सारे असामाजिक तत्वों के प्रायोजक के तौर पर उभर रही है कांग्रेस

एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है! और आतंकवादियों की एक छोटी टोली सवा सौ करोड़ के देश को आतंकित और परेशान कर सकती है.

कारण होता है रूल्स ऑफ़ एंगेजमेंट – यानी कार्यपद्धति के नियम.

एक आतंकवादी के लिए समाज के कोई नियम लागू नहीं होते है. वह किसी भी राह चलते व्यक्ति को पकड़ कर उसे ढाल बना सकता है. किसी भी घर में घुस कर निवासी को मार कर उसे अपना अड्डा बना सकता है. किसी का भी क़त्ल कर सकता है, किसी भी क़ानून/नियम को तोड़ सकता है.

इसके ठीक विपरीत देश के क़ानून के रक्षक – पुलिस बल और देश की सीमाओं के रक्षक – सेना, नियम कानूनों के दायरे में ही काम कर सकते है.

देश के बुद्धिजीवियों की विदेश से प्राप्त पैसों पर पलने वाली फौज इन के हर गतिविधि पर पैनी नजर रखती है और हर किसी उल्लंघन पर बड़ा बवाल मचा देती है, नाक में दम कर देती है.

किसी अपराधी की भी मौत पर वर्षों, कभी दशकों तक व्यक्ति जांच, मुकदमों, निलंबन वगैरह के घेरे में फंसा रहता है. नियम के विरुद्ध काम करने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं होता. सच तो यह है कि किसी भी तरह का काम करने के लिए प्रोत्साहन नहीं होता.

यही कारण है कि एक छोटे से आतंकवादी दल को बड़ी सी सेना भी निबटा नहीं सकती.

जनतंत्र में परस्पर विरोधी विचारों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है. इन विचारों के अनुसार देश को चलाने की मोहलत भी होती है, बशर्ते जो देश को चलाना चाहते है वे अपने विचारों को जनता के समर्थन को चुनाव के द्वारा सिद्ध कर सकते है.

चुनाव तो हर पाँच वर्षों में एक बार होना तय है. जो विरोधी पक्ष होता है, उसे सत्ता के लाभ (!) हासिल नहीं होते है. यह एक असुविधाजनक बात है. लेकिन सब से बड़ी सुविधा यह होती है कि सरकार चलाने का जिम्मा उनका नहीं होता है.

जब तक विरोधी पक्ष अपने विचार सभ्य, संसदीय तरीके से आगे रखता है, और इस के बदौलत सत्ता प्राप्त करने के लिए जनसमर्थन जुटाना चाहता है, इस में कोई अड़चन नहीं है. ऐसा होना ही आदर्श स्थिति है.

लेकिन इस से एक और सरल उपाय ढूंढ लिया गया है! आतंकवादी और असामाजिक तत्त्व क़ानून के दायरे में नहीं आते. उन को अपना प्रभाव समाज पर डालने के लिए और भी तरीके उपलब्ध है. जब विरोधी पक्ष ऐसे असामाजिक तत्त्वों के साथ सांठ गाँठ बना लेता है, तब सत्ताधारी पक्ष के सामने बड़ी कठिन चुनौती बन जाती है, कि उस को कैसे सुलझाया जाए.

कश्मीर में पत्थरबाज लड़के जब सेना को निशाना बनाते है, विरोधी पक्ष इस के लिए सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराते है, और पत्थरबाजों को ‘भटके हुए नौजवान’ बताते है. इस से बड़ी विचित्र परिस्थिति बन जाती है – एक तो क़ानून व्यवस्था को संभालो, और दूसरे इन अवसरवादी राजनेताओं को भी संभालो, कि कहीं इन घटनाओं के कारण विदेशों में भारत के नाम की किरकिरी न हो जाए.

