भारत का पूरा इतिहास ही व्यक्ति पूजा से भरा, अभी है मोदी को पूजने का मौसम

भारतीय खिलाड़ी किन खेलों में मैडल लाते हैं?

पहले एक हॉकी में लाते थे… अब वह बन्द हो गया। अब हमारे मैडल आते हैं कुश्ती में, बॉक्सिंग में, बैडमिंटन में, निशानेबाजी और तीरंदाजी में।

अभी अभी एथलेटिक्स में थोड़ा सुधार हुआ है। एशियाई खेलों में हमें घुड़सवारी, टेनिस और गॉल्फ़ तक में मैडल आये हैं। बिलियर्ड्स, स्नूकर, शतरंज के भी अच्छे खिलाड़ी हैं हमारे पास…

इसके अलावा है क्रिकेट…

इन सबमें कॉमन क्या है? इनमें से कोई भी टीम गेम नहीं हैं। सभी व्यक्तिगत स्किल के खेल हैं। क्रिकेट भी सही मामलों में टीम गेम नहीं है, बल्कि अलग अलग इंडिविजुअल परफॉर्मेंस का योगफल मात्र है।

समस्या क्या है? मूल समस्या है हमारी अति व्यक्तिवादी सोचने की प्रवृति। एक्स्ट्रीम इंडिविडुलिज़्म…

हर कोई अपने आप को एक व्यक्ति ही गिनता है, कभी भी एक समूह और समष्टि का भाग नहीं समझता। बल्कि ऐसा समझने को नीचा दिखाने की ही परंपरा रही है।

सिंहों के नहीं लेहड़े, हँसों की नहीं पाँत।
लालों की नहीं बोरियाँ, साधु ना चले जमात।।

और हमारी यह प्रवृत्ति हमारी हर समस्या का मूल है। इसी की वजह से हमारे पास एक साझा पहचान, साझा उद्देश्य, साझा स्ट्रेटेजी नहीं होती। एक आदमी का दु:ख पूरे समाज का नहीं होता, क्योंकि पूरे समाज का दु:ख भी उस आदमी का नहीं होता जो सीधे तौर पर आज उससे पीड़ित नहीं है।

हम साझा खतरों को पहचान कर उनके साझा प्रतिकार के लिए खड़े नहीं हो पाते… क्योंकि यहाँ हर आदमी अपनी एक पारी खेल रहा होता है, स्कोर बोर्ड पर अपने स्कोर के लिए।

और इसीलिए कभी गावस्कर महान हो जाता है, कभी कपिल, कभी सचिन तो कभी दादा तो कभी धोनी। हम हार जीत को भूल जाते हैं, टीम को और खेल को भूल जाते हैं।

और आज भी चर्चा किस बात की है? खेल की नहीं है, टीम की नहीं है, देश में क्रिकेट की भी नहीं है। चर्चा है धोनी की, कोहली की, रोहित की, जडेजा की… हमारी उपलब्धियाँ भी व्यक्तियों की उपलब्धियाँ हैं, विफ़लताएँ भी व्यक्तियों की विफ़लताएँ हैं। व्यक्तियों को हम या तो पूजते हैं, या लताड़ते हैं, पर व्यक्तियों से ऊपर उठ कर नहीं देख पाते।

भारत का पूरा इतिहास भी ऐसी ही व्यक्ति पूजा से भरा है। गाँधी को पूजा, नेहरू को पूजा, कुछ ने अंबेडकर को पूजा… अभी मोदी को पूजने का मौसम है।

और जो नहीं पूजते, वे गालियाँ देते हैं… वह भी व्यक्तियों को ही देते हैं। अभी गाँधी की धोती खुल गयी, नेहरू की पैंट उतर गई है… इतिहास बहुत ही क्रूर शिक्षक है। कल को यदि असफल हुए तो मोदी का भी वही होना है।

पर हम वही रहेंगे। आज मोदी की भक्ति करेंगे, कल को उन्हें ही गालियाँ देकर इतिश्री कर लेंगे। जो होगा वह देश का होगा, हमारा होगा। पर उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है। हम सफलताओं असफलताओं को व्यक्तियों की उपलब्धियाँ और नाक़ामियाँ बताते रहेंगे। पर जो होगा उसे पूरी हिन्दू संस्कृति की नियति समझने का विवेक नहीं आएगा।

विमर्श का विषय बदलिए। क्रिकेट से प्यार है तो क्रिकेट की ही बात कीजिये, धोनी को विषय मत बनाइये। और देश-समाज का सोचना है तो हिंदुत्व को, हिंदू धर्म को विमर्श का केंद्र बनायें… ना कि मोदी और योगी को।

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