कोरोना : सूक्ष्म सत्ता की छोटी सी कहानी

चारों तरफ महामारी से लोग मर रहे हैं, पूरा विश्व किसी ऐसे रोग से त्राहि त्राहि हो रहा है जिसका आगा पीछा किसी को समझ नहीं आ रहा, जिस देश से यह प्रारम्भ हुआ उस देश ने भय का ऐसा मायाजाल बिछाया कि आम मनुष्य को पहली नज़र में लगे कि कुत्ता और चमगादड़ खाने वाले देश में तो यह होना ही था, और यदि वहां से कोई आता है तो हमारे देश में भी फ़ैल सकता है. परन्तु इस अफवाह के पीछे खड़े किसी बड़े षडयंत्र को किसी को भनक भी नहीं लगी.

तब तक भारत के लोग निश्चिन्त थे, किसी अनजान आपदा के आने से बेखबर, अपनी दिनचर्या में व्यस्त, वैसे ही राजनीतिक मतभेद, सामाजिक बैर और गरीब-अमीर के बीच बढ़ती खाई के साथ कुछ लोग सामाजिक सौहार्द्र और गरीबों की सेवा के साथ आपसी प्रेम को बढ़ाने के लिए प्रयत्नरत…

इधर आधुनिक जीवन शैली किसी भयानक सर्प की भांति अपना फन उठाये हर किसी के स्वास्थ्य को डस रही थी… सुविधापूर्ण और आरामतलब जीवन के आदि हो चुके मनुष्य का संघर्ष मात्र रोटी. कपड़ा. मकान और अधिक से अधिक धन उपार्जन तक रह गया था, राष्ट्र की चिंता मात्र सोशल मीडिया तक रह गयी थी, whatsapp संदेशों और फेसबुक, ट्विटर, instagram लोगों के अंगूठे को हिलाने के अलावा कोई शारीरिक गतिविधि नहीं दे रहा था… जिससे धीरे धीरे लोगों के शरीर के साथ आत्मा भी सुप्त हो रही थी, जो थोड़े बहुत क्रियाशील थे वो भी मात्र स्वयं के लिए, दान की महिमा सिर्फ फोटो खिंचवाने तक सीमित थी…

इधर सूक्ष्म सत्ता में एक नई हलचल थी, सिद्धाश्रम के कुछ ऋषि मनुष्य की बिगड़ती प्रवृति के कारण अस्तित्व पर मंडराते खतरे से चिंतित भी. फिर एक समय ऐसा भी आया कि सूक्ष्म सत्ता को भौतिक जगत में हो रहे पतन की बागडोर संभालना पड़ी.

ऐसे में एक महामारी का आगमन अस्तित्वगत योजना का हिस्सा बनकर हुआ जिसके लिए आम मनुष्य तैयार नहीं था, क्योंकि यह इतनी बड़ी और सोची समझी योजना थी जिसकी कल्पना कोई स्वप्न में भी नहीं कर सकता था…


“परन्तु ऋषिवर भारत देश को इस रोग से कैसा भय, न उनकी जीवन शैली विदेशी संस्कृतियों जैसी है, ना आत्मा, सारे मतभेदों के बावजूद वे भावना प्रधान लोग हैं, दूसरों की पीड़ा देख अपनी पीड़ा भूल जाने वाले, फिर वहां यह महामारी क्यों भेजी जाए?”

विराट, सूक्ष्म सत्ता में कोई देश कोई विदेश नहीं होता, सब लोग मानव सभ्यता के अंग है. काल, सीमा और पर्यावरण में विभिन्नता होने के कारण सबकी जीवन शैली भिन्न है. परंतु जब एक स्थान की जीवन शैली दूसरे लोग अपनाने लगते हैं तो वह उस देश के लिए खतरनाक हो जाता है. तभी तो कह रहा हूँ यही सही समय है जब भारतभूमि पर सर्प की भांति फन फैला रही विदेशी संस्कृति को उसके डसने से पहले ही रोक लिया जाए. क्योंकि जीवन की आधारभूत शैली मात्र भारत के पास है, जिसका फैलाव समस्त विश्व में होना है, भारत को विश्व गुरू बनकर उभारना है, ऐसे में उसका दूसरी संस्कृति के प्रति आकर्षण उसके अस्तित्व के लिए ठीक नहीं.

