अप्रैल फूल तो एक बहाना है बस आप को सच्चाई से अवगत कराना है

आज से मात्र 83 साल पहले की ही ये घटना है जो आज किसी भी भारतीय को याद नहीं है। घटना इतनी बड़ी है कि पढ़ने वाले किसी भी संवेदनशील भारतीय का खून खौल उठे। याद दिलाना चाहता हूँ आप को 1 अप्रैल 1937, जब मेरी भारत मां को अंग्रेजों ने काटा था। बहुत रोई होगी मेरी मां उस दिन क्योंकि भारत का सबसे संपन्न समृद्ध 6,76,578 वर्ग किलोमीटर हिस्सा सदा के लिए अलग हो रहा था। समझ गये क्या आप लोग???

जी हां अपने ब्रह्म प्रदेश की बात कर रहा हूँ, अरे बर्मा भाई, हां वही आज का म्यांमार।

दोस्तो अंतिम अंग्रेज सिख युद्ध के बाद मुख्य भारत भूमि पर कोई मुख्य शक्ति नहीं बची थी जो गोरों की मनमानी रोक सके। मुख्य भारत भूमि को तहस नहस कर अब गोरों का पूरा ध्यान बर्मा को लूटने व तबाह करने में लगा था।

तृतीय अंग्लो- बर्मा युद्ध का दिखावा कर 1885 में बर्मा के शासक महाराजा थीबा को क्रूर घोषित कर बर्मा की राजधानी मांडले से बैलगाड़ी में बिठाकर भारत भेज दिया था और 1886 में अंग्रेजों ने अपनी सुविधानुसार रंगून को भारत के बर्मा राज्य की नई राजधानी घोषित कर दिया और फिर अगले दस साल पूरे बर्मा में आगजनी व लूटपाट करते रहे।

साथियों क्या था बर्मा में ??

बर्मा में इरावदी नदी के किनारे धरती का स्वर्ग था। 1795 तक बर्मा के एक ही गांव येनानयोंग में सैकड़़ो तेल के कुऐ थे। वहां उस अकेले गांव में ही प्रतिदिन 10 लाख गैलन पैट्रोलियम निकलता था। बर्मा में सारे विश्व का 75% सागवान की लकड़ी थी, 1924 में उस समय के सारे विश्व का आधा चावल करीब तीस लाख टन चावल बर्मा में पैदा होता था।

बीसवीं सदी के प्रार्रम्भ से लेकर द्वितीय विश्व युद्व शुरु होने तक भारत का वो शहर रंगून विश्व का सबसे उन्नत व आकर्षक शहर था जहां प्रतिवर्ष दो लाख से ज्यादा लोग बसने आते थे। 1927 में तो रिकॉर्ड 4,80,000 लोग रंगून में आये जो कि अमेरीका के शहर न्यूयॉर्क में आने वालों से भी ज्यादा थे।

जिस प्रकार 1935 में इंडियन गवर्नमेन्ट एक्ट 1935 गोरो ने बनाया ठीक वैसा ही बर्मन गवर्नमेंट एक्ट 1935 बनाया गया और 26 नवम्बर 1936 में वहां चुनाव कराए गए। चुनाव के नतीजे गोरों की आशा के विपरीत रहे। यू बा पे के दल को 46 सीट मिली बा माव के दल को 16 सीट तथा चित हलैंग के दल को मात्र 12 सीट। गोरों ने बहुमत को नकारते हुए 16 सीट वाले बा माव को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई।

आर्चिबल्ड डोगलस उस समय बर्मा का गवर्नर था। उस ने उस तथाकथित बर्मा की संसद में बिल पास करा कर 1 अप्रैल 1937 को बर्मा भारत से अलग कर दिया। उस समय हमारे देश के तथाकथित बाप व चाचा, मामा आदि सभी जीवित थे, किसी नें चूं तक नहीं की। सारा भारत सब भारतीय 1 अप्रैल 1937 को अप्रैल फूल बने।

बाद में 1942 में जब द्वितीय विश्व युद्ध हुआ तो उसी बा माव को जापान का मुखबीर मान कर बर्खास्त कर दिया गया। 1942 से 1945 तक द्वितीय विश्व युद्ध भारत के इसी राज्य बर्मा की भुमि पर ही तो लड़ा गया था। यहीं तब आजाद हिन्द फौज व आजाद बर्मा फौज का गठन जापान व जर्मन के सहयोग से हुआ। दुर्भाग्य से जापान व जर्मनी वो युद्ध हार गए। वीर वीरगति को प्राप्त हुए, गोरों के चमचों के हाथ बटेर लग गई।

गोरे द्वितीय विश्व युद्ध जीत तो गये लेकिन वो आर्थिक व सैन्य रूप से टुट चुके थे। विश्व युद्ध के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत के तीन और टुकड़े कर के अपने चापलूसों को सत्ता सम्भलवा कर अपनी मर्जी का 1935 का बणाया हुआ संविधान लागू कर भारत को आजाद बताकर चले गये। बर्मा 4 जनवरी 1948 को आजाद हुआ। बर्मा के एक स्वतंत्रता सेनानी ठाकीन कोडाव हैमिंग का चित्र डाल रहा हूँ, आप ही देखें क्या ये पूरी तरह भारतीय नहीं लगता???

गोबर से वैदिक प्लास्टर बनाता, अपने खोए बर्मा की कहानी सुनाता, 1 अप्रैल 1937 से अप्रैल फूल बना, आप का साथी:-

अणपढ़ जाट
वैदिक भवन, रोहतक

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