति

ऋग्वेद में एक महत्वपूर्ण वैदिक ऋषि हैं, वशिष्ठ। सनातन का एक जाना पहचाना नाम। यह नाम आते ही अनेक प्रसंग और संदर्भ याद आने लगते हैं।

राजा दशरथ के कुलगुरु। वही, जिन्होंने राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न को शिक्षा दी।

वही राजऋषि, जिन्होंने देश का शासन सुचारु रूप से तब चलाया जब राजा दशरथ का देहांत हो गया था और राम ने वनवास से वापस लौटने से मना कर दिया था और भरत ने राजसिंहासन पर बैठने के बजाय भाई राम की चरणपादुका को रख कर राजकाज चलाने की औपचारिकता पूरी की थी।

वही महर्षि वशिष्ठ, जिनका ऋषि विश्वामित्र के साथ लंबा संघर्ष हुआ। वही ब्रह्मर्षि वशिष्ठ, जिनके पास कामधेनु गाय थी।

ऐसी अनेक स्मृतियाँ हमारे मन मस्तिष्क में गुरु वशिष्ठ को लेकर हैं। अनेक लोक कथाएं हैं जिनका सीधे संबंध ऋषि वशिष्ठ से है।

पश्चिम के बुद्धिजीवी और वामपंथी इसे इतिहास नहीं मानते। ना मानिये, मगर इन कथाओं के सांकेतिक सन्देश को तो हम कम से कम समझ इस गिरोह को समझा ही सकते हैं।

वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच संघर्ष को लेकर कई तरह की टिप्पणियां सुनाई देती हैं। यह सत्य है कि ऋषि वशिष्ठ ने पहले विश्वामित्र को राजऋषि ही माना और अंत में बड़ी मुश्किल से ब्रह्मर्षि भी स्वीकारा।

इसको लेकर आप ऋषि वशिष्ठ को नाम रख सकते हैं, मगर सच तो यह है कि विश्वामित्र का ब्राह्मणत्व स्वीकार करने से पहले यह उनकी कठिन परीक्षा थी।

इससे फिर दो बातें स्पष्ट होती हैं, प्रथम यह कि वैदिक समाज में विद्वान होना और कहलवाना आसान नहीं था और दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु है कि ब्राह्मण कोई भी हो सकता था, यहां भी तो विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय थे।

उपरोक्त कथाओं से एक बात और निकल कर आती है कि उस युग में गाय कितनी महत्वपूर्ण थी। दोनों ऋषियों के बीच युद्ध भी गौमाता कामधेनु को लेकर ही प्रारम्भ हुआ था।

सच तो यह है कि उस युग के सभी युद्ध गाय को लेकर लड़े जाते थे। देवता-राक्षस के अनगिनत युद्ध से लेकर महाभारत के युद्ध में भी गाय एक महत्वपूर्ण कारण बनी थी।

आखिर गाय के लिए युद्ध क्यों?

क्योंकि गाय अर्थव्यवस्था के केंद्र में होती थी। वही गाय जो आज भी किसी भी छोटे से लेकर बड़े से बड़े परिवार को पालने के लिए सक्षम है। मगर हम इस के महत्व को समझ नहीं रहे और ना ही उन्हें समझा पा रहे हैं, विशेषकर उन्हें जो या तो स्वयं गौमांस खाते हैं या फिर ऐसा अधर्म करने वालों का समर्थन करते हैं।

यहां वशिष्ठ नाम से एक सवाल मन में उठ सकता है कि एक ही वशिष्ठ अनेक काल में कैसे हो सकते हैं। और वामपंथी गिरोह इसका मज़ाक उड़ाते हुए, इस एक आधार पर ही इस पूरे ऐतिहासिक कथा-साहित्य को काल्पनिक घोषित कर देता है।

असल में वशिष्ठ एक वंश है। इसे एक उपनाम भी कहा जा सकता है। एक परम्परा भी कह सकते हैं। ऋषि वशिष्ठ की अनेक पीढ़ियां हुईं। वशिष्ठ शब्द की एक व्याख्या बड़ी रोचक है। यह वस शब्द से बना है जिसका अर्थ निवास करना प्रवास करना रहना आदि है। साथ ही इसमें वरिष्ठ शब्द का योग भी है, जिसका अर्थ है सर्वाधिक श्रेष्ठ अर्थात श्रेष्ठतम, सर्वश्रेष्ठ।

अर्थात ऋषि वशिष्ठ हमारी स्मृति में आदिकाल से हैं और उसमें भी सर्वश्रेष्ठ ऋषि हैं। कितना अद्भुत है कि हम एक शब्द मात्र से अपने आदि इतिहास में झांक कर उसे समझ सकते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि आदिकाल में हिमालय से तपस्या करके ऋषि वशिष्ठ अयोध्या में आकर बसे थे।

आखिरकार एक तपस्वी को समाज में क्यों आना पड़ा?