परन्तु ऋषिवर जब भारत को विश्वगुरु बनकर उभारना है तो उसके प्रधान के प्रति उठती विरोध के स्वर को आप नियंत्रित क्यों नहीं करते?”

जब तक चेहरे पर असहमतियों के कारण त्यौरियां चढी रहती हैं तब तक समझिये आपको रोग घेरे रहेंगे, लेकिन सारी असहमतियों के बावजूद आपके चेहरे की मुस्कान दिन ब दिन प्रगाढ़ होती जा रही है तो समझिये आप स्वस्थ देह ही नहीं, स्वस्थ आत्मा के साथ अपने जीवन पथ पर आगे बढ़ रहे हैं, और तब आपका जीवन आपके अकेले का नहीं होता तब लाखों करोड़ों लोग आपकी इस प्रगाढ़ मुस्कराहट से आकर्षित होकर आपके साथ चलने को लालायित रहते हैं… और यह प्रगाढ़ और वास्तविक मुस्कान प्रतिकूल परिस्थितियों की अग्नि में जलकर ही प्रकट होती है. तपस्या का अर्थ मात्र जंगल में आँख बंद करके बैठ जाना नहीं होता, तपस्या का वास्तविक अर्थ होता है, सुविधा के अभाव और प्रतिकूल परिस्थतियों में भी अपनी चेतना को जागृत रखना.
और देखा जाए तो राजनीति का अर्थ भी यही होता है कि राजा राष्ट्र के हित के लिए ऐसी नीतियाँ बनाएं जो सबके कष्ट दूर करके सबके सुख समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति में सहायक हो…

“लेकिन सच जानते हुई भी ये कर्फ्यू और लॉक डाउन का क्या औचित्य होगा गुरुवर?”

देखो विराट, यूं तो कृष्ण जानते थे कि कौरवों का अंत निश्चित है फिर भी युद्ध आवश्यक था क्योंकि श्रीमद्भागवत गीता का अवतरण होना था मानव जगत के कल्याण के लिए…

“अब यहाँ कौन सी गीता का अवतरण होना है?”

हर युग में गीता का अवतरण होता है बस उसको लिपिबद्ध करने का तरीका बदल गया है, देश में विघटनकारी तत्वों ने इतनी गहरी पैठ बना ली है कि चाहते हुए भी भारत की सरकार उन्हें बाहर नहीं निकाल सकती वर्ना उनके सम्प्रदाय के लोग विरोध में उतर आएँगे, और देश में आतंक फैला देंगे… मृत्यु का भय एक मात्र रास्ता होता है जब आप लोगों को जीवन का वास्तविक अर्थ समझा सकते हैं. और भय का केवल एक ही रूप नहीं होता, कुछ प्रयोगों में भय जानबूझकर उत्पन्न किया जाता है ताकि…

“ये तो उसी बैग पाइपर वाली कहानी की याद दिला रहा है, जब सारे चूहों को निकालकर समंदर में धकेल दिया जाता है… “

हाँ अब इसको सरल भाषा में समझो… पिछले वर्ष भारत के कुछ प्रदेशों में चिकनगुनिया का प्रकोप हुआ था… अभी तो देश भर में कोरोना से मरने वालों की संख्या कम होगी जबकि कुछ प्रदेशों में एक ही शहर में 200 से अधिक की मृत्यु चिकगुनिया से हुई थी, तब यह कर्फ्यू क्यों नहीं लगा???

“क्योंकि यह विश्वव्यापी नहीं था… “

बिलकुल … उस समय ऐसा कोई भी कदम निरी मूर्खता कही जाती और कोई इसका पालन नहीं करता… संभवत: लोग विरोध में उतर आते. अब चूंकि कोरोना से मरने वालों का एक एक आंकड़ा नोट किया जाएगा तो पूरे विश्व की नज़र इस पर होगी… ऐसे में राजा का कर्तव्य होता है कि सारी असहमतियों के बावजूद कुछ ऐसी योजनाओं को लागू किया जाए जिससे पिछले कई वर्षों की ऐसी समस्याओं का निराकरण हो जाए जो सामान्य परिस्थितियों में संभव नहीं…

“यानी बहती गंगा में हाथ धोना???”

