हम दूसरे दर्ज़े के नागरिकों का भला न्याय पर कैसा अधिकार?

टूटते-फूटते कहानियां कई बार एक से दूसरे में मिल जाती हैं। ऐसी ही कहानियों में से एक गरीब परिवार की कहानी थी जिसमें पति-पत्नी और तीन बच्चे थे। गरीब व्यक्ति पूरी मेहनत के बाद भी जैसे-तैसे अपना और परिवार का पेट पाल पाता था।

राजधानी के पास रहने के कारण उसे हर रोज़ किसी ना किसी जगह मज़दूरी का काम मिल ही जाता था। जिस जगह ये परिवार रहता था, वहां एक बार अकाल पड़ा। धीरे-धीरे लोगों के पास जमा अन्न ख़त्म होने लगा।

समय और बीता, तो राजा ने भी अपने भंडार खोले मगर दूसरे वर्ष से जब अकाल तीसरे वर्ष भी खिंचता दिखा तो समस्याएँ बढ़ गयी। गरीब परिवार अब जैसे तैसे दान इत्यादि पर आश्रित था।

उसी वक्त अकाल से बचने और बारिश लाने की किसी ने राजा को एक जुगत बताई। कहा गया कि यदि राजा स्वयं अपने पुत्र की बलि दे-दे या फिर उसके बदले स्वेच्छा से कोई अपने बच्चे का जीवन दान करने को तैयार हो तो बारिश होगी। अब राजकुमार को कौन बलि पर चढ़ाता?

आस पास के इलाके में मुनादी हुई कि अगर कोई स्वेच्छा से अपने बच्चे को बलि के लिए दे-दे तो उसके परिवार को आगे राजा का आश्रय मिलेगा। धन-धान्य इत्यादि देने की बात भी हुई। कुछ दिन बीते मगर कोई सामने नहीं आया।

उधर गरीब परिवार के तीन पुत्र तो थे, मगर अपने बच्चे को कौन बलि चढ़ाता? खाने के जब लाले पड़ने लगे तो गरीब परिवार पर और दबाव आने लगा और वो लोग एक बच्चे को दे देने की सोचने लगे। अब सवाल था कि तीनों में से किसे दे दें?

पहले, सबसे बड़े पुत्र को देने के लिए पिता तैयार नहीं थे और तीसरे, सबसे छोटे को देने के लिए माता तैयार नहीं हुई। आखिर में दूसरे पुत्र को बलि के लिए देकर बदले में परिवार को बचा लेने की बात तय हुई।

परिवार राजा के दरबार में पहुंचा और दूसरे पुत्र को बलि वेदी से बाँध दिया गया। राजा ने आकर पूछताछ की और जांचना चाहा कि क्या ये दूसरा लड़का खुद ही अपनी मर्जी से आया है? पूछताछ में जैसे ही राजा को तसल्ली हुई, उसने बलि चढ़ाने की आज्ञा दे दी। जैसे ही खड्ग लिए बलि देने वाला आगे बढ़ा, वो बालक पहले तो रोया, और फिर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा!

इतनी कहानी सुनाकर, हमारा वेताल रुक जाता है। वो हमारे विक्रमादित्य से पूछता है, बताओ विक्रमादित्य, बालक हंसा क्यों और रोया क्यों?

हमारी कहानी के विक्रमादित्य कहते हैं कि बालक ने सोचा कि जिस माता-पिता पर अपने बच्चों की रक्षा का भार होता है वही उसे बलि के लिए ले आये हैं, और जिस राजा का कर्तव्य प्रजा की सुरक्षा था, वही उसकी बलि का आदेश दे रहा था। ऐसी विडंबना में किसी मदद की आशा ना देखकर बालक रो पड़ा। फिर उसे याद आया कि उसके जीवन दान से ना सिर्फ उसके परिवार के भोजन का प्रबंध हो जाएगा, बल्कि राज्य को भी दुर्भिक्ष से मुक्ति मिलेगी। तो अपने कर्तव्यों में पुण्य भी जुड़ता देख बालक हंस पड़ा।

कुछ दिन पहले पालघर (महाराष्ट्र) में साधु को पुलिसकर्मियों ने हत्यारी भीड़ के हवाले कर दिया था। मेरा ख़याल है कि जिसपर उसकी रक्षा का भार था, उन्हें हाथ छुड़ाकर भागता देख तो उन्हें रोना चाहिए था। नहीं, ये साधु तो हँसता हुआ दिखता है। आखिर क्यों हंसा होगा?

हम उसकी मृत्यु पर बड़े लोगों से संवेदना के एक वाक्य की अपेक्षा कर रहे थे। हम अब भी उसकी हत्या की जांच और दोषियों को दण्डित किये जाने की अपेक्षा रखते हैं। एक-आध दिन उसे याद करके फिर अपने काम में व्यस्त होने वाले भी हम ही हैं। राजनीतिक दबाव के बिना ही इस देश में दूसरे पुत्र की तरह दूसरे दर्जे के नागरिक यानी हिन्दुओं का भला न्याय पर कैसा अधिकार?

हमें पता नहीं कि दूसरे दर्जे के नागरिकों को न्याय ना मिलने पर ये साधु रोया होगा या नहीं, लेकिन उसके हंसने का कारण हमें मालूम है! ये तस्वीर दिखती है तो याद आता है कि दूसरे दर्जे के नागरिकों को ये अपेक्षा रखनी ही क्यों चाहिए? ये साधु पक्का हम पर ही हंस रहा होगा!

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