पूरा क़बीला दोषी है…

पुलिस अकादमी में पुलिस वालों को अपराध शास्त्र पढ़ाया जाता है… भारत में जब जरायम पेशा जनजातियां हुआ करती थीं तो उन सबकी अपराध करने की एक विशिष्ट शैली हुआ करती थी। अपराध की शैली से ही पुलिस जान जाती थी कि अपराधी या गिरोह किस जाति या जनजाति का है…

बहुत पहले 90 के दशक में दिल्ली की अशोक विहार कॉलोनी के एक घर मे ऐसा ही एक जनजातीय गिरोह घुसा। उस गिरोह की ये विशिष्ट शैली है कि वो घर मे घुसते ही सबसे पहले सोते हुए सभी लोगों की हत्या करते हैं। फिर उस घर की रसोई से निकाल के कुछ खाते हैं, और उसके बाद लूटपाट करते हैं।

Victims के घर खाना खाना, ये उनका एक धार्मिक टोटका होता है… अशोक विहार के उस घर मे भी उस गिरोह ने उस रात 6 लोगों की हत्या की… फिर अचार के साथ Bread खाई… उन्हें पूरे घर से कुल जमा 500 रूपए मिले थे… दिल्ली के अखबारों में ये हृदय विदारक घटना बहुत दिनों तक छाई रही…

इसी तरह एक फेसबुकिए ने एक बार एक पोस्ट लिखी थी… कस्बे के पास एक व्यक्ति की लाश मिली… उस लाश को देख के एक सयाने आदमी ने कहा, ये सामान्य हत्या नहीं है… ये तो आsमानी किtaab पढ़ने वाले ने jiबह किया है… कोई Hinदू ऐसे क़त्ल कर ही नही सकता…

जी हां… जैसे जरायमपेशा जनजातियों की विशिष्ट शैली होती है Crime की, वैसे ही ज़रायम पेशा मzहबों और मzहबी गिरोहों की भी एक विशिष्ट शैली है जो उनके मzहब और उनकी Hoली बुks से derive होती है…

आsमानी मzहb ने अपने पूरे गिरोह को एकदम बचपन से ही गला रेतने की ट्रेनिंग देने का system बनाया है… रेतीले देशों के किंडरगार्टन स्कूलों की वो वीडियो याद है न, जहां 3 और 4 साल के बच्चे अपने स्कूल में मेमने के पुतले का गला रेत रहे हैं, उनकी माताएं घेरा बना के खड़ी हैं और ताली बजा रही हैं, और उस मेमने के पुतले से बाकायदे लाल रंग का एक द्रव्य निकल के ज़मीन पे फैल जाता है… जिससे बच्चा आगे चल के जब किसी ज़िंदा व्यक्ति या जीव का गला रेते तो खून देख के उसे घबराहट न हो… ऐसी तैयारी है आसmaani गिरोh की…

इस गिरोह को ये भी सिखाया जाता है कि अपनी बेहद प्रिय वस्तु/ जीव/ प्राणी का भी गला रेतते हुए मन मे कमज़ोरी नही आनी चाहिए… किसी किस्म का दया ममता का भाव उपजना नहीं चाहिए… इसकी ट्रेनिंग कैसे दी जाती है, जानते हैं?

हर घर में एक बकरा पाल लिया जाता है… उसे साल-दो साल एकदम अपने बच्चे की माफ़िक़ पालते हैं… खूब कायदे से घी दूध फल बादाम तक खिलाते हैं… उससे इतनी मुहब्बत हो जाती है जैसे एकदम घर का सदस्य हो… और फिर एक दिन उसे अपने ही हाथ से रेत देते हैं…

आपको शायद वो वीडियो भी याद होगा जिसमें वो बच्चा अपने प्रिय बकरे को क़ुरबानी के छुरे से बचाने का अंतिम प्रयास करता है, अपनी सामर्थ्य भर… दरअसल वो ऐसा इसलिए कर रहा था कि तब तक mazहब उसमें घुसा नहीं था… जिस दिन घुस गया, दया ममता के ये मानवीय मूल्य अंदर से निकल जाएंगे, खत्म हो जाएंगे।

अलीगढ़ में 3 साल की मासूम बच्ची अंतिम पलों में रोई तो होगी ही… उसकी उन मासूम निगाहों में मौत की दहशत आयी तो होगी ही… उसकी रोती बिलखती उन आंखों से आंसू तो टपके ही होंगे… उन आंसुओं को देख के उस well trained मzहबी हत्यारे के हाथ नही कांपे…

लोग कहते हैं कि एक क्राइम के लिए पूरे मzहब, पूरी क़ौम को दोषी न ठहराया जाए…

क्यों न ठहराएं?

पूरा क़बीला दोषी है…

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