हाँ बिलकुल और वो भी बिना सेनिटाइज़र लगाए हा हा हा

“और जो आर्थिक मंदी की मार का मुद्दा उठेगा उसका क्या??”

एक राजा के लिए क्या अधिक आवश्यक है देश में शांति या देश में विघटनकारी लोगों के बढ़ते क़दमों के साथ आर्थिक उन्नति? जब दो में से एक का चुनाव करना हो तो राजा पहला विकल्प चुनेगा… क्योंकि आर्थिक मंदी को अपनी व्यापारिक बुद्धि और मेहनत से वो दोबारा सफलता में बदल सकता है परन्तु यदि देश में अशांति हो और देश टूटने की कगार पर हो, आतंक का बोलबाला हो तो देश आर्थिक रूप से कितना भी आगे बढ़ जाए उसका पतन निश्चित है/

“इन पांच वर्षों में क्या क्या कर लेगी सरकार??

बात मात्र पांच वर्षों की नहीं है, बात है राष्ट्र की नींव को इतना मज़बूत कर देना कि चाहे महामारी प्राकृतिक हो या शत्रु देश की फैलाई हुई हो, सबका आत्मबल इतना मज़बूत कर दो कि अगली कई पीढी तक कोई उन्हें टस से मस न कर सके… और राजा जब अपने दल के लिए नहीं राष्ट्र के लिए काम करता है तो वह पांच वर्ष की नहीं पांच पीढ़ियों की योजना बनाकर काम करता है…. जिस देश में प्रादेशिक विभिन्नता के बावजूद जब राजा एक सांस्कृतिक अंतर्धारा से सबको बांधें रखने का प्रयास करता है तो अस्तित्व भी उसके लिए अपनी योजनाएं प्रस्तुत करती है.
और जहाँ तक आर्थिक मंदी का प्रश्न है तो बहुत अंतर नहीं आएगा, ये कुछ ऐसा ही है जैसे एक मध्यम वर्गीय परिवार की सीमित आय में अचानक से किसी व्यक्ति को खतरनाक रोग होने से बचत का पैसा खर्च हो जाना… दूसरी ओर उन परिवारों में खर्च से अधिक बचत होगी जिनकी आय का अधिकतर हिस्सा, सैर सपाटे, विलासिता, भोग और आवागमन में इंधन के कारण खर्च हो जाता था, वह बचेगा, आवश्यकता मात्र भोजन पानी की होगी तो लोग उससे अधिक कहाँ खर्च करेंगे. तब उनका पैसा गरीब लोगों की ओर प्रवाहित होगा.

“परन्तु उत्पादन भी तो बंद हो जाएगा देव?”

कुछ समय के लिए… बाद में सबकुछ व्यवस्थित हो जाएगा, लोगों को दोबारा से काम प्रारम्भ करने के लिए दोगुना प्रयास और मेहनत करना होगी. इस बीच कुछ संपन्न परिवारों की ओर से दान होगा, गरीबों के लिए भोजन की व्यवस्था, पुलिस और सेना की सशक्त भूमिका का उभरकर आना, जिन डॉक्टर्स की छवि लोगों के सामने लगातार खराब हो रही है लोगों के मन में दोबारा से उन्हें भगवान् मान लेना, घर में महिलाओं को पूरा परिवार दोबारा मिलना, ये सब विपरीत परिस्थितियों में ही संभव हो सकेगा. प्रकृति का दोबारा ताज़ा होना, प्रदूषण कम हो जाना… ये सब…

“और किसानों और व्यापारियों का काम जिनकी बदौलत से पूरा देश घर बैठे भोजन पाएगा?”

