कबीर सिंह : मुम्बइया फिल्म में साउथ का तड़का

जब भी किसी फ़िल्म की समीक्षा लिखी जाए तो यह अवश्य बताया जाए कि यह फ़िल्म क्यों देखें अथवा क्यों नहीं देखें? हाल ही में आयी फ़िल्म कबीर सिंह चर्चा में है। काफ़ी लोगों को वह फ़िल्म ख़राब लगी, काफ़ी लोगों को बेहतरीन। फ़िल्म समाज में बहुत अहम किरदार निभाती हैं, क्योंकि फ़िल्म में दिखाई गयी गतिविधियों का समाज अनुसरण करता है। बहरहाल, फ़िल्म के विश्लेषण और इसकी समीक्षा पर आते हैं।

फ़िल्म का नाम – कबीर सिंह
अवधि- 2 घंटे 52 मिनट
निर्देशक – संदीप वांगा रेड्डी
कलाकार- शाहिद कपूर, कियारा आडवाणी, अर्जुन बाजवा, सुरेश ओबेरॉय, कामिनी कौशल, आदिल हुसैन, निकिता दत्ता, सोहम मजूमदार इत्यादि।
संगीत- हर्षवर्धन रामेश्वर, मिथुन, अमाल मालिक, विशाल मिश्र, सचित परंपरा व अखिल सचदेवा।

कहानी- जैसा कि फ़िल्म का शीर्षक है – ‘कबीर सिंह’, फ़िल्म अपने इस मुख्य पात्र को केंद्र में रख कर बनाई गयी है। फ़िल्म शुरू होती है अमीर खुसरो के एक छंद से, जिसके बाद अपनी हमउम्र औरतों के साथ बैठकर कबीर के जाने का दुःख प्रकट कर रही हैं, और कबीर का स्वभाव बताती हैं कि वह ज़िद्दी किस्म का व्यक्ति है।

कबीर किसी फ़्लैट की बिल्डिंग में एक औरत की मैक्सी को बिस्तर का चादर समझ कर ओढ़ कर सोया है, वह औरत उसे डांट कर अपनी मैक्सी वापस ले लेती है। कबीर अपनी एक मरीज़ के घर बुलाने पर जाता है, जिससे कि वह उसके साथ शारीरिक संबंध बना सके। कबीर एक शल्य चिकित्सक यानि सर्जन हैं। शारीरिक संबंध बनाने के दौरान ही कबीर की मरीज़ का मंगेतर उससे मिलने आ पहुंचता है और वह लड़की मना करने लगती है, जिसके बाद कबीर चाकू की नोंक पर उससे संबंध बनाने को कहता है।

कबीर अपने एक फ्लैट में रहता है और अपने पुराने दिनों को याद करता है, जिससे कहानी फ़्लैशबैक में चली जाती है। कबीर दिल्ली विश्वविद्यालय के एक मेडिकल कॉलेज का छात्र है, जिसका वह सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी व टॉपर है। कबीर का यह परिचय कराते समय कबीर के शिक्षक अपने शिक्षार्थियों को समझाते हैं कि कबीर गुस्से को काबू में रखने में जीरो हैं, इसलिए यह चिकित्सक पेशे के लिए ख़तरनाक है।

कॉलेज फुटबॉल मैच में हुई लड़ाई के लिए, उसे निलंबित करने की बात आती है, वह निलंबन के लिए तैयार हो जाता है, लेकिन तभी उसके एक अपने कॉलेज में नवांगतुक लड़की को देखता है, जिसके बाद वह निलंबन को रद्द करने का मन बनाता है। कॉलेज में वह लड़की (जिसका नाम प्रीति है) को देखते ही घोषणा करवा देता है कि उसे प्रीति से प्यार है, वह उसकी बंदी है और किसी ने उसकी तरफ आंख भी उठाई तो उसका अंजाम बुरा होगा।

कॉलेज में रैगिंग होती है, इस डर से प्रीति के पिताजी अपने कार्यालय के मालिक के बेटे के पास छोड़ जाते हैं, जो संयोग से कबीर सिंह ही है। मगर कबीर ध्यान रखने के नाम पर प्रीति को क्लास में आगे बैठने को कहता है, शिक्षक के जैसे पढ़ाने के लिए सारी क्लास के सामने से ले जाता है और उसे खेतों में ले जाकर पढ़ाता है।

एक दिन सभी के सामने कॉलेज में उसके गाल पर कबीर किस करता है, जिसे प्रीति के साथी भी देखते हैं, और यहां प्रीति विरोध नहीं करती (बाकी हिंदी व दक्षिण भारतीय फ़िल्मो की तरह) जिससे समझ में आता है कि अब कहानी में प्यार शुरू होगा।

