लद चुके हैं दिखावे की राजनीति और छद्म सेक्यूलरिज़्म के दिन

गाज़ीपुर संसदीय सीट से संबंधित एक खबर पढ़ने को मिली जिसके अनुसार वहां से गठबंधन की ओर से बसपा प्रत्याशी अफज़ाल अंसारी ने जुमे के दिन मस्जिदों में होने वाली नमाज के दौरान क्षेत्र की सभी मस्जिदों में अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से बैठक करके सभी मुसलमानों के यहां एक संदेश भिजवाया कि वह अपने इलाके में होने वाले किसी भी चुनावी सभा में भाग ना लें। अगर किसी चुनावी सभा में सम्मिलित होना बहुत ज़रुरी लगे तब बगैर टोपी के ही वहां आयें।

बाकी तो इस तरह के फरमान पढ़कर आसानी से ही समझ में आ जाता है कि अफज़ाल नहीं चाहते कि उनकी सभाओं में मुस्लिमों की भीड़ देखकर कोई ऐसा संदेश जाये जिससे विरोध में हिन्दू मतों को लामबंद होने का कोई मौका मिले।

बाकी इस खबर के आलोक में पूरे देश में चल रहे चुनावी माहौल को ज़रा बारीकी से देखा जाय तो थोड़ा आश्चर्य होता है कि रमजान का महीना होने के बावजूद भी चुनाव के दौरान अब तक कहीं से किसी भी नेता द्वारा इफ्तार पार्टी के आयोजन या उसमें शामिल होने की खबरें देखने को नहीं मिली।

आमतौर पर रमजान के दौरान दिनभर पेट भर के खाने के पूरे दिन बगैर भोजन पानी के रहे रोजेदारों के साथ बैठकर इफ्तार पार्टी की दावत उड़ाने के लिये तथाकथित सेक्यूलर नेताओं की होड़ लगी रहती थी। लेकिन इस चुनाव के दौरान ही रमजान होने के बावजूद भी कोई दिखावे के लिये भी इफ्तार पार्टी का आयोजन नहीं कर रहा है।

वास्तव में यह सब पिछले पांच साल में हुआ एक सामाजिक परिवर्तन है जिसका कारक मोदी हैं।

पिछले लोकसभा चुनाव में ही करारी हार के बाद जब कांग्रेस ने अपनी हार पर मंथन करते हुये एक समिति बनायी और उसमें कांग्रेस को मुस्लिमों की नज़दीकी पार्टी मानकर आम जनता द्वारा नकारे जाने को एक प्रमुख कारक बताया गया, तब से कांग्रेस सहित सारे विपक्षी दल मुसलमानों से थोड़ा कन्नी काटने लगे।

फिर स्थिति टोपी पहन कर सभा में आने पर रोक लगाने से शुरू होकर इफ्तार पार्टियों में ना शामिल होने तक का हो गया। आज रमजान में अब तक कोई इफ्तारी नहीं हुई यह प्रदर्शित करता है कि अब दिखावे की राजनीति और छद्म सेक्यूलरिज़्म के दिन लद चुके हैं।

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