शुरुआती अव्यवस्था के बाद सबको अपनी-अपनी भूमिका समझ आ जाती है, रोज़ के कामों में एकदम से बदलाव आ जाने से थोड़ी तो अव्यवस्था तो फैलती ही है लेकिन धीरे धीरे उन सबका काम भी व्यवस्थित कर दिया जाता है…. और जो गरीब तबके के लोग एक ही तरह के काम जीवन भर करते आये हैं, जिसकी वजह से उनके जीवन में संघर्ष और जिजीविषा ख़त्म हो चली थी उन्हें मजबूरी में ही सही अपना व्यापार या काम बदलना पड़ेगा, जीवन में एक नया संघर्ष नई परिस्थतियों के लिए जब जन्म लेता है तो चेतना में पड़े आलस्य के बीज नष्ट होते हैं.
देखो प्रकृति ने इतनी व्यवस्था कर रखी है कि कोई भूखा नहीं मर सकता. मरेंगे वो जिनमें जीवन तत्व की कमी है, उनकी मृत्यु से अधिक सशक्त और जिजीविषा वाले लोग बचेंगे… मानव नस्ल के उद्धार के लिए कमज़ोर की बलि युगों से चढ़ती आई है. जो सशक्त होगा वह बना रहेगा और वही मनुष्य के अस्तित्व के लिए आवश्यक है अभी. उसी से उसकी नस्ल और अधिक मज़बूत होगी.

“और इस रोग का उपचार ??”

मनुष्य का शरीर इस तरह से बना है कि जब भी कोई विषाणु आक्रमण करता है तो शरीर उससे लड़ने के लिए स्वयं ही सक्रिय हो जाता है लेकिन उसके लिए ज़रूरी है कि उसकी जीवन शैली अनुशासित हो. और यह तभी संभव हो सकता जब लोग अपने स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति अधिक सजग हो, बाहर का खाना वह भी विदेशी जीवन शैली का खाना बंद हो, यह व्यक्तिगत अनुशासन आप सामान्य परिस्थितियों में हाथ पैर जोड़कर भी नहीं ला सकते… लेकिन मृत्यु का भय हर किसी को संयम सिखा देता है…. और इसका प्रभाव इतने समय तक रहेगा कि लोग दोबारा से अपनी प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न कर लेंगे.
और वैसे भी इसे विदेशी संस्कृति की ओर से छद्म युद्ध की तरह प्रस्तुत करना होगा, एक षडयंत्र, जैसे उन्होंने भारत के अस्तित्व को समाप्त करने अपनी संस्कृति का समावेश करने का षड़यंत्र रचा था… और जब षडयंत्र का पर्दा उठता है तो उसके प्रति लोगों का विकर्षण भी बढेगा.

और सरकार का विदेशी संबंध ?

सिर्फ भारत देश ही नहीं, पूरा विश्व सहअस्तित्व का सम्मान करके ही आगे बढ़ सकता है यह पूरी दुनिया जानती है, कोई एक देश अपने आप को सबसे अलग करके कभी उन्नति नहीं कर सकता… वर्ना उसका हश्र चीन जैसा होगा… बाहरी रूप से देखने पर वह कितना ही समृद्ध दिखे, वह अन्दर से धीरे धीरे नष्ट हो रहा है.
राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता के अलावा विश्व एकता की अंतर्धारा भी ऐसी है जिसे हम देख नहीं सकते परन्तु अनुभव कर सकते हैं… तो जब एक व्यक्ति कमज़ोर होता है तो दूसरा आकर उसे थाम लेता है ऐसे ही देशों के बीच के सम्बन्ध होते हैं, तो भारत के राजा की जिन विदेश यात्राओं के आलोचना हुआ करती थी वही यात्राएं अब आनेवाले समय में वरदान साबित होगी…
कुछ आक्रान्ता और असंयमी लोग और विशेषकर प्रधानमंत्री की हर योजना में बाधा खड़ी करनेवाले लोगों के मुखौटे उतरेंगे, कुछ जो प्रधानमंत्री से सहमत होते हुए भी विपक्ष में हैं उन्हें भी प्रधानमंत्री के नियमित वार्तालाप से देश के प्रति मिलकर काम करने के लिए प्रेरणा मिलेगी…