होली वाले दिन कॉलेज में कबीर का विरोधी प्रीति के साथ शारीरिक शोषण करता है रंग लगाने के बहाने, जो कबीर को ग़ुस्सा दिला देता है और कबीर उसकी जम के धुनाई करता है। कबीर और प्रीति की प्रेम कहानी आगे बढ़ती है और फिर एक दिन कबीर प्रीति को साथ में किस करते देख लेते हैं, कबीर के पिताजी; कबीर उस दिन उनके घर प्रीति का हाथ माँगने जाता है; मगर यह सब देख कर वह गुस्सा होते हैं और कबीर को धमकी देते हैं, और प्रेम कहानी बिगड़ जाती है।

इसके बाद प्रीति की किसी और जगह शादी करवा दी जाती है, कबीर शराब और सिगरेट की लत का शिकार तो पहले से ही होता है, मगर अब वह घातक रूप लेता है। पेशे से बहुत बड़ा शल्य चिकित्सक डॉक्टर कबीर सिंह, इसके बाद की कहानी में अपनी बुरी लत से लड़ता रहता है और उसका परिवार व उसका दोस्त उसके इस लत से छुड़वाने के लिए अनेक प्रयास करते हैं।

निर्देशन- संदीप वांगा रेड्डी ने यह फ़िल्म करीबन 2 साल पहले तेलुगु में अर्जुन रेड्डी नाम से बनाई और उसका रीमेक बनाया। फ़िल्म में शाहिद का ज़ोरदार अभिनय है, एक पल के लिए भी शाहिद स्क्रीन से गायब नहीं होते; निश्चित तौर पर इस फ़िल्म का पूरा स्पेस शाहिद को मिला है। कियारा आडवाणी के किरदार के साथ काफी नाइंसाफी की गयी है। करीबन 3 घंटे की इस फ़िल्म में कियारा को स्क्रीन पर स्पेस 45 मिनट से अधिक नहीं मिला, बल्कि उनसे अधिक समय फ़िल्म में सहयोगी कलाकारों जैसे शाहिद के दोस्त शिवम के रूप में सोहम मजूमदार को काफ़ी समय दिया गया है।

अर्जन बाजवा ने अपने किरदार को सबसे बेहतरीन ढंग से निभाया है। शाहिद के बड़े भाई के रूप में वो इस फ़िल्म में जमते हैं और अपनी छाप छोड़ जाते हैं। सुरेश ओबेरॉय का चेहरा थोड़े उम्रदराज़ बाप की निशानी लगता है, अपने बेहद कम समय के किरदार में उन्होंने अपना काम पूरा किया है।

फ़िल्म में बाकी समय शाहिद के मित्र शिवम के रूप में सोहम मजूमदार ने दर्शकों पर अच्छा प्रभाव डाला है, क्योंकि शाहिद के बाद सबसे अधिक समय स्क्रीन पर सोहम को ही मिला है। फ़िल्म कई जगहों पर सलमान खान की तेरे नाम की याद दिलाती हैं जिसमें सलमान एक वरिष्ठ छात्र होते हैं और उन्हें अपने जूनियर से प्यार हो जाता है, व सारे कॉलेज में उनका खौफ़ होता है, जिससे भूमि जब मंच पर आती हैं तो सभी छात्र चुप होकर उन्हें सुनते हैं। ऐसा ही एक दृश्य कबीर सिंह में भी है।

विश्लेषण/ विवेचन- फ़िल्म में एक नई शुरुआत यह है कि फ़िल्म में कोई भी गीत अभिनेता या अभिनेत्री बोल कर या नाचते हुए नहीं गाता (जैसा कि आम बॉलीवुड फिल्मों में होता है), हो सकता है कि आने वाले समय में फ़िल्म में व्यवहारिकता आएगी। सभी गीत पार्श्व में ही चलते रहे हैं। हालाँकि फ़िल्म बिल्कुल भी व्यवहारिक नहीं है।

फ़िल्म एक काल्पनिक कहानी से अधिक कुछ भी नहीं है। फ़िल्म में काफ़ी बातें अटपटी सी लगती हैं, जो सामान्य व्यवहारिक बुद्धि यानि कॉमन सेंस से भी परे है। बेटे के काफी दिनों से गायब होने पर पिता का उससे मिलने न जाना, रैंगिंग होने पर लड़की का घरवालों को सूचना नहीं देना और चुपचाप भावनाविहीन रहना, अपने दोस्त की बुरी आदतों के बावजूद उससे अपनी बहन की शादी का प्रस्ताव रखना, अनेकों गंभीर ग़लतियों पर भी बेटे को माफ करने के बाद बाप का उसे घर से बाहर निकाल देना, इत्यादि।

