पानीपत की लड़ाई : ध्यान दें चुनाव समाप्ति पूर्व ही तैश में आये राष्ट्रवादी

यहाँ बात इब्राहिम खान गारदी की है, जो मराठा तोपखाने के सेनापति थे। जिन्हें यह प्रसंग पता नहीं वे कृपया उन्हें गद्दार न समझें।

जब विश्वासराव मार गिराए गए और सदाशिवराव भाऊ हाथी से उतरकर भीड़ में तलवार लेकर घुसे और ओझल हो गए, तो बाकी मराठा सेनापतियों ने घुड़दल लेकर अब्दाली पर टूट पड़ने की ठानी।

इब्राहिम खान गारदी ने उन्हें रोकना चाहा। उसने कहा कि अब्दाली की सेना को आगे आने दीजिये, मेरे तोपों की रेंज में आने दीजिये। यह व्यूह जरा अलग है, मैंने फ्रांसीसीयों से सीखा हूँ, कारगर है।

मराठा सेनानी नहीं माने। उसे बुरा भला क्या क्या न कहा और दौड़ पड़े। इब्राहिम खान गारदी के सामने से ही दौड़ पड़े। उन्हें ही चोट लगने के भय से वो तोपें चला न सका और अब्दाली की ‘जंबूरियों’ के सामने मराठा सेना टिक न सकी।

तब तक अब्दाली की सेना आगे भी आ चुकी थी जहां इब्राहिम खान गारदी की तोपों के करीब आ गयी थी, वो उनका कुछ न बिगाड़ सका बल्कि उन्होंने ही उसे मराठों से भी बहुत बुरी मौत दी क्योंकि उसने मराठों से द्रोह करने की इस्लाम के नाम पर दी हुई दावत ठुकरा दी थी।

यहाँ बात है मराठा सरदारों की जो इब्राहिम खान गारदी का सुझाव ठुकराकर अपनी ही रौ में आगे बढ़ गये। अक्सर कहा जाता है कि सेनापति – भाऊ और विश्वासराव के न रहने पर नेतृत्वहीन सेना दुर्दशा को प्राप्त हुई, इस बात को दुर्लक्षित किया जाता है।

फोकस से हटने से यह सब होता है। इसीलिए जब लिखता हूँ कि इस चुनाव में लश्कर ए मीडिया ने लश्कर ए मोदिया को सफलता से भटकाया है, तो मेरा मन्तव्य यही होता है।

जब तक शत्रु के झंडे धूल में न गिरें और अपने झंडे न लहरायें, ज़रा धैर्य रखना चाहिये। पता है कि मोदी जी से हमें कई बातों पर नाराज़गी है लेकिन जब युद्ध के लिए समर्थन दिया है तो युद्ध समाप्ति तक डटे रहना चाहिए।

वैसे यह समय मेरे लिए धैर्य की परीक्षा करनेवाला रहा है। कई बाते हैं जिनपर 23, 23 की माला (23 मई 2019, चुनाव परिणाम का दिन) जपकर आत्मनिग्रह कर रहा हूँ। एक बात समझ लीजिये, सिनेमा की स्क्रिप्ट भी वैसी नहीं होती जैसे हम चाहते हैं। यहाँ तो कई गुना बड़ा खेल है। हमें जिनकी चीखें सुनाई देती हैं उनसे बड़ा समर्थन ‘बगदीदी’ को हासिल है। और वो भी जन्म से हिन्दू ही हैं।

आर्ट ऑफ वॉर ही क्यों, युद्ध का यह शाश्वत नियम है कि स्थल काल की अनुकूलता देखनी आवश्यक होती है। सर्दियों ने नेपोलियन और हिटलर की सेनाओं को रशिया में खत्म कर दिया, बांग्लादेश में भी हम अपने अनुकूल समय पर ही उतरे थे। और हाँ, उस समय पूरा देश इन्दिरा गांधी के साथ था, मोदी के लिए भेदी कितने हैं वे ही जानते होंगे।

वोट देकर आप ने एक कर्तव्य निभाया है। अब मोर्चे पर डटे रहिये।

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