कुछ क्षेत्रों में अव्यवस्थाएं जानबूझकर पैदा की जाएगी परन्तु यही समय होगा जब कुछ समय की अव्यवस्था के बाद आसपास के लोगों के सहयोग और राज्य सरकार की भूमिका सशक्त होगी, उनके निर्णय स्वयं लेने की स्वतंत्रता मिलने पर वे स्वयं भी ऐसे प्रयास करेंगे जिससे उनकी सरकार का बल मज़बूत हो, ऐसे में वो कम से कम जनता की भलाई के लिए काम करेंगे, अब यहाँ काम सिर्फ कागज़ पर नहीं होंगे, ज़मीनी कार्य दिखाने के लिए मीडिया और सोशल मीडिया ने जो जिम्मा लिया है उससे वे राज्य भी अपने कार्य में कोताही नहीं कर सकते जो विपक्ष में हैं.

“तो मेरे लिए क्या आदेश है ऋषिवर?”

तुम्हें सबसे पहले भारत देश के संपन्न परिवारों की चेतना में प्रवेश कर उन्हें दान के लिए प्रेरित करना होगा, व्यापारियों की लोलुप बुद्धि पर संयम का अंकुश लगाकर देश को संकट के समय लूट न मचाने के लिए प्रेरित करना होगा, किसान वर्ग में शुरुआती विवशता की स्थिति रहेगी परन्तु जिस प्रदेश में जो वनस्पतियाँ और अन्न उगेगा उसे उसी प्रदेश में खाए जाने से लोगों के स्वास्थ्य में सुधार होगा, दूसरे प्रदेशों से आने वाले कीटनाशक लगे फल व् सब्जियों पर प्रतिबन्ध लगेगा. विदेशों से आयात निर्यात कम होगा तो लोग स्वदेशी वस्तुओं के व्यापार की ओर उन्मुख होंगे.

“ऋषिवर इस देश का सबसे बड़ा तबका जो रोज़ कमाता है रोज़ खाता है उनके लिए क्या करने का आदेश है…?”

देखो विराट देश के विद्वान यदि देश का मस्तक है, व्यापारी पेट है, पुलिस डॉक्टर्स सेना देश के हाथ है, तो देश का यह वर्ग उसके पैर हैं, सारे अंग क्रियाशील होने पर भी यदि वह कदम आगे न बढ़ा सके तो इन सबके क्रियाशील होने का क्या लाभ…
देश की चिति यानी प्राण तो यही है… पाँव चलेंगे तो पूरा शरीर आगे बढेगा… उनके लिए विशेष व्यवस्थाएं होना चाहिए क्योंकि उनकी जीवन शैली अभी उतनी आधुनिक नहीं हुई है जितनी मध्यम वर्गीय और संपन्न परिवारों की हुई है… उनका हमें विशेष विचार करना होगा… जब तक शरीर के बाकी अंगों को अपनी भूमिका का ज्ञान नहीं हो जाता इन परिवारों को सुचारू रूप से जीवन चलाए रखने के लिए सहायता देनी होगी…

“एक अनुरोध मैं अपनी तरफ से करना चाहता हूँ ऋषिवर “

कहो विराट

“भारत भूमि पर सुप्त हो चुकी स्त्री शक्ति को दुबारा जागृत करने का यहाँ कोई विधान दृष्टिगत नहीं हो रहा, क्या उनकी चेतना में मुझे प्रवेश करने का आदेश नहीं है?”

