हमें उत्सव मनाना चाहिए, कि आज डर गए हैं अर्बन नक्सल

Corona Virus, COVID-19

अर्बन नक्सल के मन में आम भारतीयों द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को दिए जा रहे सतत समर्थन को लेकर इतना ज़हर भरा हुआ है कि प्रधानमंत्री के आह्वान पर भारतीयों द्वारा शंख, घंटा, घंटी, ढोल, मंजीरा, थाली, चम्मच इत्यादि बजाने को लेकर वे अब भारत और मध्यम वर्ग दोनों को गाली बक रहे हैं।

एक अर्बन नक्सल लिखता है कि यह (शंखनाद तथा अन्य कोलाहल) अधीनता स्वीकार करने की सराउंड साउंड है, जिसे ‘डियर लीडर’ (प्रधानमंत्री मोदी पढ़िए) के लिए बजाया जाता है, जिससे उसे संकेत मिलता है कि वे सभी (भारतीय) बिना किसी प्रश्न के वशीकरण स्वीकार कर लेंगे। फिर वह लिखता है कि इस राष्ट्र को (भद्दी गाली) और इसके मध्यम वर्ग को (भद्दी गाली)।

कुछ देर पश्चात् वह गाली वाली ट्वीट डिलीट कर देता है; लेकिन उसके मन में राष्ट्र के प्रति भरा हुआ विद्वेष सबको पता चल जाता है। यह अर्बन नक्सल ‘वायर’ और ‘कारवां’ जैसे ऑनलाइन मीडिया के लिए लिखता है।

ऐसे ही कुछ अन्य अर्बन नक्सल हैं जो भारतीयों के इस कोलाहल का ना केवल उपहास उड़ा रहे है, बल्कि भारतीयों व प्रधानमंत्री मोदी के लिए अपशब्द कह रहे हैं।

इनकी पीड़ा यह नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी के अनुरोध पर भारतीयों ने मेडिकल, पुलिस, एयरपोर्ट के कर्मचारियों के लिए आज सामूहिक रूप से उद्घोष किया।

इनका अवसाद यह है कि शाहीन बाग़ का साढ़े तीन महीने का ड्रामा, दिल्ली के प्रायोजित दंगे, नागरिक संशोधन कानून के विरोध में असम तथा अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में प्रदर्शन (जो शाहीन बाग़ के प्रदर्शन के झूठे मुद्दे से अलग हैं); जम्मू-कश्मीर, शाहीन बाग़, दिल्ली दंगो पर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में प्रायोजित मोदी विरोधी समाचारों को इन लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में कमी के रूप में ले लिया था।

हालाँकि वे राष्ट्र एवं मध्यम वर्ग को भद्दी से भद्दी गाली दे रहे हैं, लेकिन तथ्य यह है कि आज भारत का समृद्ध एवं निर्धन वर्ग, झुग्गी-झोपड़ी के निवासी, पूर्वोत्तर राज्यों तथा दूर-दराज के गाँवों के निवासियों ने भी बढ़-चढ़कर इस राष्ट्र निर्माण में भाग लिया।

देश-तोड़क शक्तियों के इस भ्रम को भारतीयों ने प्रधानमंत्री मोदी के एक अनुरोध पर आज शंखनाद करके हवा में उड़ा दिया।

आज अर्बन नक्सल ने समझ लिया है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व को शक्ति आम नागरिकों को भारतीय होने की अनुभूति तथा एक वृहद, एक तरह से अदृश्य, सनातनी समाज से जुड़े होने के कारण मिलती है। चाहे वह भारतीय बिहार के सुदूर गाँव के एक मंदिर में घंटी बजाते हुए साधु-संत एवं वृद्ध हो, या फिर न्यू यॉर्क में बैठा हुआ भारत माँ का सुपुत्र।

प्रधानमंत्री मोदी के द्वितीय कार्यकाल के प्रथम वर्ष में बुना जाने वाला दुष्चक्र आज टूट गया है।

इसीलिए वे भयभीत हैं, अवसाद में हैं, तथा राष्ट्र एवं समाज को कोस रहे हैं।

मुझे यह डर अच्छा लगा है।

आज मैं उनके इस डर का उत्सव मनाऊंगा।

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