धारा 370 हटने से हमें अभी क्या मिला? सिर्फ एक अवसर, और कुछ नहीं

धारा 370 और काश्मीर के विषय पर छाया यूफोरिया कुछ छँट गया हो तो आगे बात की जाए…

धारा 370 हटने से हमें अभी क्या मिला?

  • सिर्फ एक अवसर, और कुछ नहीं।

यूँ समझिए… हमारी टीम ने टॉस जीत लिया, मैच नहीं। अब बैटिंग करनी है और रन बनाने हैं।

टारगेट अब भी विशाल है, आस्किंग रेट 10-12 रन प्रति ओवर। अपने धुरंधर बल्लेबाज जबरदस्त फॉर्म में हैं पर ये रन उन्हें अब भी बनाने हैं।

धारा 370 का हटना एक बहुत खुशी का अवसर है, वह अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है। पर सेलिब्रेशन करने में कैच छोड़ने की घटनाएँ याद हैं ना? इस समय जरूरी है कि लक्ष्य से नज़र ना हटे।

370 हटने का अपने आप में कोई अर्थ नहीं है अगर साथ ही साथ घाटी में डेमोग्राफिक परिवर्तन ना आए, घाटी के हिन्दुकरण के प्रयास भी ना किये जाएँ। उसके बिना यह सिर्फ एक और सांकेतिक कदम बन कर रह जाएगा।

अगर साथ ही घाटी के मुस्लिमों को दी जाने वाली सब्सिडी जारी रखी जाती है, उनकी रोज़ी रोटी का इंतजाम वहीं कश्मीर में जारी रहता है तो फिर यह डेमोग्राफिक परिवर्तन संभव नहीं हो पायेगा। जरूरी है कि घाटी के मुसलमान अपनी रोज़ी रोटी के लिए देश के बाकी हिस्सों में जाने को मजबूर हों।

आप उनकी ज़मीन नहीं खरीद सकते अगर बेचने की उनकी कोई मजबूरी ना हो। बल्कि अभी हम सेलिब्रेट कर रहे हैं, मैं श्योर हूँ देश के मुस्लिम संगठनों ने घाटी में ज़मीन खरीद कर वहाँ की डेमोग्राफी को बचाए रखने के प्रयास शुरू कर दिए होंगे।

1989 के पहले वहाँ की जो संपत्ति हिंदुओं के हिस्से की थी, उसकी पहचान करके उसे उसके मूल मालिक को लौटाने की सख्त ज़रूरत है। अगर मूल मालिक वहाँ जाकर बसने के लिए तैयार या सक्षम नहीं है तो उसे उचित मुआवजा देकर और ज़मीन को सरकारी कब्ज़े में लेकर वहाँ हिंदुओं की कॉलोनियाँ बनाने की ज़रूरत है। ऐसे नियम बनाने होंगे कि ऐसी ज़मीनों को कोई मुस्लिम व्यक्ति या संस्था ना खरीद सके।

साथ ही वहाँ बसने वाले हिंदुओं की सुरक्षा के स्थायी उपाय किए जाएँ। ये स्थायी उपाय सरकार और सुरक्षा बलों के भरोसे नहीं हो सकते। इसके सामाजिक समाधानों की आवश्यकता होगी।

वहाँ बसने वाले समुदायों को सावधानी से चुनना होगा। यह सही है कि पंजाबी या मारवाड़ी बिज़नेस कम्युनिटी दुनिया में कहीं भी जाकर व्यापार कर सकती हैं, पर वे एक प्रतिकूल वातावरण में अपनी रक्षा करने में उतने सक्षम नहीं हैं।

उसके लिए हरियाणा के जाट-गुर्जर, या बिहार के भूमिहार-यादव समुदायों के जीवट की आवश्यकता है। बल्कि आप पटना से कश्मीर की एक दो ट्रेनें रोज़ चलवा दें… और फिर वहाँ बसने वाले लोगों की गतिविधियों की ओर से अगले 10 सालों के लिए आँखें मूँद लें… 10 वर्षों में जिहादी तंत्र से निबटने लायक हिन्दू प्रतिरोधक क्षमता स्थापित हो जाएगी। बस, इतना याद रखना और दिलाते रहना पड़ेगा… ये सारे समुदाय एक दूसरे के पूरक और सहायक हों… प्रतिद्वंद्वी नहीं।

वरना यह याद रखें… केरल के मल्लापुरम में या बंगाल के मुर्शिदाबाद, बशीरहाट में कोई धारा 370 नहीं है। समस्या 370 नहीं थी, डेमोग्राफी थी। सिर्फ 370 हटी है, डेमोग्राफी नहीं बदली। रास्ता खुला है, सफर अभी बाकी है।

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