भारत के विरोध में आकार लेता अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र!

इस वर्ष 30 जनवरी को, भारत जब महात्मा गांधी के सार्धशताब्दी वर्ष में उनका पुण्यस्मरण कर रहा था, उसी समय केरल में चीनी वायरस कोरोना का पहला मरीज़ मिला। दो महीने बाद, 31 मार्च को दिल्ली सरकार को पता चला कि निज़ामुद्दीन के तबलीगी जमात के मुख्यालय में मरकज़ के लिए आए हुए लगभग 2,500 लोग रह रहे हैं।

इस समाचार से प्रशासन चौंका, पुलिस चौंकी। देश अचरज में पड़ गया। पूरे देश में लॉकडाउन। सब कुछ ठप्प। शारीरिक दूरी बनाने का आग्रह। और चार सौ यात्रियों के रहने की क्षमता वाले, तबलीगी जमात के मुख्यालय में 2,500 लोग ठूंस-ठूंस कर भरे हैं…!

दिनांक 31 मार्च और 1 अप्रैल को, वहाँ से 2,361 जमातियों को पुलिस ने बाहर निकाला। जांच में पता चला कि विदेशों से आए हुए अनेक जमाती, देश के विभिन्न हिस्सों मे, मस्जिदों में रुके हैं।

1 अप्रैल को, जमातियों की जांच होने के पहले तक, भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या थी 1,991। दिनांक 5 अप्रैल को यही संख्या पहुच गई 4,067, जिसमें से 1,445 संक्रमित तबलीगी जमात से संबंधित थे। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अपने देश में 1 अप्रैल तक, संक्रमितों की संख्या दुगुनी होती थी, 7.1 दिनों में। लेकिन तबलीगी जमात के सामने आने के बाद, अपने देश में हर 4.1 दिनों में संक्रमितों की संख्या दुगुनी होती गई।

1 अप्रैल को विश्व में कोरोना संक्रमितों की संख्या थी, 8 लाख 60 हजार। 42 हज़ार लोगों की कोरोना से मृत्यु हुई थी। 1 अप्रैल को ही भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या थी 1,991 और 62 लोगों की मृत्यु हुई थी। अर्थात विश्व की तुलना में कोरोना संक्रमितों का हमारा प्रतिशत था, मात्र 0.23%। नगण्य। मृत्यु का प्रतिशत, विश्व की तुलना में था – 0.14% मात्र।

एक अरब तीस करोड़ की विशाल जनसंख्या और घनी बसाहट वाले हमारे देश ने पूरे विश्व के सामने इस महामारी से लड़ने का एक उदाहरण प्रस्तुत किया था। हम और अच्छे हो रहे थे, कि ये जमात का प्रकरण सामने आया। संक्रमितों की संख्या तेज़ी से बढ़ी। मृत्यु दर भी बढ़ी..। इसे फिर भी नियंत्रण में लिया जा सकता था। लगभग ढाई हजार जमातियों को पहचाना गया था। उन्हें और उनके संपर्क में आए लोगों को क्वारंटाईन करने से मामला सुधार सकता था।

लेकिन ऐसा होना नहीं था…

तबलीगी जमात के लोगों ने अपनी सही संख्या कभी नहीं बताई। उनके प्रमुख भूमिगत हो गए। कितने विदेशी आए थे, कितने भारत में रुके हैं और कहां रुके हैं, यह आज तक सही-सही नहीं बताया। विदेश से आए जमातियों को इन्होंने देश के विभिन्न स्थानों पर मस्जिदों में छुपा कर रखा। उन्हे ढूँढने जब पुलिस पहुंचती थी, तो पुलिस पर पथराव होता था। गोलियां चलती थीं।

जो 2,361 जमाती दिल्ली पुलिस ने क्वारंटाईन करने भेजे, उन्होने क्या किया..? समूची मानवता को शर्मसार करने वाले वे तमाम काम किए, जिसका उल्लेख करना भी कठिन हैं। खाना फेंक दिया। सिस्टर्स (नर्सेस) के सामने निर्वस्त्र खड़े हो गए। उनसे अश्लील हरकतें की। वॉर्ड के दरवाजे पर शौच की। पुलिस और डॉक्टर्स पर थूका….। सारी वीभत्स बातें की।

और देश के अन्य भागों में…? उनकी जांच करने आई हुई मेडिकल टीम को, डॉक्टर्स और नर्सेस को मार–मार के लहूलुहान कर दिया। उनके कपड़े फाड़े..। इंदौर में डॉक्टरों पर हमला करने वालों को जब पकड़ा गया, तो उनमें से कुछ कोरोना पॉज़िटिव पाये गए। उन्हें जबलपुर भेजा गया। उनमें से एक, जावेद खान, दिनांक 19 अप्रैल को अस्पताल से भाग गया..। अर्थात, जमात से संबंधित लोगों ने कहीं भी पुलिस और प्रशासन को सहयोग नहीं दिया।

