हनुमान चालीसा का ज्योतिषीय रहस्य

अपने आप सुनते रहने से अपने अपने विचार भी बनते रहते हैं। तल्लीनता से सुनने पर समझ भी अलग आता रहता है। एक सिक्वेंस को समझना अपनेआप ही बनता जाता है।

यह लेख भी कुछ वैसा है। हनुमत बलबीरा का ज्योतिष दृष्टि से जो कि मेरे लिए भी नया विषय रहा, तो अलग ही दृष्टि गयी। वही दृष्टि जो मैंने कहीं पढ़ी तो नहीं, मन में जो आया, वही लिखता हूँ।

आरम्भ में ही है – जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीश तिहुँ लोक उजागर – हनुमान जी को शिवांश कहा जाता है। वैसे तो नेचर को देखकर मंगल के देवता माने जाते हैं, पर यहां चन्द्र के शुभ पक्ष को भी साथ नेचर के साथ ही समेटे हैं। शिवांश होने के कारण। शुभ चंद्र सदैव शुभ निर्णय ले सकने की असीम क्षमता प्रदान करता है। ये इतना कन्विनसिंग नहीं होते हुए भी मुझे लगा है। मंगल और सूर्य की उग्रता को चन्द्र की सहायता ही शांत रूप में रखती है। यही बात साबित होती है – शंकर सुवन केसरी नंदन, तेजप्रताप महाजगवंदन से। शिवांश वाली बात।

फिर है – कंचन बरन विराज सुवेसा, कानन कुंडल कुंचित केसा-
राहू के विषय में जानने वालों को पता है कि स्वर्ण और कुंडल का क्या महत्त्व है, अपने हनुमान बली उसे सहज ही कंट्रोल करते हैं।

सूर्य का स्पष्ट ही है – जुग सहस्त्र जोजन पर भानु, लील्यो ताहि मधुर फल जानू – खेल खेल में ही सूर्य को गप्प कर जाते हैं। पर आगे और है – आपन तेज सम्हारो आपै, तीनो लोक हांकते काँपे।

ये मंगल की उग्रता ही है। सूर्य को सभी ग्रहों में बली माना जाता है। जो कुंडली में अपने साथ या आसपास के घर में बैठे ग्रहों को, निश्चित डिग्री पर अस्त करने की क्षमता भी रखता है। पर हनुमान जी लाल फल समझ कर उसी ओर दौड़ कर, बाल आयु में भक्षण को तत्पर हो गए रहे। वहां भी कंट्रोल करते हैं।

केतु का स्वभाव हृदय से सोचना है। भक्ति हनुमान जी का स्वभाव है। पूरी हनुमान चालीसा ही केतु के परम स्वभाव से भरी है। दूसरी चौपाई ही शुरू होती है – रामदूत अतुलित बलधामा। रामदूत शब्द ही केतु का स्वभाव निश्छल रूप है। बलधामा तो मंगल का अपना स्वभाव हो गया। प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया – ये भी केतु लगातार लगा अपने काम में। तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राममिलाय राजपद दीन्हा – ये भी युति सहित हनुमान जी को परम लक्ष्य से युत करता है। फिर आगे आगे और है, स्वयं विचार करें।

बृहस्पति के विषय में कहना तो क्या कहना – विद्यावान गुणी अति चातुर, रामकाज करिबै को आतुर – ऐसे समेत कई चौपाइयां हैं। कुमति निवार सुमति के संगी – इसे देखिए। जय जय जय हनुमान गुसाईं, कृपा करो गुरुदेव की नाई – इससे तो कोई संशय ही नहीं रह जाता है।

विशेष बात ये है कि भक्ति, शौर्यता सहित हनुमान जी का चरित्र ही अपने आप में अकेला खासा चरित्र है। बृहस्पति का विशेष ही योगदान है।

अब रहे शनि बाबा। प्राच्य विद्या के कारक तत्व। ऊपर से नीचे तक वर्णन है। सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा – अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता, – ये सब।
विशेष बात पर गौर करिएगा, दो जगह आया है –
पहला – प्रभु मुद्रिका मेल मुख माही, जलधि लांघ गए अचरज नाही – रामजी की मुद्रिका रखनी थी, मुख में रखी। कहीं और रख सकते थे, पर रखी मुख में। रामनाम सदैव मुख में। वहीं उसे रखा। वही शुरुवात है।
दूसरा आता है – राम रसायन तुमरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा, – ये बाद में आता है पहले से। पहले मुख में रखो रामनाम, फिर वही करेगा सारे काम… तो ऐसे चलता है।

शनि महाराज से मैं जरा भक्ति में खिसक गया, वापिस कंसंट्रेट करता हूँ। तो प्राच्य विद्या में – सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा, विकट रूप धरि लंक जरावा। भूत पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे। तुलसी बाबा ने भी पहले प्रेत ही सिद्ध किया रहा, पर प्रेत से मांगा तो हनुमान जी का पता मांग लिया, अब प्रेत खुद ही डर गया, बोले, कहाँ फंसा दिया, उनसे मिलाने की मेरी क्या औकात, पता बता देता हूँ, सो मिल लेना।

विनय पत्रिका में हनुमान जी से मनुहार की बहुत सी बातें हैं, मुझे आश्चर्य होता है, कभी स्वयं पढ़िएगा। पर्सनल लव ऑफ हनुमान जी की काफी बाते मिलेंगी।

बहरहाल, तो हनुमान जी से मिलने के बाद, रामजी का पता पूछ लिया, हनुमान जी सदा साथ रहे। रामजी से मिलने की बात तो पता ही है।

शुक्र और बुध का विवरण नहीं दिया। बुध को राजकुमार ग्रह कहा जाता है, जितने जितने गुण राजकुमार के वही गुण चालीसा में हैं ही –
लाय सजीवन लखन जियाये
श्री रघुबीर हरषि उर लाये
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई

शुक्र महाराज सबको ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं तो –
अष्ट सिद्धि नवनिधि के दाता, असबर दीन जानकी माता – ये है ही। अस कही श्रीपति कंठ लगावे – रामजी को श्रीपति कहा। काफी होता है सुधिजन को समझने को।

लिखने को और भी लिखा जा सकता है, पर आप स्वयं विचार करिए, एक सीक्वेंस हनुमान चालीसा में मिलेगा। स्टेप बाय स्टेप।

मैंने भी बचपन में पढ़ी सुनी, पर इस साल के आरम्भ में इसका प्राकट्य अपने आप हुआ। मतलब अलग ढंग से समझ आने लगा। यूं समझिए कि मंगल की उग्रता इतनी अधिक होती है कि उसे सम्हाल पाना मुश्किल हो जाता है। मेरी अपनी बात है, लिखने का औचित्य तो नहीं, पर यूं समझिए कि जिससे लोग अमूमन डर जाते हैं, मंगल की उग्रता उसी का सर्वनाश करने को उद्यत हो जाती है। ये अनोखी बात होती है। और हनुमान चालीसा ऐसे समय में मेरी सहायता कर गयी, चित्त शांत करते हुए। अब तो सुनने में, गाने में और भी आनंद आता है। अपने रहस्य को स्वयं उजागर करती है।

यह लेख किसके काम आ सकता है, वो मुझे नहीं पता, पर ऐसा है कि जो कार्य करिए, तल्लीनता से मन लगाकर करिए, इस सृष्टि के ऐसे ऐसे रहस्य सामने उजागर हो जाते हैं कि आश्चर्य ही होता है। सब जोड़भाग गुणा अपना काम करते रहते हैं।

सवेरे का राम राम

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY