सच बोला जाए तो पूरा बोला जाए…

जिस दिन से शिवसेना ने काँग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाया था उसी दिन से यह राग अलापना भी प्रारम्भ किया था कि… बाल ठाकरे ने भी इंदिरा गांधी का समर्थन और सहयोग किया था।

इसके अलावा शिवसेना यह राग भी अलाप रही थी कि अगर भाजपा पीडीपी के साथ सरकार बना सकती है तो हम काँग्रेस के साथ मिलकर सरकार क्यों नहीं बना सकते?

शिवसेना के यह दोनों तर्क सही भी हैं, लेकिन पूरा सच नहीं हैं।

न्यूज़चैनली विदूषकों की फौज भी ऐसे अधूरे सच वाले सवालों की बौछार के साथ भाजपाई प्रवक्ताओं पर टूट पड़ी है। इसके जवाब में एकमात्र अपवाद सुधांशु त्रिवेदी को छोड़कर शेष भाजपाई प्रवक्ताओं की जो और जैसी प्रतिक्रियाएं देखी सुनी उनपर टिप्पणी करने के बजाय कुछ ना लिखूं तो उचित होगा।

लेकिन आधा सच बोल रही शिवसेना और काँग्रेस को शेष आधा सच याद दिलाना भी ज़रूरी है, जिसे सुनना स्वीकारना शिवसेना और काँग्रेस के लिए जलते तवे पर बैठने के समान होगा।

शिवसेना देश को यह क्यों नहीं बताती कि जिस इंदिरा गांधी को बाल ठाकरे ने खुला समर्थन और सहयोग दिया था वो वह इंदिरा गांधी थी जिन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान बाकायदा लिखित रूप से आदेश दिया था कि देश में किसी भी संवेदनशील और महत्वपूर्ण स्थानों पर मुसलमानों को तैनात नहीं किया जाए तथा ऐसे किसी भी स्थान पर तैनात मुसलमान कर्मचारी को उस स्थान से तत्काल हटा दिया जाए।

1996 में अटल सरकार के विश्वासमत पर हो रही बहस के दौरान अटल सरकार के रक्षामंत्री के रूप में जॉर्ज फर्नान्डीज़ ने इंदिरा गांधी के उस लिखित आदेश की ओरिजनल कॉपी को सदन में मंगा कर सदन के भीतर जब उपरोक्त सच उजागर किया था, तब उस बहस में सेक्युलरिज़्म के लम्बे चौड़े उपदेश दे रही काँग्रेसी फौज के चेहरे पर उड़ रही हवाइयां देखने लायक थीं।

तो शिवसेना और न्यूज़चैनली विदूषक यह समझ लें कि बाल ठाकरे जिस इंदिरा गांधी/ काँग्रेस का समर्थन करते थे वो अदालत में भगवान राम को गप्प बताने वाला हलफनामा नहीं देती थीं, हिन्दू आतंकवाद का कुटिल गीत नहीं गाती थीं।

शिवसेना देश को यह क्यों नहीं बताती कि जिस इंदिरा गांधी को बाल ठाकरे ने खुला समर्थन और सहयोग दिया था वो वह इंदिरा गांधी थीं जिन्होंने मुम्बई में यूनियनबाज़ कम्युनिस्टों और उनके लाल झंडे की बहुत गहरी कब्र खोदकर उसे हमेशा के लिए दफन कर देने के लिए बाल ठाकरे को निरंकुश सरकारी संरक्षण की अपार ताक़त और संसाधन उपलध कराए थे।

नतीजे में आज मुम्बई में यूनियनबाज़ कम्युनिस्टों का वो लाल झंडा दूरबीन लेकर ढूंढने पर भी नहीं दिखाई देता, जो सातवें दशक की समाप्ति तक मुम्बई की हर फैक्ट्री और चौराहे पर शान से लहराया करता था।

इंदिरा गांधी ने जेएनयू बनवाया ज़रूर था लेकिन वहां के वामपंथी गटर के राजनीतिक पिस्सुओं को खोपड़ी पर कभी नहीं बैठाया था। यह पिस्सू जब कभी बहकने की कोशिश करते थे तो आज के राहुल गांधी की तरह इंदिरा गांधी उनका हौसला बढ़ाने जेएनयू नहीं जाती थीं। इसके बजाय उन पिस्सुओं पर पुलिस के डंडों की इतनी प्रचण्ड बरसात करवाती थीं कि उन वामपंथी पिस्सुओं के होश कई बरस तक दुरुस्त रहते थे। उनकी राजनीति के कंडे कई बरस तक ठंडे रहते थे।

रही बात पीडीपी के साथ गठबंधन की तो… मुझे यह अनुमान नहीं है कि काँग्रेस के प्रेम में शिवसेना इतनी अंधी हो चुकी है कि उसे यह भी नहीं दिखाई देता कि कश्मीर में भाजपा किसी के साथ गठबंधन कर के चुनाव नहीं लड़ी थी और किसी गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिलने के बाद उसने CM की कुर्सी के लोभ में उस गठबंधन को छोड़कर भागने की राजनीतिक लम्पटई नहीं दिखाई थी।

पीडीपी के साथ गठबंधन करते समय अफ्सपा हटाने, पाकिस्तान से बात करने, हुर्रियत से बात करने, पैलेट गन इस्तेमाल नहीं करने सरीखी पीडीपी की एक भी मांग नहीं मानी थी। धारा 370 पर भी छाती ठोक कर यही कहा था कि यह हमारा मुख्य मुद्दा है लेकिन आज हमारी स्थिति नहीं है। भाजपा ने गलत नहीं कहा था। स्थिति बनते ही उसने धारा 370 को इतिहास के कब्रिस्तान में हमेशा के लिए दफन कर दिया है।

अतः शिवसेना काँग्रेस के गले में झूलकर प्रेमगीत गाए, उसे शुभकामनाएं… लेकिन जब इस प्रेम सम्बन्ध के पक्ष में तर्क दे तो आधा सच ना बताकर पूरा सच ज़रूर बताए।

न्यूज़चैनली विदूषक भी यह ध्यान रखें।

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