आज तक यह चल रहा हैं। आज ही रायबरेली में कोरोना के 33 नए संक्रमित मिले हैं, जिनमें से 30, तबलीगी जमात से संबंधित हैं।

ये भारत की परिस्थिति थी और है। हम कमोबेश सभी इसे जानते हैं।

ये सब जब हो रहा था, तब भारत का स्थान विश्व में मज़बूत होता जा रहा था। जनसंख्या और बसाहट की तुलना में, हम फिर भी चीनी वायरस को नियंत्रण में रखे हुए हैं। भारी भरकम नुकसान की कीमत पर भी, हमने समूचे देश को बंद कर के, इस वायरस का फैलाव रोकने की हिम्मत दिखायी। ईरान, अमरीका समेत अनेक देशों को टेस्टिंग किट, अस्पताल के उपकरण, दवाइयाँ से लेकर तो ज़रूरी सामान तक, सारा मुहैया करवाया। एक सुदृढ़ और मज़बूत शक्ति के रूप में हम स्थापित हो रहे हैं।

ऐसे में स्वाभाविक है कि भारत का विरोध करने वाले लोगों को सक्रिय होना आवश्यक था। चीन के टुकड़ों पर पलने वाले वामपंथी और भारत के बढ़ते प्रभाव से घबराए हुए कुछ देश, एक हो गए। और फिर साकार होने लगा, भारत के विरोध में एक अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र – Mission_Defame_India.

भारत ने 23 मार्च से लॉकडाउन घोषित किया था। बरखा दत्त ने 26 मार्च को ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ में एक आर्टिकल लिखा। शीर्षक था, ‘As India goes into lockdown, fear spreads. Poverty may kill us first’.

बरखा दत्त, अरुंधति रॉय, सागरिका घोष, राजदीप सरदेसाई जैसे लोगों का अनुमान था, ‘इस लॉकडाउन को भारतीय झेल नहीं पाएंगे। इनको खाने के लाले पड़ेंगे और डर के कारण विद्रोह खड़ा होगा।

लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

अपना देश मात्र सरकारी तंत्र से नहीं चलता। यहां समाज सक्रिय हैं। संकट की इस घड़ी में एक अरब तीस करोड़ का राष्ट्रपुरुष जाग गया। एक–दो दिनों में सारे देश में व्यवस्थाएं बन गई। समाज तंत्र खड़ा हो गया। हर भूखे को खाना मिलने लगा। जो जहां हैं, वही उसकी चिंता होने लगी।

पुनश्च, सारा विश्व अचंभित हो कर भारत की ओर देखने लगा। पूरे विश्व में इस प्रकार की, संपूर्ण लॉकडाउन की हिम्मत किसी ने नहीं की। भारत ने की। इसलिए भारत के विरोध की एक नई लाइन ली गई। ‘इस्लामोफोबिया’ अर्थात भारत में इस्लाम के विरोध में वातावरण बन रहा हैं, ऐसा चिल्लाना। कोरोना के फैलाव के लिए भारतीय, इस्लाम को दोषी मान रहे हैं, ऐसा बार-बार बताना। तबलीगी जमात के विषय पर चुप रहना, लेकिन इस्लाम को सताने का मामला उठाना।

इसलिए 2 अप्रैल तक राणा अयूब जैसे लोगों ने लाइन ली थी कि मोदी, प्रेस की अभिव्यक्ति स्वतंत्रता छीन रहे हैं। 2 अप्रैल को न्यूयॉर्क टाईम्स में लिखे अपने आलेख में राणा अयूब लिखती हैं, ‘Under Modi, India’s press is not so free anymore‘ यह आलेख रविश कुमार के फोटो के साथ छपा है।

लेकिन तबलीगी जमात का प्रकरण सामने आने के बाद राणा अयूब का स्वर बदला। उन्होंने 6 अप्रैल को ‘न्यूयॉर्क टाईम्स’ में अपने आलेख में लिखा हैं – ‘Islamophobia taints India’s response to the Corona virus’. इसमें वो लिखती हैं, The hate found official support, when Mukhtar Abbas Naqvi, the Union Minority Affairs Minister in Modi’s cabinet, called the gathering by Tabligi Jamat, a ‘Talibani Crime’.

