शिक्षा या रोज़गार, या शिक्षा के साथ रोज़गार भी

भारतीय परंपरा यह कहती है कि 75% मामलों में 16 वर्ष का लड़का कमाई करने में लग जाना चाहिए।

25% लड़के जो उच्च प्रतिभा के धनी होते हैं, आगे भी अध्ययन अध्यापन करते रहें।

आज, अपने आस पास ही सर्वे कीजिए, सफलतम लोग वही मिलेंगे जो इस नियम के अनुसार चले।

16 वे वर्ष के बाद औसत बुद्धि के लड़कों को यूनिवर्सिटी की वनवीक सीरीज और मटरगश्ती के भरोसे छोड़ देना, उनके जीवन के भावी दुःखो को निमंत्रण ही है।

आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इस आयु के बहुत बाद में, यानि 12वी अथवा ग्रेजुएशन करके लड़के कोचिंग जाते हैं और वहाँ, उस उम्र में वर्णमाला के उच्चारण, a, an, the का प्रयोग, वर्गमूल घनमूल और कौनसी नदी कहाँ बहती है, ये सीखने जाते हैं, जबकि ये सब तो उन्हें प्राथमिक शिक्षा में ही बता दिया गया था।

फिलहाल हालत यह है कि bstc और बीएड के इतने कॉलेज हैं कि लाखों सीट खाली जाती हैं, कई लाख लड़के/लड़कियां, टीचर ट्रेनिंग करके पहले से ही खाली बैठे हैं, और फिलहाल जब बीएड/bstc के प्राइवेट कॉलेज वाले, फर्जी उपस्थिति और दो तीन टीचर का भी व्यय उठाने में असमर्थ हैं तो एक नया प्रयोग यह किया है कि आप चार वर्षीय ba/bsc कम बीएड कोर्स कर सकते हैं।

ऐसा नहीं है कि चार वर्ष बाद ये सब टीचर बन जाएंगे, यह योजना तो केवल प्रायवेट कॉलेज का अस्तित्व बनाये रखने के लिए है,,,,,,

पहले एक वर्ष की बीएड फीस भरनी पड़ती थी, ,,,,

फिर दो वर्ष किया गया, अब हरेक कॉलेज कम से कम चार वर्ष के लिए तो अपनी कमाई कर ही सकता है, तब तक और कोई नई योजना आएगी।

खैर, तो ऐसा नहीं है कि ये लोग टीचर बन जाएंगे, चार वर्ष के बाद, फिर से इन्हें रीट वगैरह की परीक्षा देनी होगी और फिर से किसी कोचिंग में नए सिरे से संज्ञा, सर्वनाम, लसप, मसप, और अम्ल, क्षार लवण पढ़ना होगा, मेरिट बनेगी, रिज़र्वेशन वाले अलग छांटे जाएंगे, कोर्ट में अपील होगी और लगभग बुजुर्ग होने की उम्र में, वे नौकरी पर जाएंगे और दो वर्ष तक फिक्स वेतन पर काम करने के बाद उन्हें सरकारी टीचर माना जाएगा।

तब तक सारा उत्साह समाप्त हो जाएगा, जो हुनक 16वें वर्ष में नया काम सीखते समय होती है, वह कभी लौटकर नहीं आएगी, और फ्रस्ट्रेड मन से शेष जीवन दुनिया, भगवान, व्यवस्था और अफसरों को कोसते हुए निकाल देंगे।

इस बीच, उन्हें जो कुंठा और प्रतीक्षा झेलनी होगी, परीक्षा में पास होने की तिकड़म, शिक्षा के नाम पर तोतों की तरह रटते, अनजानी कृत्रिम भाषा के स्पीच, और एक बार फिर से वर्णमाला, गिनती और पहाड़े के उबाऊ आलेख, कोई नवनिर्माण का रास्ता नहीं।

इधर ये एक फोटोकॉपी के लिए भी तरसते हैं, उधर 16 साल वाले इन 10 वर्षों में घर की जिम्मेदारी संभालते हुए, देश और समाज को भी कुछ देते हुए, संतुलित मन से आगे बढ़ रहे होते हैं।

कभी इंजीनियरिंग के नाम पर ठगी चलती थी, अब टीचर ट्रेनिंग के नाम पर।

और शिक्षा….?

50 वें वर्ष में समझ में आता है कि शिक्षा तो कभी हुई ही नहीं, जो चल रहा था वह तो केवल कुछ कम्पनियों का षड्यंत्र मात्र था।

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