मध्य भारत के बीहड़ों, खनिज समृद्ध इलाकों और जंगलों में नक्सलवादी दस्तों की तूती बोलती है. वे जब-तब धमाके कर, घात लगा कर हमले कर अर्धसैनिक बल और स्थानिक नेताओं की हत्याएं करते है, और विपक्ष के नेता इन को उपेक्षित घटक और विकास के दायरे से बाहर छूटे हुए अभागे बता कर इस संगीन अपराध की धार कम करने में लगे होते है.

छत्तीसगढ़ में कुछ वर्ष पहले कांग्रेस के दस्ते पर हुए जानलेवा हमलों में कांग्रेसी नेतृत्व की एक पीढ़ी को नष्ट किया गया, और जांच में एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता की भी संलिप्तता की बातें सामने आई. लेकिन इस को दबा दिया गया. नेता और अपराधियों में सांठगाँठ की ऐसी कहानी कई बार दोहराई गई है.

मुंबई में 26/11 के हमलों की रेकी करने वाला डेविड हेडली समाजवादी पार्टी नेता अबू आज़मी के पुत्र का मेहमान था, और उसे सहायता दी गई थी.

1993 के मुंबई बम धमाकों में आरडीएक्स इस्तेमाल हुआ था उसे जो तस्कर पाकिस्तान से लाए थे, वे राजनेताओं के संरक्षण के नीचे काम कर रहे थे. एक बड़े केंद्रीय मंत्री, दाउद इब्राहीम के गुर्गे को, सेना के विमान में अपने अधिकार में दिल्ली से मुंबई लाए थे. भारत का राजनीतिक इतिहास ऐसे अनगिनत उदाहरणों से भरा हुआ है.

आज कांग्रेस इतिहास के एक बड़े नाटकीय मोड़ पर है. अपने युवराज के लिए कई योग्य, अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं की बलि चढाने के बाद वह खुद को एक अजीब से, बौने और वंशवादी छुटभैय्ये नेताओं की झुण्ड बनी देख रही है.

इस तरह के जुगाडू पक्ष को पुनः सत्ता के दर्शन होना लगभग असंभव दिख रहा है. संसाधनों, नेताओं, कार्यकर्ताओं की कमी, और सब से अधिक चोट करनेवाली कमी – प्रखर, प्रभावशाली विचारधारा की कमी ने कांग्रेस को अपाहिज बना दिया है.

और सत्ता वापस पाने के लिए वह अपने प्रयासों में नीति, सामाजिक व्यवहार के संस्कार, और क़ानून की अनदेखी कर रही है.

इसीलिए शायद जो बात अब तक चोरी छुपे होती थी, वह आज खुल कर, डंके की चोट पर हो रही है. कांग्रेस सारे असामाजिक तत्त्वों के प्रायोजक की तौर पर उभर रही है – चाहे वह ज ने वि (JNU) में भारत के टुकड़े करना चाह रही गद्दारों की टोली के पक्ष में आना हो, या हिंसक आन्दोलनों का पक्ष लेना हो, जैसे किसानों को हिंसा के लिए उकसाना (भट्टा परसौल, मंदसौर…) दलितों को हिंसा के लिए उकसाना (आम्बेडकर स्टडी सर्कल चेन्नई, वेमुला काण्ड, भीमा कोरेगांव – इसमें राष्ट्रवादी कांग्रेस का छुपा हाथ बताया जाता है, लेकिन पुष्टि होना असंभव है, ये लोग इस खेल में बड़े माहिर है) हिंसक गुज्जर, जाट, पाटीदार आरक्षण आन्दोलन को समर्थन इत्यादि.

अब नवीनतम प्रयोग हो रहा है सो करणी सेना के नाम पर कांग्रेसी गुंडों का हिंसाचार!

जो अहमदाबाद का मॉल फूँका गया उस में बाकायदा सूचना लगी थी कि ‘यहाँ पद्मावत मूवी नहीं दिखाई जाएगी’. तो क्या करणी सेना को चर्बी ज्यादा चढ़ी हुई है कि वह अपनी ताकत ऐसे जगह बेकार में खर्च करे? क्या पद्मावत दिखाने वाले थिएटर कम है तोड़फोड़ करने के लिए?

