PM Narendra Modi : वृत्तचित्र समझ, एक बार सिनेमाघरों में नमो-नमो कर आओ

“वो एक जादूगर है, वो लय सुरताल उंगलियों से नहीं, शब्दों से जादू चलाएगा और करोड़ों की संख्या में लोग उसके जादू से सम्मोहित हो उसके पीछे जाएंगे”

ये एक आलोचना थी मोदीजी की, लोगों का उन पर जो विश्वास बढ़ रहा था उसको अपनी ईर्ष्या से परिभाषित कर के कहने की, पर जादू बिना सामने से देखे नहीं चलता फिर कैसे करोड़ों मतदाता सिर्फ मोदी-मोदी कहना जान गए?

दअरसल स्वतन्त्रा के बाद राजनीति को जिस तरह भारत में गढ़ा गया उसके अनुसार मतदाता का नायक वंश परंपरा से जन्मता था वो भी प्रजा तंत्र में, फिर ये ज़मीन से उपजा गुजराती, नायक कैसे हो सकता था?

खुद से पूछ कर देखिए कि बीते दशक में किसी भी सिनेमा प्रेमी ने मोदी जी पर फ़िल्म बनेगी ऐसा सोचा था? नहीं, क्योंकि तब तक ये व्यक्तिव हमारे नायक बने नहीं थे।

ये ज़रूर प्रचारित है कि ये फ़िल्म लोकसभा चुनाव और कुछ पोलिटिकल एजेंडे के चलते बनी… चलिये मान लिया कि ये कारण था फ़िल्म के बनने के पीछे पर ये फ़िल्म नहीं, बायोपिक है यानी मोदी जी के जीवन की कथा, तो क्या उनके कार्य जो भी उन्होंने किये वो समर्पण भाव से किये, वो भी फ़िल्म बने इसलिए, तयशुदा था?

ऐसे ही तर्क वितर्क से इस फ़िल्म को रोकने का प्रयास ज़रूर किया गया, पर जो रोपित हो चुका उसे ऊपर आना है। पहले ही बता दूं कि सबको पता था मोदी जो है वो फ़िल्म में होगा और वो सामने आ गया तो हम तो देखने गए ही इसलिए कि इस फ़िल्म को ले कर इतनी सुगबुगाहट थी।

अब फ़िल्म पर आती हूँ..

Omung kumar एक ऐसा डायरेक्टर जिन्होंने अब तक तीन बायोपिक पेश की है, मैरीकॉम, सरबजीत और अब PM नरेंद्र मोदी, जिसमें निर्देशन और अदाकारी के मामले सरबजीत सबसे ऊपर है, फिर मैरीकॉम और अंत में मोदीजी की बायोपिक।

यहां Omung को डाउन करने वाली दो बात थी, एक तो मोदीजी का कद, व्यक्तित्व और सरल जीवन दूसरा विवेक ओबेरॉय का लीड रोल में होना, प्रोड्यूसर होना ऊपर से स्क्रिप्ट में को-राइटर होना। ये दखलंदाज़ी कर गयी।

फ़िल्म महत्व पूर्ण इसलिए है कि मोदीजी को ले कर जो मिथ्या आरोप विपक्ष लगा रही थी उसका सच लोगों तक पहुंचे और लोग मोदी जी को और समझे।

फ़िल्म शुरू होती है बाल नरेंद्र मोदी से जो जल्द ही युवा नरेंद्र (विवेक ओबेरॉय ) पर आ जाती है। माँ, हीराबेन (जरीना वहाब) से विशेष लगाव और प्रेम रखने वाला नरेंद्र विशिष्ट सोच वाला युवा है, जो अभी जीवन की दिशा ढूंढ रहा है।

एक नाटक में मुख्य चरित्र को निभाते हुए नरेंद्र की बात सुन उनके पिता (राजेन्द्र गुप्ता) उसके बचपन में हुए विवाह (बरखा सेनगुप्ता जशोदाबेन के रूप में ) का गौना करा उसे बांधना चाहते हैं पर नरेंद्र वहीं से संन्यासी होने का प्रण कर सब कुछ छोड़ हिमालय की गोद में चला जाता है, जहां उसे एक अज्ञात साधु (सुरेश ओबरॉय) का सानिध्य मिलता है।

नरेंद्र के मन की जिज्ञासा और भटकाव को बहुत छोटे-छोटे क्रिया कलापों से दिशा दे वो अज्ञात साधु देश सेवा की ओर प्रेरित करते हैं। लक्ष्य पाया हुआ नरेंद्र वापस गुजरात लौटता है और आरएसएस से जुड़ अपने रास्ते खुद बनाते जाता है, जो सीधे आम जन की आवाज़ बन कर उनको राह देता है। क्रम वार मोदी जी के जीवन की हर महत्वपूर्ण घटना को दिखाते हुए फ़िल्म उनके द्वारा 16 वीं लोकसभा के प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण पर खत्म होती है।

फ़िल्म मोदी जी के राजनैतिक जीवन की दो घटनाओं को बेहद स्पष्ट रूप से रखती है वो है गुजरात के दंगे से जुड़ा सच और ये सोच, कि मोदी वो नाम है जो देश को बांट रहा है।

