ना खाता, ना बही; जो कहे सोनिया वही सही

रघुराम राजन के भाषण के आधार पर छपे समाचार की हैडलाइन पर मत जाइये। एक तरह से राजन ने काँग्रेसियों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

राजन कहते है कि आज भारत को तीन प्रमुख बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। पहली बाधा एक टूटा हुआ बुनियादी ढांचा है, जिससे विकास प्रभावित हुआ है। दूसरा, बिजली क्षेत्र को स्वस्थ बनाना और यह सुनिश्चित करना कि उन सभी लोगों को बिजली मिले जिन्हे इसकी आवश्यकता है। और तीसरी बड़ी बाधा है बैंकों की सफाई। वह इस बात को गोल कर गए कि उनके समय में बैंको की सफाई क्यों नहीं हो पायी।

भारत में नोटबंदी के दौरान डेढ़ लाख लोगों ने 5 लाख करोड़ रुपये जमा किए; अर्थात भारत की आबादी के 0.00011 प्रतिशत (हर एक लाख व्यक्तियों में कुल 11 लोग या एक तरह से मानिये कि हर दस हज़ार लोगों में एक व्यक्ति) ने कुल डिमोनेटाइज्ड नकद का 33 प्रतिशत यानि कि एक तिहाई नगद जमा कराया।

क्या यह सोचने की बात नहीं है कि कैसे भारत में तथाकथित समाजवाद के समय में 125 करोड़ भारतीय में से डेढ़ लाख लोगों के पास एक तिहाई रुपये नगद निकले?

लेकिन रघुराम राजन इस बात पर चुप हैं कि कैसे डेढ़ लाख लोगो ने इतना कैश जमा कर लिया।

मोटे तौर पर, किसी भी राष्ट्र की जीडीपी का निर्धारण मुद्रा के आदान प्रदान जोड़ कर बनता है। किसी भी देश की जीडीपी में शिक्षा और जुआ में किया जाने वाले खर्च शामिल किया जायेगा, क्योकि जीडीपी के लिए दोनों ही आर्थिक गतिविधियां है।

इसी प्रकार, अपराध से होने वाला खर्च, जैसे कि पुलिस, टूटी खिड़की को ठीक कराना, पहरेदार रखना इत्यादि भी जीडीपी में जुड़ जाएगा। युद्ध के लिए सैनिक, हथियार, लड़ाकू विमान इत्यादि भी देश की ‘समृद्धि’ की तरफ जुड़ जायेंगे। प्रदूषण करने वाली और उसे रोकने वाली गतिविधियां जीडीपी में जुड़ जाएंगी।

इसी प्रकार, कागज़ी कंपनियों के मध्य हुआ मुद्रा का आदान प्रदान भी जीडीपी में जुड़ जाएगा, भले ही वह पैसा एक ही ठग के घर में ही रहा हो।

एक उदहारण लीजिये। आम्रपाली बिल्डर ने फ्लैट खरीदने वालों का 700 करोड़ रुपये 250 कागज़ी कंपनियों में ट्रांसफर करके घोटाला कर दिया। लेकिन यह 700 करोड़ रुपये जीडीपी में दर्ज हुआ होगा और कई वकीलों, अकाउंटेंट और पत्रकारों को उस पैसे के गबन को छुपाने के लिए धन भी मिला होगा; यानी कि रोजगार।

सोनिया गांधी के समय बहुत बड़ी जीडीपी इन्ही कागज़ी कंपनियों की करतूतों का हिस्सा थी। लेकिन, इस वर्ष के अंत तक मोदी सरकार लगभग 5 लाख कागज़ी कंपनियों का पंजीकरण रद्द कर चुकी होगी। अतः हाहाकार मचा हुआ है।

एस गुरुमूर्ति ने आंकड़ों के माध्यम से यह ट्वीट किया है कि कैसे सोनिया सरकार के समय भारत ‘नकली विकास’ के नाम पर आर्थिक विनाश की तरफ जा रहा था, जिसे विमुद्रीकरण के द्वारा रोक दिया गया।

ज़्यादा आंकड़े देकर बोर नहीं करूँगा, लेकिन गुरुमूर्ति लिखते हैं कि सोनिया सरकार के दौरान प्रॉपर्टी के दाम 2100 प्रतिशत तक बढ़ गए थे। इतनी महंगी प्रॉपर्टी कौन खरीदेगा और किसको लाभ होगा?

गुरुमूर्ति आगे लिखते हैं कि 12 लाख करोड़ का काला धन मध्यम और लघु उद्योगों में 24 से 360% ब्याज पर लगा हुआ था। अगर पूँजी ही इतनी महंगी थी, तो हम चीन से आने वाले आयात को कैसे चुनौती देते।

क्या राजन और पत्रकार इस पर प्रकाश डालेंगे?

अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है लाइसेंस-परमिट-कोटा राज

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