उस शीतल सुखद बयार का ही एक झोंका है फ़िल्म ‘बाटला हाऊस’

19 सितंबर 2008 को दिल्ली के बाटला हाउस में हुए एनकाउंटर ने दिल्ली के साथ-साथ पूरे देश को दहला दिया था।

इस एनकाउंटर ने अपने साथ बहुत गम्भीर विवादों को जन्म दिया था। इसे लेकर पूरे देश में आरोप-प्रत्यारोपों का माहौल गरमाया था।

इस एनकाउंटर पर छिड़े विवाद ने देश में ओछी स्वार्थी देशघाती राजनीति का बहुत घिनौना चेहरा और चरित्र जनता के सामने उजागर कर दिया था।

उस एनकाउंटर की घटना के 11 साल बाद इसे पर्दे पर उतारने और इसका सच बताने के लिए फिल्म ‘बाटला हाउस’ आज 15 अगस्त को रिलीज हो गई है। यह फिल्म बहुचर्चित बाटला हाउस एनकाउंटर से जुड़े सत्य से दर्शकों को परिचित कराती है।

11 वर्ष पूर्व देश की राजनीति में भूचाल ला देने वाली उस बाटला हाऊस एनकाऊंटर की घटना का सच बताते समय बाटला हाऊस फ़िल्म के लेखक निर्देशक ने उस घटना के गुनाहगारों तथा देश के सफेदपोश सियासी गद्दारों के कपड़े शोर-शराबे के साथ नहीं फाड़े हैं। बल्कि रेशमी दस्ताने पहनकर बहुत सम्भाल सम्भाल कर उनके सारे कपड़े इस तरह उतारे हैं कि फ़िल्म का अन्त होते होते वो गुनाहगार/ गद्दार पूरी तरह नंगे नज़र आने लगते हैं।

इस फिल्म को जॉन अब्राहम के अब तक के करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म माना जा सकता है। साथ-साथ इसे इस साल की सबसे दमदार फिल्मों में से एक भी कहा जा सकता है। बटला हाऊस सरीखे विषय पर इतनी साफगोई से बनी इस फ़िल्म को देखना मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य रहा।

उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ वर्षों से भारतीय फिल्मों की विषयवस्तु के चरित्र और चेहरे में उल्लेखनीय परिवर्तन की बयार बह रही है।

मुझे भलीभांति याद है, आप मित्रों को भी अवश्य याद होगा कि कुछ वर्षों पूर्व तक द्विअर्थी अश्लील संवादों और मां बहन की गालियों की भरमार वाली फिल्मों का जबरदस्त दौर चलता रहता था।

शर्मनाक अवैध सम्बन्धों, समलैंगिक सेक्स और आतंकवाद आधारित फिल्मी पटकथाओं का मुख्य/ केन्द्रीय पात्र (नायक/ नायिका) रंडियों, अपराधियों, लफंगों, आतंकियों को बनाया जाता था।

इसके लिए हमको आपको दोषी यह कहकर ठहराया जाता था कि दर्शक यही देखना चाहते हैं।

1990 के दशक में खालिस्तानी आतंकियों के लिए सहानुभूति बटोरने वाली फिल्म ‘माचिस’ बनी थी तो बम्बई को बमों से दहलाकर सैकड़ों निर्दोषों के खून से होली खेलने वाले आतंकवादियों को हालात का मारा बताकर उनका महिमामंडन करती फ़िल्म ‘ब्लैक फ्राइडे’ भी बनी थी।

देशद्रोही हत्यारे आतंकियों का भजन कीर्तन करती, उनके लिए सहानुभूति उत्पन्न करने के प्रयासों वाली फिज़ा, फना, हैदर सरीखी दर्जनों फिल्में बनीं। लेकिन उन मज़हबी जिहादी हत्यारे आतंकियों के खिलाफ फ़िल्म बनाने से बम्बइया फ़िल्म इंडस्ट्री सदैव सख्त परहेज़ ही करती थी।

यही कारण है कि जिस गुजरात दंगे में 1200 मौतें हुईं उस गुजरात दंगे पर आधारित लगभग आधा दर्जन फिल्में बनीं। लेकिन 1990 में कश्मीर में 5 लाख कश्मीरी पंडितों पर कट्टर धर्मान्ध मुस्लिम जिहादी आतंकियों द्वारा किये गए हत्या बलात्कार लूट के राक्षसी अत्याचार पर आज तक एक भी फ़िल्म नहीं बनीं।

लेकिन अब पिछले 3-4 वर्षों से बयार बदली है। उस शीतल सुखद बयार का ही एक झोंका बाटला हाऊस फ़िल्म भी है।

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