मोदी विरोधी मूर्खों के हंगामे हुड़दंग से बिलकुल न हों विचलित

रघुराम राजन सरीखे धूर्तों और मोदी विरोधी मूर्खों के हंगामे हुड़दंग से कतई विचलित मत होइए….

कोई अल्पज्ञानी अज्ञानी गंवार यह बात कहता तो उसकी बात की अनदेखी की जा सकती थी। लेकिन भारत के रिजर्व बैंक के गवर्नर की कुर्सी पर लगातार 3 साल तक बैठ चुका शख्स जब ऐसी बातें करता है तो सन्देह होता है उसकी नीयत पर, उसके चरित्र पर। उसके इरादों पर।

यहां मैं बात कर रहा हूं उन रघुराम राजन की जो 2013 से 2016 तक भारत के रिज़र्व बैंक के गवर्नर रह चुके हैं और अब अमेरिका में रह रहे हैं।

इन्हीं रघुराम राजन ने आज 6 महीने पुराने अपने एक लेख का लिंक पुनः ट्वीट किया और इस बात पर अपनी छाती कूटी कि मोदी सरकार के साढ़े 4 वर्ष के शासनकाल में भारत सरकार का कर्ज़ 51 प्रतिशत बढ़कर 81 लाख करोड़ हो गया है।

ध्यान रहे कि रघुराम राजन का यह लेख 19 जनवरी 2019 को छपा था। इसके बाद ही मोदी विरोधी खेमे ने पूरे देश में अपनी चुनावी मुहिम का प्रमुख हथियार इस बात को बना लिया था कि मोदी शासनकाल में भारत पर कर्ज़ कई गुना बढ़ गया है, भारत कर्ज़ में डूब गया है।

अब यह भी जानिए कि किसी देश के कर्ज़ की स्थिति के आंकलन का मानदंड उस देश के सकल घरेलू उत्पाद GDP के अनुपात के अनुसार किया जाता है कि उसका कर्ज़ उसके GDP का कितना प्रतिशत है।

अब यह भी जानिए कि दुनिया की 10 प्रमुख आर्थिक महाशक्तियों की सूची में शामिल देशों के कर्ज़ की क्या स्थिति है।

जापान में यह अनुपात 234.18 प्रतिशत है।

इटली में यह अनुपात 127.51 प्रतिशत है।

अमेरिका में यह अनुपात 109.45 प्रतिशत है।

फ्रांस में यह अनुपात 96.20 प्रतिशत है।

ब्राज़ील में यह अनुपात 90.24 प्रतिशत है।

ब्रिटेन में यह अनुपात 85.92 प्रतिशत है।

कनाडा में यह अनुपात 83.81 प्रतिशत है।

भारत में यह अनुपात 67.29 प्रतिशत है।

जर्मनी में यह अनुपात 55.75 प्रतिशत है।

चीन में यह अनुपात 54.44 प्रतिशत है।

ज्ञात रहे कि दुनिया की 10 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत 6ठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है लेकिन उन 10 देशों में केवल जर्मनी और चीन ही 2 ऐसे देश हैं जिनकी GDP के सापेक्ष कर्ज़ का अनुपात भारत से कम है। शेष 7 देशों का अनुपात भारत से अधिक है।

तो क्या यह मान लिया जाए कि अमेरिका, जापान, फ्रांस, ब्रिटेन सरीखे देशों की अर्थव्यवस्था बरबाद तबाह हो चुकी है? रघुराम राजन सरीखे धूर्तों और मोदी विरोधी मूर्खों की फौज का हंगामा और हुड़दंग तो देश को यही समझाने का प्रयास कर रहा है।

जबकि उपरोक्त आंकड़े यह बताते हैं कि किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था में कर्ज़ की भूमिका क्या होती है।

यहां विशेष रूप से उल्लेखनीय यह भी है कि भारत में GDP के सापेक्ष जो कर्ज़ का अनुपात 67.29 प्रतिशत है। वह वर्ष 1996 को छोड़कर, आज़ादी के बाद के 72 वर्षों में सबसे कम है। यह स्थिति 2015-16 से ही लगातार चल रही है।

उपरोक्त के अलावा विदेशी ऋण के मामले में मोदी सरकार के पिछले 5 वर्ष सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुए हैं। यूपीए के शासनकाल की दस वर्षों की समयावधि में देश के क़र्ज़ में औसतन लगभग 33.35 बिलियन डॉलर प्रतिवर्ष की वृद्धि हुई थी।

मार्च 2004 में जो विदेशी कर्ज़ 112.7 बिलियन डॉलर था वो मार्च 2014 में बढ़कर 446.20 बिलियन डॉलर हो गया था। जबकि मोदी सरकार के 5 वर्ष के शासनकाल में यह 14.96 बिलियन प्रतिवर्ष की दर से बढ़ा है। अप्रैल 2019 तक यह 521 बिलियन डॉलर तक पहुंचा है।

अतः रघुराम राजन सरीखे धूर्तों और मोदी विरोधी मूर्खों के हंगामे हुड़दंग से कतई विचलित मत होइए। देश की अर्थव्यवस्था की दिशा और दशा पूरी तरह सही और स्वस्थ हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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