अपने नायक खुद चुनती हैं संघर्षरत सभ्यताएं

साल 2002 में गोधरा नरसंहार के बाद गुजरात की प्रतिक्रिया ने अपने नायक तलाशे थे, मोदी-शाह की जोड़ी ने उस दौर में जो भी किया और उसके बाद जो कुछ भी कमाया उसे गुजरात की एक पीढ़ी ने अपने खून से सिंचित किया था।

वह पीढ़ी मोदी-शाह के पीछे तनकर खड़ी रही तभी तो चुनाव दर चुनाव, साल दर साल गुजरात मॉडल बनता गया और गुजरात मॉडल से जुड़ी आशायें देश के मानस पर छाती चली गईं। गुजरात मॉडल में ही आगे चलकर कुछ इशरत जहाँ जैसों की कब्र खुदी और कुछ सोहराबुद्दीन जैसे दोज़ख रवाना हुए।

इसी गुजरात मॉडल ने नरेंद्र भाई मोदी को मर्द हिन्दू राष्ट्रवादी बनाया और 56″ के सीने ने 2014 और 2019 जीतकर एक लगभग हारी हुई सभ्यता को राजनीतिक बढ़त दिलाई थी। जनमानस की जिस आकांक्षा ने मोदी-शाह को लगभग अजेय बना दिया, अब उन्हीं को बेचारगी में छोड़कर मोदी-शाह राज भोग रहे हैं ऐसी सोच पनपने की आहट सुनाई देने लगी है।

राजनीति में वक़्त तेज़ी से बीतता है। तीन-तलाक़, धारा 370, श्री राम जन्मभूमि, बालाकोट अब बीते समय की बात लगने लगी है। ताज़ा सिर्फ़ दिल्ली के घाव हैं और उन घावों पर नमक छिड़कते इस्लामवाद परस्त वामपंथियों का सियार रूदन…

आहत हुई सभ्यता को मुक्तिमार्ग सिर्फ़ कपिल मिश्रा या महाराज योगी जी में दिख रहा है, अमित शाही बैठकों या मोदी की चुप्पी में अब विश्वास टूटने लगा है। दिल्ली के पीड़ित हिंदुओं की आह अब कूटनीतिक प्रवचन नहीं सुनना चाहती बल्कि राजदण्ड की राह देखने की आस लिए उसकी आँखें छलक जा रही हैं।

कोई तो हो जो दाँत पीसते हुए कहे कि ‘उन्होंने बहुत बड़ी गलती कर दी है, उन्हें इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी’… (जैसे नरेंद्र भाई ने राजस्थान की सभा में बालाकोट के बाद कहा था)।

हिन्दू समाज याचक भाव में नहीं खड़ा है, वह बस नायक का भरोसा चाहता है। फ़िलहाल मोदी-शाह-डोभाल उसे अतीत के नायक लगने लगे हैं। कपिल मिश्रा, योगी जी से कुछ आस है पर वह भविष्य के नायक हो सकते हैं। हिन्दू सभ्यता वर्तमान में असहाय सी खड़ी है यह आज का सच है।

मोदी-शाह इस सच को बदल सकते हैं, पर क्या वह यह करेंगे? यदि हाँ, तो देवत्व उनका मान बनेगा… यदि नहीं, तो हिंदुओं का इतिहास तो अंततः पराजित शासकों का ही इतिहास रहा है इस धारणा पर वक़्त की एक और मोहर भर लग जानी है।

जय श्रीराम।
वंदे मातरम।।

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