अटलजी ने 20 वर्ष पहले ही ठोकर मार दी थी, उसी नीति पर आज अमल कर रही है भाजपा

वर्ष 1999 में भाजपा+शिवसेना गठबंधन को 125 सीटें मिली थीं। कांग्रेस+एनसीपी गठबंधन को 133 सीटें मिली थीं। निर्दलीय एवं छोटी पार्टियों के विधायकों की संख्या 32 थी। केन्द्र में भी सत्ता होने के कारण उनका झुकाव शिवसेना+भाजपा की तरफ ही था। सरकार आराम से बन सकती थी लेकिन भाजपा ने शिवसेना के नेतृत्व में सरकार बनाने से साफ मना कर दिया था। भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री बनने की शर्त पर ही सरकार बनाने का फैसला किया था।

ज्ञात रहे कि उस समय प्रधानमंत्री अटल जी थे। अतः स्पष्ट है कि भाजपा ने इतना महत्वपूर्ण फैसला उनकी इच्छा के अनुसार ही लिया था। शिवसेना के तथाकथित हिन्दू हृदय सम्राट और भाजपाई ‘फूफा जी’ ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था लेकिन अटल जी अपने फैसले से डिगे नहीं थे। अपने फैसले पर अटल रहे थे।

समय ने सिद्ध किया था कि अटल जी का वह फैसला शत प्रतिशत सही था क्योंकि महाराष्ट्र में मार्च 1995 में भाजपा के साथ गठबंधन कर के शिवसेना ने पहली बार सरकार बनाई थी। उस पहली सरकार में शिवसेना ने अपने 2 मुख्यमंत्री बनाए थे। भाजपा उस सरकार में निरीह जूनियर पार्टनर मात्र थी।

उस सरकार में कितने भयंकर भ्रष्टाचार और प्रचण्ड कुशासन, माफियाओं गुण्डों का बोलबाला हुआ था इसे केवल इस एक तथ्य से ही भलीभांति समझा जा सकता है कि… 1995 में 80 सीटों पर सिमट गई कांग्रेस 1999 में बढ़कर 133 पर पहुंच गई थी।

इसके बाद महाराष्ट्र की जनता एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन को लगातार 15 वर्षों तक महाराष्ट्र की सत्ता सौंपती रही थी। हालांकि उस एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन सरकार के भ्रष्टाचार का देशव्यापी डंका उन 15 वर्षों के दौरान ज़ोरशोर से बजता रहा था लेकिन इसके बावजूद महाराष्ट्र की जनता लगातार 3 चुनावों में उसी एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन को सत्ता सौंपती रही क्योंकि उसके सामने दूसरा एकमात्र विकल्प शिवसेना के नेतृत्व वाली सरकार का होता था, जिसके बहुत कडुए अनुभव को महाराष्ट्र की जनता 15 वर्षों तक भूल नहीं सकी थी और शिवसेना के कुशासन की तुलना में एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन के कुशासन को वो 15 वर्षों तक बेहतर मानती रही थी।

इसीलिए 2014 में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा जब शिवसेना से अलग होकर चुनाव लड़ी तो महाराष्ट्र की जनता ने उसे हाथों-हाथ लिया था। अकेले भाजपा को 125 सीटें दी थीं। जो कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन से अधिक थीं।

इस बार भी महाराष्ट्र की जनता ने कांग्रेस एनसीपी गठबंधन से अधिक सीटें केवल भाजपा को दी हैं। क्योंकि देवेन्द्र फ़ड़नवीस ने इस बार 1995-99 की शिवसेना नेतृत्व वाली भयंकर भ्रष्टाचार, प्रचण्ड कुशासन, माफियाओं गुण्डों के वर्चस्व वाली सरकार की तरह सरकार नहीं चलाई थी।

देवेन्द्र फड़नवीस ने सरकार में शामिल शिवसेना की करतूतों पर भी बहुत कठोरता के साथ अंकुश लगाए रखा था। यही कारण है कि 5 वर्ष शासन करने के बाद महाराष्ट्र की जनता ने भाजपा को शिवसेना से लगभग दोगुनी तथा कांग्रेस+एनसीपी गठबंधन से भी 8 सीटें अधिक दी हैं।

इस बार भी भाजपा यदि 164 के बजाय सभी 290 सीटों पर अकेले लड़ी होती तो बहुमत पार कर गयी होती या बहुमत के आंकड़े के बहुत करीब होती।

इस बार प्रधानमंत्री मोदी तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से एक ही गलती हुई जो शिवसेना के इरादों को वो भांप नहीं सके। लेकिन 20 वर्ष पूर्व अटल जी द्वारा दी गयी सीख कि “भयंकर भ्रष्टाचार और प्रचण्ड कुशासन, माफियाओं गुण्डों के वर्चस्व वाली राजनीति के समक्ष समर्पण कर सत्ता में शामिल होने के बजाय विपक्ष में बैठा जाए” का अनुसरण कर के उस गलती को भाजपा ने सुधार लिया है।

शिवसेना के गले में लटका हिंदुत्व का जो घण्टा भाजपा के लिए महाराष्ट्र में उसके साथ गठबंधन की विवशता बन जाता था, आज उस घण्टे का विसर्जन शिवसेना ने स्वयं ही कर के भाजपा के भविष्य की राह आसान कर दी है।

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