पवार को चाणक्य सिर्फ इसलिए मान लूँ क्योंकि ऐसा मीडिया ने बताया है?

जिन लोगों को राहुल गांधी में देश का भविष्य नज़र आता है, सिर्फ़ उसी तरह लोगों को ऐसी गलतफहमी भी है कि शरद पवार राजनीति के चाणक्य हैं। मीडिया छवि गढ़ता है और लोग बिना सोचे-समझे वही लकीर पकड़ लेते हैं।

शरद पवार जब पहली बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने, तब उनकी पार्टी की लगभग 50-55 सीटें थीं। आज लगभग चालीस सालों बाद भी उनकी पार्टी की सीटें लगभग उतनी ही हैं। उनके मुकाबले भाजपा को देखिए। जब शरद पवार 1978 में पहली बार मुख्यमंत्री बने, तब भाजपा का जन्म भी नहीं हुआ था। वही भाजपा पिछले दो चुनावों से महाराष्ट्र की सबसे बड़ी पार्टी है और उसकी सीटों की संख्या शरद पवार की पार्टी से लगभग दोगुनी है।

आज के कई ऐसे नेता हैं, जो 1978 में राजनीति में कहीं नहीं थे। शरद पवार की ही तरह ममता बनर्जी ने भी काँग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई। पिछले दस सालों से वो बंगाल में अपने दम पर राज कर रही है। जगन मोहन रेड्डी की उम्र तो शायद शरद पवार से आधी होगी, लेकिन वे भी अपने राज्य में अपने दम पर सरकार चला रहे हैं। मायावती और मुलायम सिंह यादव तो शरद पवार के महाराष्ट्र से भी बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में अपने दम पर सरकारें बना चुके हैं और पूरे पाँच साल चला भी चुके हैं। बिहार में लालू यादव भी ऐसा ही एक नाम है।

पूरे देश के ऐसे कई उदाहरण आपको मिल जायेंगे। उनके मुकाबले आप शरद पवार की पार्टी को देखें, तो पिछले चालीस सालों में भी वे 50-55 सीटों पर ही अटके हुए हैं। इसमें उनका कौन-सा पराक्रम है, जिसका गुणगान किया जाए? कोई व्यक्ति अगर किसी भी नौकरी या व्यवसाय में लगातार चालीस सालों तक काम करने के बावजूद भी कोई तरक्की न कर पाए, तो उसे सफल मानने का क्या कारण है? सच्चाई यह है कि शरद पवार केवल किसी तरह जोड़-तोड़ और जुगाड़ करके राजनीति में अपना गुज़ारा चलाते आ रहे हैं। उनकी पूरी राजनैतिक यात्रा इस बात की गवाही देती है।

कभी वे सोशलिस्ट काँग्रेस में रहे, कभी इंदिरा काँग्रेस में। कभी जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई, कभी काँग्रेस के साथ, तो अब शिवसेना के साथ बना ली। 1992 में जब उनकी बजाय नरसिंहराव को प्रधानमंत्री चुन लिया गया था, तब चाणक्य नीति कहाँ थी? जिस सोनिया गांधी के विरोध में काँग्रेस छोड़कर उन्होंने अपनी नई पार्टी बनाई, जब बाद में उसी सोनिया के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन में शामिल हो गए, तब नीति-अनीति का विचार कहाँ खो गया था?

केवल केंद्र में ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र में भी उनकी पार्टी ने उसी काँग्रेस के साथ गठबंधन करके सरकार चलाई थी। यहाँ तक कि गुजराल और देवेगौड़ा जैसे लोग भी भारत के प्रधानमंत्री बन गए, प्रतिभा पाटिल जैसी महिला राष्ट्रपति तक बन गई, लेकिन शरद पवार इनमें से कुछ भी न बन पाए। फिर उनको बाकियों से विशेष मानने का कोई कारण ही क्या है?

शरद पवार कई दशकों तक राज्य या केन्द्र में मंत्री या मुख्यमंत्री जैसे पदों पर रहे हैं। क्या आप गूगल देखे बिना पिछले चालीस सालों की उनकी दो-चार महान उपलब्धियां गिना सकते हैं?

1993 में मुम्बई में बम धमाके हुए और सैकड़ों लोग मारे गए। तब पवार ही मुख्यमंत्री थे। दाऊद इब्राहिम जब भारत से फ़रार हुआ, तब भी शायद पवार ही मुख्यमंत्री थे। 2005 से 2014 तक सोनिया सरकार में शरद पवार कृषि मंत्री रहे और उसी दौरान देश में लाखों किसानों ने कर्ज के बोझ में दबकर आत्महत्या कर ली थी, जिनमें सबसे ज़्यादा संख्या महाराष्ट्र के किसानों की ही थी। इनमें से किस बात को मैं शरद पवार की उपलब्धि में गिनूं? ये सब तो प्रशासकीय विफलता की कालिख के दाग हैं!

जिस राजनेता की पार्टी चालीस सालों में भी अपनी सीटें न बढ़ा पाई हो, जिस मंत्री या मुख्यमंत्री के शासन में लाखों लोगों की अकाल मौतें हुई हों, जिसकी पार्टी के कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में जांच चल रही हो, उसे मैं चाणक्य जैसा सफल, महान और तीक्ष्ण कैसे मान लूँ? क्या सिर्फ इसलिए कि वह राजनेता किसी न किसी पार्टी को समर्थन देकर किसी तरह जोड़-तोड़ की सरकार में शामिल होने का जुगाड़ कर लेता है? यह काम तो राम विलास पासवान और रामदास आठवले जैसे नेता भी कर लेते हैं, तो क्या इनको भी चाणक्य मान लूँ या शरद पवार को सिर्फ इसलिए मान लूँ क्योंकि ऐसा मीडिया ने बताया है?

याद रखिये कि महाराष्ट्र में शिवसेना को मुख्यमंत्री पद का लालच देकर सत्ता में हिस्सेदारी पा लेना कोई महान उपलब्धि नहीं है। यह काम भाजपा भी कर सकती थी क्योंकि शिवसेना तो खुद ही मुख्यमंत्री पद के बदले खुद को बेचने का ऑफर लेकर घूम रही थी। महान पराक्रम या कूटनीति तब मानी जाती, अगर शरद पवार इसके बावजूद भी शिवसेना से समर्थन लेकर अपनी पार्टी का मुख्यमंत्री बनवा लेते। जो खुद ही बिकने को तैयार बैठा हो, उसे खरीदने में कौन-सा परिश्रम लगता है? असली कसौटी तब होती है, जब आप कोई ऐसा सामान खरीद लाएं, जिसे दुकानदार बेचने को ही राज़ी नहीं था। शरद पवार अभी तक ऐसा कोई कमाल नहीं दिखा पाए हैं।

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