गरीब मुसलमानों को लुभाने के लिए मोदी का वादा : स्लॉटर हाउस किये जायेंगे बंद

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PM Modi and Indian Muslims - Making India

अभी कोई बीस साल पहले तक मेरे गाँव की जनसंख्या में मुसलमानों का हिस्सा 60% से भी ज्यादा था… लगभग एक दर्जन से ज्यादा लोग कट्टी का काम करते थे… ये एक से ज्यादा भैंस रोज काटते थे, उनका गोश्त रोजाना बिक जाता था…

तमाम मुस्लिम तड़के ही गांवों में निकल जाते और शाम तक एक-दो बीमार कमजोर भैंस या पड्डा खरीद लाते… ये कमजोर पशु ही काटे जाते थे… मुसलमानों के 90% घरों में मीट प्रायः रोजाना ही पकता था…

कई लोग चर्बी, खाल, सींग और हड्डी का काम करते थे… कुरैश मुसलमानों की पूरी जनसंख्या जो कि कुल मुसलमानों में दो तिहाई से भी ज्यादा थी, उनकी रोजी इसी गोश्त के इर्द गिर्द ही चलती थी…

लेकिन अब हालात ना जाने कब बदल गए… जहां बीस साल पहले हमारे छोटे से गाँव में एक दर्जन से अधिक कसाई बीस भैंस काट कर बेच लेते थे… और 90% मुसलमान नित्य मीट खाते थे, वहीं अब मात्र दो लोग कट्टी का काम करते हैं…

बस एक भैंस काट कर, बर्फ में लगा कर दो दिन में निपटा पाते है, और गोश्त तो मानों मुसलमानों के लिए ऐसा, जैसे हिन्दू ड्राई फ्रूट या मिठाई लेते हैं. गोश्त भी मुसलमानों के लिए वैसा ही लक्जरी आइटम हो गया है… दूध तो चाय के लिए भी मुश्किल खरीद पाते हैं…

मुसलमानों के लड़के अब बीमार पशु खरीदने के लिए नहीं निकलते बल्कि तड़के ही आगरा में फ्रूट की ढकेल (ठेला) लगाने के लिए निकल पड़ते हैं… सम्पन्न मुसलमान हिदुओं के खेत बटाई पर लेकर आलू की खेती करते हैं…

साल में औसतन चार महीने मुस्लिम लड़के भी आलू के व्यापार या खेती के कारोबार से जुड़े दिखते हैं… आठ-दस बच्चे पैदा करने के बावजूद इनका जनसंख्या अनुपात 60- 40 से घट 40-60 रह गया है. वो भी वोटर लिस्ट में ही अन्यथा किसी भी चुनाव में मुस्लिम बूथों पर 40% मतदान भी नहीं होता… जाहिर है रोजगार के लिए तेजी से पलायन हुया है.

ये सब हुया है गोश्त कारोबार के बड़े स्लॉटर हाउस के कब्जे में जाने से… अब आगरा और अलीगढ़ के कट्टीखाने में बीमार पशु नहीं बल्कि स्वस्थ भैंस कटतीं हैं…

इन स्वस्थ भैंस या पड्डों का व्यापार भी हरेक के बस की बात नहीं… केवल गिने-चुने संपन्न मुसलमान ही महंगी भैंस खरीद कर इन कट्टीखानों तक पहुंचाते हैं… दूध वाली भैंस जब कट्टीखाने तक पहुँच रहीं हैं तो दूध का उत्पादन भी प्रभावित हुया है, सो दूध मंहगा हुआ है.

ये तो मेरे गाँव का उदाहरण है… लेकिन मेरे गाँव खंदौली जैसी ही कहानी किरावली, मिड़ाकुर, अछनेरा, शमसाबाद, सादाबाद या महावन जैसे गांवों की ही नहीं, बल्कि आगरा के मिनी पाकिस्तान से दिखने वाले मंटोला, घटिया, मामू भांजा, आलम गंज या नयी बस्ती जैसे मोहल्लों की भी है…

भाजपा के घोषणापत्र में स्लॉटर हाउस बंद करने के वादे को हिन्दू अपने से ना जोड़ें… ये वादा विशुद्ध रूप से मुसलमानों, विशेष कर गरीब मुसलमानों के हित से जुड़ा हुआ है…. बिलकुल वैसे ही, जैसे तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं से…

हिंदुओं पर तो स्लॉटर हाउस बंद होने या ना होने से, केवल दूध के सस्ते या मंहगे होने मात्र का ही फर्क पड़ना है… पशु तो कटेंगे ही… मशीन वाले कट्टी खाने में तंदुरुस्त भैंस ना सही… बीमार या कमजोर के नाम पर मैनुअल कट्टीखानों में कलमे के साथ सल्ला चालू रहेगा…

लेकिन ये कदम मुसलमानों के एक बड़े वर्ग को रोजी और उनकी रोटी को गोश्त के स्वाद का साथ वापस दिलाएगा जो कि गोश्त की आसमान छूती कीमतों के कारण छूटा हुया है… स्लॉटर हाउस बंद होंगे तो मीट एक्सपोर्ट भी बंद होगा… सो दूध और गोश्त दोनों ही सस्ते मिलेंगे.

भाजपा जन सीना ठोक के मुसलमानों के सामने खड़े हो सकते हैं… उनको बताया जा सकता है कि भाजपा उनको मदरसे या मस्जिद से बहकाने वाली पार्टी नहीं, हमारी पार्टी तुम्हारी महिलाओं के लिए भला करने वाली पार्टी है… तुम्हारी मूल रोजी को किसी धनिक की मोनोपली से बाहर निकाल गरीब आम मुसलमानों के हाथ में देने वाली पार्टी है… तुम्हारी रोजी के साथ तुम्हारी रोटी की रकाबी को आबाद करने वाली पार्टी है.

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