फ़िल्म को बेवजह ही बढ़ाया गया है। वास्तिवकता में कहानी एक आम कहानी थी, फिर भी इसे बड़ी कहानी बनाने के लिए इसमें ऐसे बहुत दृश्य हैं, जिन्हें केवल नायक के चरित्र को सार्थक करने के लिए बनाया गया है, जिनकी कोई आवश्यकता नहीं थी।

फ़िल्म कम से कम 45 मिनट कम बनाई जा सकती थी। फ़िल्म में कम से कम आपको पांच ऐसे दृश्य मिल जाएंगे जहां निर्देशक ने इस फ़िल्म को आम कहानी से अलग फ़िल्म दिखाने की कोशिश की है, जैसे- लड़की को यह सच्चाई बताना कि तुझे सब मेरे कारण जानते हैं, फ़िल्मी बातों में न फंसते हुए थोड़ा से व्यवहारिक हैं, नायक का यह समझना कि अगर वह लड़की के चक्कर में नहीं पड़ता तो ज़िंदगी में आगे जाता, यह क़ुबूल करना कि वह गली का गुंडा नहीं पढ़ा लिखा डॉक्टर है व शराब पीने की अपनी लत को स्वीकारते हुए अपनी ग़लती मानना और झूठ से बचना।

मगर इन अच्छी बातों के लिए फ़िल्म में दिखाए गए ओछेपन की उपेक्षा करना बहुत ग़लत होगा, क्योंकि यदि हम इन मानवीय अथवा सामाजिक मूल्यों की बात कर रहे हैं तो हमें बात करनी होगी इस बात की कि ऐसे समय में जब महिलाओं के हक़ के लिए आवाज़ उठ रही है, उस समय में फ़िल्म का नायक एक लड़की को चाकू की नोंक पर शारीरिक संबंध बनाने को कहता है, वह किसी के शारीरिक रूप का मज़ाक उड़ाता है, वह अपनी प्रेमिका को थप्पड़ मारता है, अपनी कामवाली बाई को डराता है, अपनी महिला सहकर्मी को पैंट की चैन खोलकर शर्मिंदा महसूस कराता है, पढ़ा लिखा होने और अपनी ग़लती मानने की बात व सच मानने की आदतों का हवाला देकर वह गलतियां करता है, अपनी कनिष्ठ सहपाठी के गाल पर किस करता है।

नायक यह सभी काम अपने पुरुष मित्र के साथ नहीं कर सकता, क्योंकि वह शायद उसे बराबरी का मज़ा चखा दे। फ़िल्म में वास्तविकता के नाम पर कुछ भी नहीं है। फ़िल्म में अनेकों अंत हो सकते थे, क्योंकि फ़िल्म कई बार विषय से विषयांतर हो रही थी। एक पल को दर्शक ये सोचने लगते हैं कि कबीर सिंह सामान्य हो जाए, गुस्सा छोड़ दे और वे उसे ही फ़िल्म का अंत मान लेंगे; मगर फ़िल्म लंबी खींची गयी है।

बॉलीवुड या हिंदी फ़िल्म उद्योग में दो मुख्य धड़े हैं। एक पितृसत्तात्मक और स्त्री विरोधी दूसरा हिन्दू विरोधी।

जब पितृसत्तात्मक धड़े को लताड़ मिलती है, तो वो सोचता है कि हिन्दू विरोधी हो जाओ, बुद्धिजीवियों की सराहना मिलेगी। फिर हिन्दू विरोधी कंटेंट बनाने के बाद उनको हॉलीवुड वाले आईना दिखाते हैं और बताते हैं कि किसी आस्था का विरोध या मज़ाक उड़ाने को फ़िल्म नहीं कहते। इसके बाद ही उन्हें आत्मज्ञान की अनुभूति होती है।
फ़िल्म को देखकर यह लगता है कि निर्देशक संदीप वंगा रेड्डी अभी पितृसत्तात्मक धड़े से जुड़े हुए हैं।

क्योंकि कहानी कोई विशेष नहीं है कि इस फ़िल्म को देखने जाना पड़े। वही पुरानी हिंदी व दक्षिण भारतीय फिल्मों में प्यार मोहब्बत के विषय पर बनी यह फ़िल्म केवल इसलिए अलग है क्योंकि इसमें नायक गली का गुंडा न होकर पढ़ा लिखा गुंडा है। फ़िल्म में नायक का किरदार पूरी तरह नायिका के किरदार पर प्रभुत्व जमाये हुए है। यदि आपने लंबे समय से कोई प्यार मोहब्बत वाली कहानी नहीं देखी है तो इसे देखने ज़रूर जाएं। शाहिद कपूर को पसंद करने वालों को यह फ़िल्म निराश नहीं करेगी। उड़ता पंजाब के बाद शाहिद का एक और बेहतरीन काम आप इस फ़िल्म में देख सकते हैं।

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