देखो विराट, स्त्री के साथ दुविधा यह है कि पुरुष से भिन्नता को वो दासता समझने लगी है, उसके कार्य पुरुष से भिन्न और अधिक महत्वपूर्ण है, इसलिए उन्हें विशेष रूप से किसी और समय जागरूक करने की योजना बनेगी. क्योंकि इस समय स्वतंत्रता पाने के नाम पर उसने अपने नैसर्गिक स्वभाव को पूरी तरह से बदल दिया है. … वह स्वतंत्रता चाहती थीं, अपने पारंपरिक परिधानों को छोड़ आधुनिक पहनावे की स्वतंत्रता चाहती थीं, जो मिली उन्हें… वो अपनी मातृशक्ति को भुलाकर लेस्बियन होने की स्वतंत्रता चाहती थी जो मिली उन्हें, वो संयुक्त परिवार का विघटन कर एकल परिवार की स्वतंत्रता चाहती थी. वो भी मिली,उसके लिए छोटे-छोटे बच्चों को झूलाघर में छोड़ अपना करियर बनाने के लिए घर से निकलना भी मंज़ूर था उन्हें. क्योंकि उनका सवाल था बच्चे केवल औरत ही क्यों संभाले?

स्त्री ने स्वतंत्रता को आज़ादी का नाम देकर “स्व” के लिए बने उस “तंत्र” के अवहेलना की जो समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए आवश्यक था, उसने अपने लिए एक नए तंत्र की स्थापना की जिसे उसने स्वतन्त्र के स्थान पर परतंत्र ही बनाया. जैसे ही महिलाएं आधुनिक होने, आज़ाद होने निकल पड़ी अचानक से बलात्कार की घटनाएं बढ़ गयी, क्यों?
क्योंकि जैसे ही आप अपनी संस्कृति से मुंह मोड़ते हैं आपका आत्मिक बल कम हो जाता है. बलात्कार की घटनाओं का शारीरिक शक्ति से कोई लेना देना नहीं होता. ये वो पुण्य भूमि है जहां सीता एक तिनके के बल पर रावण को रोके हुई थी.

इसलिए यदि इस राष्ट्र को मज़बूत बनाना है अपनी सांस्कृतिक एकता वापस पानी है तो उस एकता की डोर इस देश की स्त्रियाँ हैं, हम उनकी विचार धारा को फिर से मोड़ने में सफल हुए तो हमारे देश का स्वास्थ्य ही नहीं संस्कृति \भी लौट आएगी, और यह काम एक स्त्री ही बेहतर तरीके से कर सकती है इसलिए हमें किसी स्त्री को इस योजना के लिए प्रतिनिधि चुनना होगा. परन्तु अभी यह अनुकूल समय नहीं है.

“जो वर्ग इस रोग के भय में नहीं, कुछ डॉक्टर्स और आयुर्वेदज्ञाता जो वास्तविकता जानते हैं उनका स्वर भी तो मुखर होगा और लोग दुविधा में पड़ेंगे.”

कुछ लोग इस दुविधा में होंगे कि यदि यह विषाणु इतना ही भयानक निकला जितना प्रचार किया जा रहा है तो क्या होगा क्योंकि उनके पास कोई प्रामाणिक तथ्य नहीं है, वे एक संभावना लेकर चल रहे हैं. जिनके पास प्रमाण है उन पर बड़ा वर्ग विश्वास करते हुए भी जीवन दांव पर लगाने को तैयार नहीं होगा. इस बीच हम योजना कार्यान्वित करने में सफल होंगे, तब इन्हीं लोगों के स्वर मुखर करना होंगे और विश्व भर में भारत के आयुर्वेद के ज्ञान, यज्ञ, हवन और ग्रामीण जीवन शैली का महत्व उभर कर आएगा.

फिर कुछ महीनों बाद आंकड़ा धीरे धीरे कम दिखाया जाएगा और इस बीच युवा वैज्ञानिकों और डॉक्टर्स को प्रेरित किया जाएगा कि वह इसका वैक्सीन निकाले, क्योंकि देश में बना वैक्सीन तो सस्ता रहेगा और विदेश से मंगवाना भारत को बहुत महंगा पड़ेगा. इसके भी दो पहलू है, महंगा रहेगा तो हर किसी को लगाना अनिवार्य नहीं होना चाहिए , Vaccination एकदम से बंद करना फिलहाल संभव नहीं है लेकिन जैसे जैसे आयुर्वेद का प्रचलन बढ़ेगा इसकी मांग धीरे-धीरे कम होती जाएगी, कई परिवार सामने आये हैं जो अपने बच्चों को वैक्सीन नहीं लगवा रहे… उनकी संख्या अभी नगण्य है, जितना समय वैक्सीन को स्थापित करने में लगा है उतना समय इसको बहार निकालने में भी लगेगा… उतने समय तक हमें वैक्सीन को साथ लेकर ही चलना होगा… जैसे यदि किसी शराबी व्यक्ति को तुरंत शराब बंद करने को बोलेंगे तो वो उसका मनोबल उतना नहीं होगा कि वो तुरंत छोड़ दे, लेकिन एक चतुर व्यक्ति उसकी शराब छुडवाने के लिए कुछ दिन उसके साथ बैठकर शराब पिएगा फिर धीरे धीरे उसकी मात्र कम करेगा, और फिर ….