अगर इसका विश्लेषण किया जाए तो एक बात निकल कर आती है कि राजा कहीं निरंकुश ना बन जाये, शक्ति संतुलन और राजसत्ता के नियंत्रण के लिए उनका आगमन हुआ था।

इसे विस्तार से देखें तो, हम समाज में व्यवस्था के लिए मनु को अपना पहला राजा मानते हैं। उनकी बनाई पहली आदर्श व्यवस्था मनुस्मृति के नाम पर हमें याद भी है, मगर हम ऋषि वशिष्ठ को भूल गए।

मनु की बनाई व्यवस्था में समाज और शासन के व्यवस्थित संचालन के लिए राजा को अनेक अधिकार और शक्तियां दीं, मगर ऐसे में किसी अतिशक्तिशाली सम्पन्न राजा के निरंकुश होने की संभावन सनातन ऋषियों ने उस युग में ही कर ली थी।

तो सवाल उठा कि ऐसे राजा को नियमित और नियंत्रित कैसे किया जा सकता है?

और जो उपाय किया गया वो अद्भुत था। शासकीय और शारीरिक रूप से बलशाली राजा को नियंत्रित करने के लिए एक ऐसे पद का निर्माण हुआ जिस पर पदासीन व्यक्ति ज्ञानी होगा, तपस्वी होगा, त्याग और वैराग्य के गुणों वाला होगा, जिसका सम्मान फिर राजा से अधिक ही माना जाएगा।

एक तरह से राजदंड के ऊपर ब्रह्मदंड को स्थापित किया गया। राजबल को नियमित करने के लिए नियंत्रित करने के लिए ब्रह्मबल की स्थापना की गयी। इसे शासन में सत्ता का संतुलन कह सकते हैं। और इस तरह से अयोध्या के पहले कुलगुरु वशिष्ठ बने।

उस वक्त राजा इक्ष्वाकु का शासन था। यह वहीं इक्ष्वाकु हैं जो मनु के पुत्र थे और जिनके नाम पर आगे इक्ष्वाकु वंश बना, वही जो सूर्यवंशी राजाओं में पहले माने जाते हैं।

क्रियान्यवन से अधिक महत्वपूर्ण होता है विचार। आदर्श विचार का जन्म ऐतिहासिक घटना होती है। हाँ, आदर्श विचार की स्थापना के बाद उसका क्रियान्वन और अधिक मुश्किल काम है। उस पद पर विराजमान व्यक्ति का आचरण आदर्श विचार के अनुरूप होना उससे भी कठिन है।

सत्ता संतुलन की विचारधारा के जनक महर्षि वशिष्ठ स्वयं इस व्यवस्था के प्रथम और आदर्श उदाहरण हैं। मगर इस महान ऋषि को हम याद नहीं करते। अगर वेद में इनका उल्लेख नहीं होता तो इस नाम तक को षड्यन्त्रपूर्वक भुला दिया जाता। और ऐसा करवाने वालों के पास ऐसा करने के पर्याप्त कारण हैं।

असल में पश्चिम की सत्ता, वैदिक जीवन की आदर्श व्यवस्था नहीं चाहती और वामपंथी बुद्धिजीवी, वैदिक ऋषियों को सिर्फ इसलिए नकारते हैं क्योंकि ऐसा ना करने पर इनकी बौद्धिक दुकान बंद हो जाएगी।

इसमें हमारा दोष सिर्फ इतना है कि आजकल हम सिर्फ उस इतिहास को मानते हैं जो पश्चिम का है, जिसमें सिर्फ राजा-महाराजाओं के किस्से होते हैं। जबकि सनातन सभ्यता अपने राजाओं से अधिक ऋषिओं को महत्व देती आई है, इसलिए वो श्रेष्ठ और आदर्श संस्कृति कहलाती थी।

जब से हमने वशिष्ठ से लेकर विश्वामित्र, वेदव्यास से लेकर महर्षि वाल्मीकि, चाणक्य से लेकर तुलसीदास के महत्व को कमतर किया है, हमारा पतन उतनी ही तीव्रता से हुआ।

कलयुग का दुर्भाग्य यह है कि देवभूमि ने भी ऋषि वशिष्ठ जैसो को जन्म देना बंद कर रखा है।

(हाल ही में प्रकाशित ‘वैदिक सनातन हिंदुत्व’ के क्रम में आगे लिखी जा रही अपनी अगली पुस्तक ‘मैं आर्यपुत्र हूँ’ के एक अध्याय में से।)

क्यों और किसके लिए लिखी गई ‘वैदिक सनातन हिंदुत्व’

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