सफल हो जाना ही काफ़ी नहीं, सार्थक भी होना चाहिए जीवन

विनोद सुजान का बचपन दिल्ली के पास हिंडन में बीता। वहाँ से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बिट्स पिलानी गए और फिर एटीएंडटी बेल लैब्स में पहली नौकरी के लिए 1987 में अमरीका आए।

यहाँ एक साल काम करने के बाद उन्होंने एमबीए की पढ़ाई की और फिर अगली नौकरी ओरैकल कंपनी में मिली। कुछ वर्षों तक वहाँ काम करने के बाद उन्होंने अमरीका में ही अपनी ख़ुद की कंपनी ‘आरज़ू’ की शुरुआत की।

फ़िलहाल उनकी कंपनी एक नए तरह के सर्च इंजन पर काम कर रही है, जो खासतौर पर कंपनियों के लिए होगा और विज्ञापनों के द्वारा या किसी सर्च रिज़ल्ट्स को फ़िल्टर या मैनिपुलेट करने की बजाय सभी रिज़ल्ट्स उपलब्ध कराएगा और इसमें एक डैशबोर्ड होगा, जिसके द्वारा लोग अपनी ज़रूरत के अनुसार उन परिणामों को सॉर्ट करके अपने काम की जानकारी आसानी से पा सकें।

यह सब मुझे उनके इस इंटरव्यू को देखकर पता चला और मैंने सोचा कि इसे शेयर करना चाहिए, ताकि आप लोगों को भी कुछ नई जानकारी मिले।

विनोद जी ने भारत को भी देखा है और अमरीका को भी बहुत अच्छी तरह देखा है। इंटरव्यू में उन्होंने इन दोनों जगहों के बारे में कुछ बातें बहुत सरल शब्दों में बता दीं।

उनका ये तरीका मुझे बहुत अच्छा लगा। जैसे भारत और अमरीका में इनोवेशन और बिज़नेस के माहौल में क्या फ़र्क है, इसके बारे में उन्होंने बताया कि अमरीका में अगर इन्वेस्टर के पास आप कोई बढ़िया आइडिया लेकर जाएँ, तो आपको इन्वेस्टमेंट भी मिलता है और प्रोत्साहन भी; जबकि भारत में इन्वेस्टर चाहते हैं कि आइडिया भले ही आपका है, लेकिन मालिक वो बन जाएँ और आप उनके कर्मचारी बनकर काम करें। यह सोच भारत की प्रगति में एक बहुत बड़ी बाधा है। यह माहौल बदलना चाहिए, ताकि नए लोगों को और नए विचारों को आगे आने का मौका मिल सके।

इसी तरह उन्होंने इस बारे में कुछ बहुत अच्छे सुझाव दिए हैं कि भारत में ‘मेक इन इंडिया’ जैसे प्रयासों में क्या बाधाएँ हैं और उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है, भारत के मानव-संसाधन का बेहतर ढंग से उपयोग क्यों नहीं हो पा रहा है और कैसे हो सकता है। इस तरह की कुछ और भी बातें इस इंटरव्यू में हैं।

भारत और अमरीका के उदाहरण से उन्होंने यह बात भी बहुत अच्छी तरह समझाई कि क्यों हर व्यक्ति हर कहीं फिट नहीं हो सकता और क्यों कुछ लोग एक जगह सफल और किसी दूसरे मामले में असफल क्यों हो जाते हैं।

मेरे खुद के कई सवालों के जवाब मुझे इस इंटरव्यू में अनायास ही मिल गए और कुछ मामलों में मेरी समझ थोड़ी और स्पष्ट हो गई।

उनकी सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी कि व्यक्ति को हमेशा अपने दिल की सुननी चाहिए और वही काम करना चाहिए, जो आप दिल से करना चाहते हैं। तभी आपके सफल होने की संभावनाएं बढ़ती जाती हैं। उससे भी अच्छी बात उन्होंने यह कही कि सफलता को हमेशा सन्तुष्टि से मापना चाहिए, सिर्फ पैसों से नहीं।

मैं भी जीवन में हमेशा अपने मन की ही सुनता आया हूँ, और मैं भी यही मानता हूँ कि केवल सफल हो जाना काफ़ी नहीं है, बल्कि जीवन सार्थक भी होना चाहिए और जीवन की सार्थकता पैसों से नहीं मापी जा सकती, हालांकि पैसों का भी अपना महत्व है और उसे मैं भी नहीं नकारता हूँ।

विनोद जी के सभी प्रयासों में सफलता और सार्थकता के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं!

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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