“परंतु लोग कैसे इस बात पर विश्वास करेंगे?”

क्यों नहीं, प्रारंभ में जिस सेनिटाइज़र, साबुन और टेस्ट किट का बोलबाला होगा, उसके दुष्परिणाम सामने आते ही लोग उससे दूर भागेंगे, वैसे ही वैक्सीनेशन के साथ होगा.

“ऋषिवर एक अंतिम प्रश्न”

पूछो वत्स

“सूक्ष्म सत्ता में क्या कोई योजना बन रही है? विश्व में इतनी उथल पुथल क्यों?”

ज्योतिष के अनुसार तृतीय विश्व युद्ध प्रारम्भ हो चुका है, पहले कुछ वर्ष छद्म युद्ध होगा, फिर हो सकता है इसे उग्र रूप देना पड़े, फिर किसी तपस्वी के माध्यम से सनातन मूल के धर्म और शांति की स्थापना होगी और भारत विश्व गुरू बनकर उभरेगा.

“यह ग्रह नक्षत्र तो आप सूक्ष्म सत्ता के हाथ का ही तो खेल है, फिर उसके लिए ये सब??”

तुम्हारे प्रश्न कभी समाप्त होंगे विराट??

हमारा पूरा अस्तित्व ही तो प्रश्न उत्तर पर आधारित है, आपने ही कहा था ना, नई गीता का अवतरण होना है तो पहली गीता भी तो अर्जुन और योगेश्वर के प्रश्न उत्तर का ही तो सार है.”

तुम बहुत चतुर हो विराट

“मेरा उद्गम स्थल भी तो यही भारत भूमि जो है देव, मैं इस देश की चेतना हूँ जिसे विराट कहा गया है.”

हाँ जब तक मनुष्य की चेतना में प्रश्न जन्म लेते रहेंगे तब तक उसकी यात्रा जारी रहेगी, कुछ भौतिक स्तर पर प्रश्न उठाते हैं, तो कुछ आध्यात्मिक स्तर पर… तो सुनों, यह भौतिक जगत, परम सत्ता जिसे हम ईश्वर कहते हैं, उनका ही स्वप्न है जब जब मनुष्य इस स्वप्न को सच मानकर अपनी भूमिका अपने अनुसार निभाने लगता है तो ईश्वर को हस्तक्षेप करना पड़ता है… उसे प्रकट होकर बताना पड़ता है कि मनुष्य इस सम्पूर्ण अस्तित्व में एक कण बराबर है. अति आधुनिकता ने मनुष्य के मूलभूत स्वभाव में विकृति ला दी थी, उसके लिए आवश्यक था कि उन्हें जीवन की मुख्य धारा से अचानक से अलग कर दिया जाए तो उन्हें मजबूरी में ही सही वापस अपनी मूलभूत जीवन शैली की ओर लौटना पड़ेगा.

और यह युद्ध?

