जड़ों व प्राणतत्व से उखड़ कर टपकता श्रेष्ठताबोध और अकड़!

बीसवीं शती के सबसे प्रभावशाली बंगाली व्यक्तित्व स्वामी विवेकानंद अक्सर कूपमंडूक की कथा सुनाते थे। कुएं का मेंढक जिसके लिए कुआं ही ब्रह्मांड है।

आज बंगाल का समाज शास्त्रीय रूप से कूपमंडूक है। आत्मश्लाघा, आत्मानुराग, पोर-पोर से टपकता श्रेष्ठताबोध और अकड़… उफ़ !

कला, संस्कृति और साहित्य, खासकर ‘कोबिता’ पर तो उनकी बपौती है। बाक़ी भारत की दर्जनों भाषाओं में जो धुरंधर कवि लेखक हुए वे घास छीलते रहे।

(यहां एक बात जोड़ दूं कि बंगाल का आम हिन्दू जनमानस बहुत विनम्र, धार्मिक और ईमानदार है। और मेरे मन में उनके लिए बहुत प्रेम, सम्मान है)

वहां का कथित पुनर्जागरण, आत्मनिर्वासन और प्राचीन भारतीय संस्कृति से घृणा मात्र का उपक्रम है। बीसवीं शती के अधिकांश बंगाली समाज सुधारक अंग्रेजों के पिट्ठू थे। ढंग से पढ़िए, पता चल जाएगा।

दुर्भाग्य यह कि हमारे पाठ्यक्रम में उन पिट्ठुओं को ही जगह दी गई। जबकि परप्रांतीय दर्जनों देशभक्त, धुरंधर विद्वान और हिन्दू धर्म में पगे लोगों को भुला दिया गया।

बीबीसी ने एक सर्वे किया था 2004 में। सर्वकालिक बीस महान बंगालियों की सूची बनाई थी। जिसमें शेख मुजीबुर्रहमान को पहला स्थान दिया था और विवेकानंद को सत्रहवां। जी हां, सत्रहवां!!

आप कल्पना कर सकते हैं कि किस तरह की दृष्टि रही होगी। बीस बंगालियों की सूची में अरविंद घोष तो थे ही नहीं। लेकिन कुछ चमचे, पिट्ठू और करीब नौ मुसलमान ज़रूर थे। यही सब हमने पढ़ा और सुना है। बंगाल के नाम पर बहुत भोकाल टाइट किया गया।

जहां राम नाम पर जेल, मारपीट, हत्या होती रही हो। जहां की पाठयपुस्तक में रामधनु(इंद्रधनुष के लिए प्रयुक्त) शब्द को सांप्रदायिक कहकर रंगधनु कर दिया गया हो, वहां ईश्वरचंद्र की मूर्ति तोड़ने का विलाप और अमित शाह पर आरोप।

अरे, इन आठ नौ वर्षों में इस नेत्री ने वहां कौन सा लोकतंत्र स्थापित किया है? मैं तो दंग रह गया हूं कि यह किस तरह की मोहिनी है? कौन सा संस्कृतिधर्मा समाज है? जिसमें खाली स्वांग है। जो अपनी जड़ और प्राणतत्व से उखड़ा हुआ है।

अलबत्ता चिल्लाता और सबसे अधिक छाती पीटता है। जहां राम नहीं वहां ईश्वरचंद्र रह कर क्या करेंगे? बहुत अच्छा किया जो मूर्ति खंडित कर डाली। कम से कम देखें तो दानवी का आतंक।

विनय न मानत जलधि जड़, गए दिन तीन बीत
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होय न प्रीत…

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