विपक्ष के चमचे रेड्डी और उसके बेटे (प्रशांत नारायण ) के प्रोजेक्ट को सीधे सीधे CM बनने के बाद ज़मीन का आवंटन न करना ही मोदी जी को बदनाम करने की षडयंत्र की ईंट बनती है जिसमें पूरा सहयोग एक बड़ा मीडिया हाउस और उसका चम्मच (दर्शन कुमार ) करता है।

गुजरात को जला दिया जाता है और खबर मौत नहीं बनती, खबर बनाई जाती है कि साम्प्रदायिक मौत हुई। जल रहे गुजरात को रोकने के लिए त्वरित एक्शन के रूप में मोदीजी को कड़ा कदम उठाना पड़ता है, वो है हज़ारों की संख्या में गिरफ्तारी। अगला कदम मोदीजी से बदला लेने के लिए अक्षरधाम पर आतंकी हमला।

इन दोनों के आधार पर इस फ़िल्म में स्पष्ट किया है कि सोची समझी साजिश है मोदीजी पर धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाना। (फ़िल्म में दंगो में जहां हिन्दू गलत था दिखाया जहां मुस्लिम गलत था वो दिखाया), फ़िल्म सिर्फ और सिर्फ मोदीजी के राजनैतिक जीवन को निष्पक्ष रखती है।

फ़िल्म के कुछ दृश्य बहुत अच्छे और आपको जागरूक और भावुक भी करते हैं जैसे साधु से नरेंद्र को दिशा मिलने वाला दृश्य या दंगो का दृश्य (दंगों में एक गर्भवती महिला का पेट काट कर उसके बच्चे को निकाल उसके पति, बच्चे और उस महिला की हत्या की थी, ये दृश्य नहीं था, पर सांकेतिक रूप से था)

रतन टाटा (बोमन ईरानी ) से वार्ता और दंगो के आरोपों से क्लीन चिट मिलने के ठीक पहले वाला मोदी जी के इंटरव्यू के दृश्य और संवाद जबरदस्त थे।

कुछ दृश्य में निर्देशन कमजोर भी हुआ है जैसे लाल चौक पर झंडा फहराने वाला दृश्य और अंत में सभा में आतंकी हमले से बचने वाला दृश्य। वो थोड़ा नाटकीय ज्यादा लगे।

अदाकरी की बात करने से पहले बता दूं कि फ़िल्म संजू में रणवीर कपूर ने संजय दत्त को रिप्रेजेंट नहीं किया था, उसकी मिमिक्री की थी, पर यहाँ विवेक ने मोदी जी को रिप्रेजेंट किया है, उनकी मिमिक्री नहीं की है।

युवा नरेंद्र में विवेक जंचे हैं, परिपक्व मोदी में नहीं। अमित शाह की भूमिका में मनोज जोशी अच्छी पसन्द निकले। जरीना हीरा बेन सी साधारण लगी (जब भी मोदीजी पैर छूने झुकते जरीना का पाँव धूल गर्द से सना साधरण स्त्री का पाँव ही लगा, ये बारीकियों को दिखाता है )

….अटल बने अंजन श्रीवास्तव, आडवाणी बने दिलीप सिन्हा झाला और मुरली मनोहर जोशी बने अक्षत सलूजा भी अच्छी पसन्द है। जसोदाबेन के किरदार में बरखा बिष्ट सेनगुप्ता को दो ही दृश्य मिले बिना संवाद। प्रशांत नारायण, मोदी के खिलाफ साजिश रचने वाले व्यवसायी घराने के घमंडी और भ्रष्ट बेटे के रूप में खून खौलाते हैं। मनमोहनसिंह के किरदार को दो दृश्य में तंज के लिए रखा गया इससे अधिक नहीं। फ़िल्म की सकारत्मकता यही है कि विपक्ष को बार बार न रख सिर्फ मोदी के काम को रखा है, हाँ ये बात अलग है कि वो कुछ दृश्य में जो विपक्ष आया उसका कोई पक्ष न था।

गीत संगीत विशेष नहीं है फिर भी फ़ास्ट ट्रैक नमो नमो बैकग्राउंड में सूट करता तो वहीं फकीरा और सौगंध मुझे इस मिट्टी की कर्ण प्रिये लगता है, सुंदर बोल जे संग, एक गीत फ़िल्म 1947 earth से ले हितेश मोडक ने रिक्रिएट किया जिसके ओरिजिनल बोल जावेद अख्तर के थे। जनाब को क्रेडिट देना भी पचा नहीं क्योंकि फ़िल्म आखिर मोदी की है भाई।

संवाद कुछ जगह प्रभवशाली लगे, खास कर जब इंदिरा के कमेंट पर रेड्डी बोलता है, कि ये नरेंद्र बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है, कार्यकर्ता से आपने लीडर बना दिया और पूरा नाम याद रखो नरेंद्र दामोदर दास मोदी।

अनिरुद्ध चावला का स्क्रीनप्ले मोदीजी के जीवन की घटनाओं से दर्शक को बांधती है। कमज़ोर करती बस विवेक की मोदी से तुलना करना।

अंत में राजनीति में स्वार्थ की रोटी सेकने के लिए मोदी से जुड़े मिथ और कुतर्क को आगे बढ़ाओ वाली भट्टी पर ये बैरल बैरल भर पानी डालने जैसा है इसलिए तो विपक्ष चुनाव पर न प्रदर्शित हो, पर अड़ गया था।

आप भी अड़ जाओ वृत्तचित्र ही समझ कर सही एक बार सिनेमाघरों में जाकर नमो नमो कर आओ।

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