यह युद्ध एक देश का दूसरे देश से नहीं, ना ही एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य मनुष्य से है, यह युद्ध उसका स्वयं से है. विराट इस राष्ट्र की चेतना को कहते हैं तो प्राण को चिति कहा जाता है, और इस युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका तुम्हारे साथ देश की चिति यानि प्राण की है. मनुष्य के मन में दुर्बल हो चुकी बल्कि सुप्त हो चुकी उन शक्तियों को जगाना है जिसकी वजह से उसका अस्तित्व है…
और अब एक अंतिम बात यह विषाणु जिसे मनुष्य वायरस कहता है अभी तो रोग के रूप में उनको दिया जाएगा ताकि वे गुलामी से मुक्त हो सके… यह गुलामी अपनी कामनाओं की है … और भारत से ही इस स्वतंत्रता का संघर्ष आरम्भ होता है क्योंकि भारत भूमि में जन्म लेने वाली चेतना में शक्तियों को जागृत करने की संभावना अधिक है, कोरोना तो एक बहाना है उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति की ओर उनको लौटाने की… बहुत जल्द एक वायरस और आएगा…

“एक और वायरस??? पुन:?”

हाँ परन्तु यह वायरस मनुष्य के उस स्वभाव को बदलने के लिए होगा जब वह आभासी दुनिया की गुलामी की गर्त में धंस जाएगा… तब एक वायरस मैं उनके इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं पर भेजूंगा और पूरी दुनिया जिस आभासी दुनिया से एक दूसरे से जुडी है वो एक दूसरे से एकदम कट जाएगी, तब संबंधों को बनाने के लिए एक बार फिर उन्हें घर से निकलना होगा, अपने मोबाइल कम्प्यूटर में घुस चुका मनुष्य जब उससे आँखें हटाएगा तो एक नया संघर्ष उनके जीवन में होगा, लोग आपस में मेल मिलाप फिर बढ़ाएंगे, अतिथि देवो भव की प्रथा पुन: प्रारंभ होगी, पत्राचार और चिट्ठियों की प्रतीक्षा से सम्बन्ध में प्रगाढ़ता आएगी, लोगों का भ्रमण बढेगा, प्रकृति को देखने का उन्हें समय मिलेगा… एक बार फिर वो प्रकृति से जुड़ेंगे…
एक वायरस जिसने उन्हें घर में कैद किया दूसरा वायरस उन्हें अपने ही बन्धनों से मुक्त करेगा, क्योंकि मनुष्य की नियति उसकी मुक्ति है… इन छोटी छोटी गुलामी से मुक्त करने के लिए उन्हें बड़े बड़े भय देना होता है समय समय पर…
विराट अब कोई नया प्रश्न खड़ा नहीं करना… क्योंकि मैं भी सूक्ष्म सत्ता का एक सन्देश वाहक मात्र हूँ… उनके लिए यह बहुत छोटी छोटी बातें हैं… कोई बहुत बड़ी योजना मनुष्य के उद्धार के लिए वहां बन रही है…

“अर्थात ईश्वर सच में नींद से जाग गए हैं देव?”

ईश्वर को स्वप्न देखने के लिए सोना नहीं पड़ता… यह उसकी जागती आँखों का सपना है… और उसे साकार बनाए रखने के लिए ही वह अपनी ऊर्जा पूरे विश्व में बांटता है…

“फिर यह किसी सम्प्रदाय, मज़हब के लिए इतनी निर्दयी क्यों या किसी एक देश के लिए निर्दयी और भारत जैसे देश के लिए दयालु क्यों?जब उसके लिए सब मनुष्य बराबर है?”

नहीं ईश्वर की दृष्टि में आज भी सब एक है… बस ऐसे विचारों वाले सम्प्रदाय और देश के प्रति ज़रा कठोर होना होता है जो मनुष्य के अस्तित्व के लिए खतरा है… जो ईश्वर का स्वप्न तोड़ना चाहते हैं

अब जाओ माँ काली सबका कल्याण करे, कभी कभी भय मुक्त करने के लिए भयभीत करना आवश्यक होता है… जाओ अब लोगों के मन में रोग का भय फैलाओ परन्तु ध्यान रहे, साहस, संकल्प और संयम इस भय से सदैव ऊपर रहे.

  • माँ जीवन शैफाली (9109283508)

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  1. प्रकृति का यह खेल समझ में आता है । समयानुकूल हमारे जैसे लोग परिवर्तनशील हैं,आगे ईश्वर की इच्छा ।

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