उज्बेकिस्तान, ताज़िजिकिस्तान, कज़ाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों में प्रतिबंधित, और अनेक दहशतवादी गतिविधियों में संलिप्त होने की आरोपी तबलीगी जमात को हथियार बनाकर विश्व के मंच पर, भारत को बदनाम करने का षडयंत्र साकार होने लगा।

फिर इसमें छलांग लगाई अरुंधति रॉय ने। एक मात्र सफल पुस्तक ‘God of Small Things’ की बदौलत, विश्व के मीडिया में स्थान बनाने वाली सुज़ाना अरुंधति रॉय (Suzanna Arundhati Roy) ने इस लड़ाई के लिए माध्यम चुना – डायचे वेले (Deutsche Welle) न्यूज़ अर्थात जर्मनी की सबसे बड़ी समाचार संस्था। जर्मनी में भी समाजवादी–साम्यवादी विचारों के लोगों की संख्या, मीडिया में अच्छी ख़ासी हैं। उन्होने सुज़ाना अरुंधति रॉय के इस साक्षात्कार के खूब भुनाया। शीर्षक था – Muslims in India accused of Corona Virus.

सुज़ाना अरुंधति रॉय ने इस में कहा हैं – ‘This crisis of hatred against Muslims, comes on the back of a massacre in Delhi, which was the result of people protesting against the anti-Muslim citizenship law. Under the cover of COVID-19 the government is moving to arrest young students, to fight cases against lawyers, against senior editors, against activists and intellectuals. Some of them have recently been put in jail.’

इन रॉय साहिबा ने आगे लिखा है कि ‘संघ और भाजपा, हिटलर की नाज़ी पार्टी जैसा व्यवहार कर रहे हैं और जिस प्रकार हिटलर ने ज्यू (यहूदी) लोगों का वंश विच्छेद किया वैसा ही ये लोग मुस्लिमों का नरसंहार कर रहे हैं।’

पूरे विश्व में भारत का ऐसा चित्र प्रस्तुत किया जा रहा हैं कि ‘भारत एक तानाशाह देश है, जिसे हिटलर के माफिक मोदी चला रहे हैं। यहां अभिव्यक्ति स्वतंत्रता खतरे में हैं। भारत में लॉकडाउन के कारण लोगों को खाने के लाले पड़ रहे हैं। लोग भूखों मर रहे हैं। और भारत में इस्लाम को कुचला जा रहा हैं, मुसलमानों का नरसंहार किया जा रहा हैं।’

शनिवार 18 अप्रैल को सुज़ाना अरुंधति रॉय का यह साक्षात्कार, डी डब्लू न्यूज़ ने दुनिया में वायरल किया और अगले दिन, 19 अप्रैल को टाइम्स ऑफ इंडिया के रविवार के संस्करण में सागरिका घोष का बड़ा सा आलेख आया – ‘Covid-19 can be cured, but who will cure the communal virus?’ लेख में वो लिखती हैं, ‘The Corona Virus can be cured, but who will cure the age old communal virus, that impacts India? Religious hatred, nurtured by the politics of bigotry (कट्टरपन) is a disease, India just doesn’t want to cure.’

इन सारे घटनाओं की क्रोनोलॉजी देखिये। ‘किसी कुशल निर्देशक ने अलग अलग पात्रों को, अलग अलग स्थानों से, तय समय पर एंट्री लेने के लिए कहना’ यह सब देख कर ऐसा ही लगता है।

इस समय वैश्विक स्तर पर चीन के बहिष्कार की बात चल रही हैं। पूरी दुनिया में, पर्याय के रूप में जो दो–चार नाम सामने हैं, उनमें दमदार नाम है – भारत। इसलिए, चीन के टुकड़ों पर पलने वाले लोगों का Mission_Defame_India साफ है – विश्व मंच पर भारत की छवि कट्टरता से भरपूर, असहिष्णु, तानाशाह के रूप में खड़ी करना और भारत में सरकार के विरोध में लोगों को रास्तों पर लाना।

इसलिए, यह जानते हुए भी कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट यदि एकदम खोल देते हैं, तो चीनी वायरस बढ़ने का खतरा हैं, सागरिका घोष का 21 अप्रैल का ट्वीट हैं – If #Lockdown2 become #Lockdown3, govt @RailMinIndia must start basic rail services across India + physical distancing norms. Public Transport is a lifeline of poor.

ये देश सफल नहीं होने देगा इन षडयंत्रों को…! इन्होंने दिल्ली में करने का प्रयास किया। सत्तर/ अस्सी हज़ार की भीड़ खड़ी कर दी। इनको लगा, केंद्र सरकार अब कैसे निपटेगी इनसे..? लेकिन दो रातों के बाद, यह इश्यू बिलकुल अप्रासंगिक हो गया। Non-issue बन गया। ऐसा प्रयास मुंबई के बांद्रा में भी हुआ। आगे भी होगा।

चीनी पैसों पर नाचने वाली कठपुतलियाँ अभी और तमाशे खड़े करेंगी।

पर ये ‘वो’ भारत नहीं है।

ये नया भारत है। शक्तिशाली। मज़बूत। दृढ़ता के साथ खड़ा होने वाला..। दमदार…!

ये षडयंत्र भी विफल होंगे और कठपुतलियां भी..!

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