नीतू सिंह : तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती, नज़ारे हम क्या देखें

एक पुरुष के रूप में सबसे खूबसूरत पल, जो आपको ताज़िन्दगी याद रहते हैं… जब मूंछों के मुलायम रेशे, आईने में आपको दिखते हैं! यही वह समय होता है जब आप यह सोचना शुरू करते हैं कि मैं ‘कैसा लग रहा हूँ!

वही लम्हा आपको अपने हाईस्कूल में अच्छे नंबरों की चिंता दे जाता है, इतवार को होने वाला क्रिकेट मैच हमें दो दिन पहले ही स्पंदित किये रहते थे! हम लोग सन्डे को 2-3 मैच खत्म कर डालते थे! शाम की मैथ कोचिंग में अगर कोई ‘बालिका’ नहीं… तो कोचिंग जाना उबाऊ हो जाता था!

और उस वक्त अस्सी के दशक में जबकि हमारा कालेज GIC, बरेली के उस बाजार के बीच में था जहाँ, हिन्द, प्रसाद, नावल्टी, कमल, इम्पीरियल और कुमार जैसे सिनेमा हाल छाए पड़े थे! जब तक हम ‘सुधरे बच्चे’ थे…. इंटरवेल में कॉलेज की लाइब्रेरी और कॉलेज के सामने ‘लक्ष्मण दयाल सिंघल पुस्तकालय जाते थे… ज्यों-ज्यों हमारे होंठ के ऊपर के रेशे मूंछ में तब्दील होने लगे, हम पिक्चर हालों के पोस्टर देखने जाने लगे!

हमारी खाकी पैंट देख पिक्चर हाल के गेटमैन ‘पड़ोसी कॉलेज’ का लड़का और ‘लड़कों का हुजूम’ देख कर एक आध ‘सीन’ या गाना देखने से नहीं रोकते थे! आज मुझे उन गेटमैनों पर क्रोध आता है कि सुसरे उसी समय हमें दो लात मार के पिक्चर हाल के बाहर धकेल देते तो शायद हम कुछ ढंग का काम धंधा कर रहे होते…..

खैर ठीक उसी वक्त ‘छम्म’ से नीतू सिंह ने हमारे दिल पर दस्तक दी!! किसी ठरकी ने हम से कह रखा था कि हमारी शक्ल ‘खुशबू’ फिल्म के जीतेंद्र से मिलती है तो हम उस समय जीतेंद्र की सभी फिल्में देख, जितेंद्र पर गहन ‘रिसर्च’ कर रहे थे. उसी दौरान ही हम ‘आतिश’ पिक्चर की हिरोइन नीतू सिंह के दीवाने हो गए!

फिर क्या था, अन्यान्य प्रकार से इकट्ठे किये पैसे से नीतूसिंह की ‘दो कलियां’ से लेकर ‘अमर अकबर एंथोनी’ याराना, कभी-कभी, गैम्बलर, दीवार, काला पत्थर, परवरिश, कसमें वादे, बर्निंग ट्रेन और चोरों की बारात जैसी सभी फिल्में देख डाली गईं! इन पिक्चरों में जितेंद के साथ अमिताभ का बोनस भी मिलता था!

फिल्म वारिस (1969) में नीतूसिंह छोटी गुड़िया के रूप में जितेंद की गोद में दिखाई देती हैं और आतिश (1979) में जीतेंद्र की हीरोइन बनती हैं! विवाह से पूर्व नीतूसिंह ऋषि कपूर के साथ ग्यारह फिल्में करती हैं. उससे पहले अपने चचिया ससुर शशि कपूर और जेठ रणधीर कपूर के साथ हीरोइन बन पेश होती हैं! काला पत्थर की कंघी-चूड़ी और बिंदी बेचने वाली चंचला, फिल्म याराना में अपने प्रेमी का करियर सँभालने वाली गंभीर समर्पित प्रेमिका का रोल निभाती है!

भारतीय सिनेमा में करियर का पीक छू रही कोई सफल अभिनेत्री मात्र 24 साल की आयु में पत्नी धर्म निभाते फिल्मों से संन्यास लेने का कोई उदाहरण नहीं है! बेहद मगरूर… अभिमानी… बददिमाग और दिलफेंक ऋषि कपूर के साथ 37 साल निभाना कोई आसान काम नहीं! अनेकों बार ऋषि-नीतू का रिश्ता लगभग खत्म होने की कगार पर पहुँचता रहा… वह नीतू ही हैं जिन्होंने इस शादी को कायम रखा है!

कल कपिल के शो में नीतू-ऋषि को देखा, दोनों की सोच की दीवार आज भी साफ़-साफ़ नुमाया होती है! आज भी नीतू की साफ़गोई और इमानदारी मुझे आकर्षित करती है!!

मेरी नीतू से 38 साल पुरानी 2000 किलोमीटर दूर की मोहब्बत आज भी जारी है!

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