हरियाणा में एक स्कूल बस पर हमला हुआ. बच्चों पर वार करने से किसी भी संगठन की बहुत तेज बदनामी होगी, चाहे उन का उद्देश्य कोई भी हो. क्या करणी सेना खुद को बदनाम करने पर तुली है?

नॉएडा में एक टोल प्लाजा फूंक दिया गया. अब टोल प्लाजा और पद्मावत का क्या सम्बन्ध? उसे फूकने की जहमत करणी सेना क्यों उठाएगी? क्या इस से उन का उद्देश्य साध्य हो रहा है? नहीं. तो ऐसे काम क्यों हो रहे है?

ऐसा इसलिए हो रहा है कि नीच राजनीति के चलते भाजपा विरोधी तत्त्व (मुख्यतः कांग्रेस) भाजपा शासित क्षेत्रों में हिंसाचार और अराजक फैलाना चाहते है.

वे खुद उस में संलिप्तता नहीं चाहते (हालांकि मंदसौर हिंसा के दौरान एक कांग्रेसी नेता आगजनी के निर्देश देते हुए रिकार्ड की गई है) बल्कि उनकी इच्छा छुटभैय्ये संगठनों को प्रलोभन दे कर उनके द्वारा इन घटनाओं को अंजाम देने होती है. और इस में वह बखूबी सफल होती हुई भी दिखाई दे रही है.

षडयंत्र और संलिप्तता दर्शाते कई मुद्दे है – हार्दिक पटेल, जो पाटीदार आन्दोलन का चेहरा था, कांग्रेस के साथ है. जिग्नेश, जो उना प्रदर्शनों का चेहरा था, अब कांग्रेस समर्थित विधायक है.

मोदी के धुर विरोधी विहिप के सरगना प्रवीण तोगड़िया कांग्रेस और हार्दिक के साथ खड़े दिखते है. हाल ही में करणी सेना के कुछ नेता कांग्रेस से नैनमटक्का करते अखबारों/माध्यमों ने रिपोर्ट किए है… इस सांठ गाँठ की फेरहिस्त बड़ी लम्बी है.

ध्यान रहे, सारी गड़बड़ भाजपा शासित राज्यों में ही हो रही है. क्या भाजपा इतनी बुरी शासक है कि अपने ही राज्यों में अराजक की स्थिति बना रही है, और कांग्रेस के शासन में रामराज्य है? नहीं. लेकिन मुख्य बात है कि जहां दंगे हो रहे है, वहां ‘कांग्रेस विपक्ष में है’.

इसका इलाज क्या है?

इस का इलाज बहुत कठिन है. क्यों कि यह केवल कानून व्यवस्था का प्रश्न नहीं है. इस का समाधान केवल भुजबल पर करना गलत होगा, और कांग्रेस के मंतव्य को पूरा करने जैसा होगा. इस समस्या के साथ लड़ने में क़ानून व्यवस्था अपना एक हाथ पीछे बाँध कर लड़ रही है. स्थिति बड़ी शोचनीय है.

समाधान का एक ही रास्ता मुझे नजर आता है – सामाजिक जागरण.

इस तरह के उत्पात के पीछे के षडयंत्र को उजागर कर लोगों में इस के बारे में चेतना लाना आवश्यक है. कांग्रेस के सुन्दर मुखौटे के पीछे छिपे घिनौने चेहरे को बेनकाब करने से ही जो लोग आज कांग्रेस के समर्थक है वे दूर होंगे, और चुनाव दर चुनाव हारने से ही कांग्रेस उतनी क्षीण हो सकती है कि इस उत्पात को पोसने की उसकी शक्ति और इच्छा प्रभावहीन हो जाए.

यदि आप इस से सहमत हैं, तो इस बात को जरूर सांझा कीजिए, जिससे इस समाधान की ओर हम एक कदम आगे बढ़ सकें!

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