हिंदी फिल्मोग्राफी में सिर्फ़ एक बदनुमा दाग है भंसाली की पद्मावत

संजय लीला भंसाली मेरे पसंदीदा निर्देशक नहीं हैं. भंसाली की देवदास देख कर लौटा था तब ही उन के बारे में मेरी राय बिगड़ गई थी.

लेकिन उन की बाजीराव मस्तानी विवादित होने के बावजूद फिल्मोग्राफी के हिसाब से अच्छी लगी थी.

बाजीराव मस्तानी के इम्प्रेशन में ही पद्मावत देखने चला गया. अफ़सोस कि इस साल यह पहली फ़िल्म जो देखी, वह बहुत ही मामूली और वाहियात निकली. हैदर अली आतिश का वह एक मशहूर शे’र याद आ गया :

बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का
जो चीरा तो इक क़तरा-ए-ख़ूँ न निकला

करणी सेना वाले मूर्ख हैं. उन का विरोध ही इस फ़िल्म को चला देगा तो चला देगा वरना यह पिटी हुई घनघोर बकवास फ़िल्म है.

वैसे भी इस फ़िल्म में विरोध करने के लिए कुछ है नहीं. पिक्चराइजेशन, स्क्रिप्ट, गीत, संगीत, निर्देशन सब कुछ दो कौड़ी का है. बहुत ही बिखरी-बिखरी और उलझी हुई फ़िल्म है.

सारा फोकस रणवीर सिंह पर है. शाहिद कपूर को सिर्फ़ शहीद करने के लिए ही जैसे रखा गया है. चरित्र और अभिनय दोनों ही में वह अंगुली कटवा कर शहीद हो गए हैं. दीपिका पादुकोण के लिए भी कुछ नहीं है. बहुत ही नकली और खोखली फ़िल्म है यह.

संजय लीला भंसाली को कोई बताए भी कि सिर्फ़ सेट, इतिहास और इतिहास के विवाद से अच्छी फ़िल्म नहीं बनती, न ही चलती है.

करणी सेना की मूर्खता भरे विवाद पर भी तरस आता है कि किस बकवास के लिए देश का माहौल दूषित और हिंसक बना दिए हैं और दीवार में सिर मार रहे हैं. ऐसे बुद्धिहीन होते हैं भला यह क्षत्रिय!

अब कोई यह भी कह सकता है कि ढेर सारे कट्स हैं फ़िल्म हैं, इस लिए फ़िल्म चू-चू का मुरब्बा बन गई. तो यह तर्क भी बेमानी है. आप जब बाज़ार में अपना प्रोडक्ट बेचने निकले हैं तो आदमी आप का प्रोडक्ट देखेगा, अपने पैसे और समय का जस्टिफिकेशन देखेगा, आप की सफाई नहीं.

जायसी का पद्मावत भी पढ़ा है मैं ने. जायसी का पद्मावत मिठास घोलता है, प्रेम की मिठास, आध्यात्म की बांसुरी बजती है उस में. लेकिन भंसाली की पद्मावत में सिर्फ़ हिंसा की आग है, वह भी बचकानी हिंसा.

भंसाली की पद्मावत हिंदी फिल्मोग्राफी में सिर्फ़ एक बदनुमा दाग है और कुछ नहीं. इसे देखने जाना वक्त और पैसे दोनों की बर्बादी है. बिकाऊ मीडिया की तारीफ़ के पुल पर हरगिज यकीन मत कीजिए.

भंसाली की ही फ़िल्म बाजीराव मस्तानी के मुकाबले यह पद्मावत उन्नीस तो क्या दस भी नहीं ठहरती. बाजीराव मस्तानी के मुकाबले पद्मावत के सेट भी दो कौड़ी के हैं.

चितौड़ का कागज़ का किला लगता है. खिलजी का किला भी कागज़ी है. कंप्यूटर के सहारे ही जब सारे सेट और स्टंट दिखाने हैं तो इस में भी खेल क्यों किया भंसाली ने?

बाहुबली जैसी फिल्मों के शानदार सेट और स्टंट पहले ही से फ़िल्मी बाज़ार में डंका बजाए हुए हैं. भंसाली क्या यह भी नहीं जानते? कि यह सब भी कट की भेंट चढ़ गए? मुगलिया साज़िश को धार देने में भी भंसाली पिट गए हैं.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY