एक वामपंथी और नक्सली समर्थक कैसे सुन सकता है हिन्दू सभ्यता की तारीफ!

गिरीश कर्नाड की मौत मुझे अपने बचपन की ओर ले गयी।

शायद कक्षा 4 या 5 में पढ़ते होंगे कि पिक्चरों में अरुचि रखने वाले पिता जी ने एक इतवार को कहा कि हिन्द टॉकीज़ में एक बढ़िया पिक्चर ‘मंथन’ लगी है, चलो देखने चलते थे।

घर के सभी सदस्य 3 रिक्शों पर सवार होकर हिन्द टॉकीज पहुंचे.. पिता के उत्साह का रहस्य खुला… पिक्चर एक कला और डॉक्युमेंट्री टाइप फ़िल्म थी और साथ मे टैक्सफ्री भी! शायद ढाई रुपये का ड्रैस सर्किल का टिकिट था। बालकनी में कितने लोग होंगे… मगर ड्रैस सर्किल में हमारा ही परिवार था। हाल खाली पड़ा था…

पिक्चर गुजरात की दुग्ध क्रांति Operation Flood पर थी। हीरो गिरीश कर्नाड थे। हीरोइन पिक्चर में आदिवासी बनी हुई स्मिता पाटिल थीं।

पिक्चर में कोऑपरेटिव, दूध उत्पादन और गांव वगैरा था… मगर हमें स्मिता पाटिल और गिरीश कर्नाड की ‘आँख-मिचौनी’ ही अच्छा लगी।

एक कोई गाना भी था पिक्चर में “मोरे घर आँगड़ा” टाइप का! मगर धीर-गंभीर गिरीश कर्नाड हमें भा गए! स्मिता पाटिल की शक्ल हमारे घर की महरी से मिलती जुलती लगी तो उनसे हमारा लगाव आगे न बढ़ सका!

पिक्चर के बाद हम सभी भाई-बहन और मां… पिता जी से नाराज़ हो गए। हम सब समझे थे कि कोई धर्मेंद्र – माला सिन्हा जैसे किसी हीरो-हीरोइन की फ़िल्म देखने को मिलेगी!

बाद में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी में ‘मालगुडी डेज़’ में गिरीश कर्नाड ‘स्वामी’ के पिता के रूप में दिखाई दिए। जनाब, यह वह सीरियल था जो आज भी दक्षिणी भारत के घर, पोस्ट ऑफिस, गाँव का रेलवे स्टेशन… हरे भरे खेत, बारिश, जंगल और स्वामी के बालमन से उत्पन्न परिस्थितियों से उपजी कहानियों की याद दिला देता है।

मगर असली ज़िन्दगी में गिरीश कर्नाड एक गुस्सैल, दंभी, वामपंथी साम्यवादी थे। तीन विषयों में ऑक्सफोर्ड से परास्नातक थे। अनेक किताबें भी लिखी… वी बी कारंत के बाद सबसे लब्धप्रतिष्ठ नाट्यकार थे… लिखते भी थे… अभिनय क्या बात थी, वाह!

मगर सनातन संस्कृति से उनकी नफरत इस हद तक थी वह इसके खत्म हो जाने की कामना करते थे। हिंदुहन्ता टीपू सुल्तान के नाम से बंगलौर हवाई अड्डे का नामकरण चाहते थे। गौरी लंकेश, तीस्ता सीतलवाड़, जावेद आनंद, प्रकाशराज और प्रशांत भूषण जैसों से उनका याराना था। JNU में गिरीश कर्नाड पूजे जाते थे।

टाटा लिटरेरी फेस्टिवल 2012 का मुम्बई में आयोजन था। विश्व-प्रसिद्ध बुकर और नोबल पुरस्कार विजेता सर वी एस नायपाल का स्वागत होना था, उनका व्याख्यान भी था। उनसे पहले गिरीश कर्नाड को थियेटर में योगदान हेतु 20 मिनट के व्याख्यान के लिए बुलाया गया।

दरअसल कर्नाड… सर नायपाल की पुस्तक ‘A Wounded Civilization’ से बहुत नाराज़ थे। Wounded Civilization में सर नायपाल ने कर्नाटक में हम्पी नगर को मुस्लिम बादशाहों द्वारा नष्ट करने का भावपूर्ण वर्णन किया था। साथ ही साथ बाबरी ध्वंस को हिंदुओं का साहसिक कार्य बताया था… मुम्बई दंगों में मुस्लिम आतंक की चर्चा की थी।

यह किताब पूरी दुनिया में सराही गई… हिंदुओं के पक्ष को दुनिया ने जाना। गिरीश कर्नाड एक वामपंथी और नक्सली समर्थक होने के नाते हिंदु सभ्यता की तारीफ या बाबरी ध्वंस का महिमा मंडन कैसे सुन सकते थे?

कार्यक्रम में वी एस नायपाल अपनी पत्नी के साथ मौजूद थे। जैसे ही गिरीश कर्नाड को भाषण का मौका मिला, उन्होंने अपना विषय छोड़… सर वी एस नायपाल पर चढ़ाई कर दी। उन्हें वस्तुतः गलियों से नवाज़ा… उन्हें गद्दार कहा…

एक नोबल पुरुस्कार विजेता… जिसका सम्मान पूरी दुनिया करती थी, इंग्लैंड ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि दी थी… उनकी पत्नी लेडी नादिरा नायपाल भी कार्यक्रम में अपने पति का, उनके पुरखों के देश में सम्मान होते देखने साथ आईं हुई थी।

गिरीश कर्नाड ने 40 मिनट तक सर नायपाल को सैकड़ों राष्ट्रीय – अंतरराष्ट्रीय विद्वानों के सामने गलियाया… आयोजक अनिल धारकर ने भी गिरीश की बदतमीज़ी को चालू रहने दिया…

अंततः विश्वप्रसिद्ध दर्ज़नों किताबों का लेखक, नोबल पुरुस्कार विजेता, जो खुद को भारत की संतान कहता था… फफक-फफक कर रो पड़ा… उनकी पत्नी भी अपमान के सन्निपात से जड़ रह गईं… अपमानित और रोते हुए सर वी एस नायपाल कार्यक्रम छोड़कर जाने के लिए मजबूर हो गए। गिरीश कर्नाड हंसते हुए मंच से उतरे! उसके बाद मृत्यु होने तक सर वी एस नायपाल ने भारत की ओर कभी मुख उठा कर नहीं देखा!

गिरीश कर्नाड! यह लेख… मैंने आपको श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं… वरन सर वी एस नायपाल को श्रद्धांजलि देने के लिए लिखा है। कर्नाड साहेब आपकी तुलना मैं वी पी सिंह से करूँगा जो 26/11 के दौरान नामालूम मौत को प्राप्त हुए थे और उनको श्रद्धांजलि देने की फुरसत किसी के पास नहीं थी…

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