तीन लघुकथाएं

टिकट

रमा के मोबाइल पर दो-तीन बार रिंग आ चुकी थी। पर वो सुन नहीं पायी। रात के खाने से निवृत्त होकर जब आराम से बैठी तो मोबाइल में कई मिस कॉल। खोलकर देखा तो अनिल का था।

रमा ने तुरंत अनिल को फोन लगाया–“हेलो बेटा! तुमने फोन किया था?”

अनिल–“हाँ माँ पूछ रहा था कि दीपावली पर आपलोग मुम्बई आ रहे हैं या नहीं?”

“तुम लोग ही यहाँ आ जाते तो अच्छा रहता।”

“माँ! हम क्या कर सकते हैं। बताया तो था कहीं भी रिज़र्वेशन नहीं मिल पाया। फ्लाईट की वहां सुविधा है नहीं। मैं भी क्या करूँ?”

रमा सोचने लगी हाँ बेटा याद है कहा था कि ‘स्लीपर क्लास में केवल सीट खाली है बहू और बच्चों को परेशानी होगी।’

फिर मैंने कहा था कि ‘यहाँ से भी तो यही हाल होगा बेटा तो हमलोग भी कैसे आ पाएंगे बोल?’ तो तुमने कहा कि ‘क्या माँ आप भी? आप और बाबूजी तो पहले स्लीपर क्लास से ही सफर किया करते थे?’ मुझे याद है बेटा। सच में तुम्हें काबिल बनाने के लिए हमने तो इधर ध्यान ही नहीं दिया।

तभी राजेंद्र जी जो टिकट बुक कर करा रहे थे उन्होंने कहा–“रमा! टिकट बुक हो गया।”

अनिल–“हेलो माँ क्या हुआ? आप कुछ बोल नहीं रही हैं?”

रमा–“अरे नहीं, वो तेरे बाबूजी कुछ कह रहे थे, वही सुनने लगी।”

“अच्छा।”

“खैर कोई बात नहीं बेटा। तेरे बाबूजी ने दीपावली के दो दिन के बाद सिंगापुर का टिकट बुक कराया है। वहां से वापसी में मुम्बई होते हुए आऊंगी।”

  • पूनम झा

इच्छापूर्ति

माँ ओ माँ ..!”

“क्या हे रे? सोता क्यों नहीं है?”

“माँ! भूख लगी है, तू बोली थी, आज ले आएगी खाना कहीं से….।”

“हाँ! बोली थी, पर ….।”

बेटा रोते हुए बोला, “ पूरे तीन दिन हो गए हैं, वो अपुन के पड़ोस में देख, सब खाना खा रहे, सबकी माँ लेकर आतीच है, एक तू ही है…।

“हाँ रे! तू सच बोला, मई ही बुरी हूँ न, तेरी दुश्मन जो ठहरी… एक तो गरीबी और ऊपर से भूख, साला भगवान भी तो हम गरीबों को ही परेशान करता है।”

बेटे का पिचका पेट, जिसपर वह हाथ फिरा रहा था, माँ का कलेजा निकलने को था।

ऐसे में बेटे ने फिर एक प्रश्न दाग दिया, “ माँ! यह सांता-क्लॉज़ कौन होता है? वो पड़ोस वाली आंटी बोल रही थी, कल क्रिसमिस है…”

“क्या क्रिसमिस? अरे तू भी बांवरा है, यह तो बड़े लोगों की बातें है, और यह सांता-क्लॉज़… !”

झुग्गी के बाहर देखा तो आस-पास के फ्लाटों में रौशनी हो रही थी, लोगों ने लाइट से अपने घरों को सज़ा रखा था।

“ माँ ! तूने बताया नहीं, बता न कौन है संता-क्लॉज़ ?”

“वो… बेटे यह एक संत है जो बड़े घरों में क्रिसमिस के एक रात पहले लाल रंग के कपड़े कर आता है और सुना है वो अपने पीठ पर बड़ा सा बैग टाँगे आता है, जिसमें से वह लोगों को कोई न कोई भेंट देताच है…।”

“अच्छा! तो क्या अपुन के घर भी वह आएगा…?”

“फालतू बात करता है, सोता क्यों नहीं…?”

“माँ ! सुन न, आज अपुन लोग भी जागते है, क्या पता वो अपनी खोली में आ जाये…।”

“अरे! तू सोयेगा तभीच आएगा, सो जा…।”

बेटा अपनी माँ के छाती से लग गया… वह बेटे को दुलार करने लगी, और ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी… काश! इस बार सांता क्लॉज़ को मुझ गरीब की खोली दिख जाए, और वह कुछ खाने को दे दे। उसकी आँखों से अश्रु बह रहे थे।

तभी खोली के बाहर से आवाज़ आई, “आओ रे ! सब बाहर आओ, कोई सेठ साहब आये हैं, अपने साथ बहुत सारा खाना लेकर….।”

बेटा अपनी माँ की गोद से झट से उतर गया, “ तू झूठ बोली माँ, देख संता-क्लॉज़ आ गया…। और वह आवाज़ की ओर दौड़ गया।

  • कल्पना भट्ट

लौट आओ पापा

शाम के 6 बज गये थे, हेमा के पापा रोज़ इस वक़्त तक घर आ जाते थे, आज नहीं आये थे। हेमा छोटी थी समय का ज्ञान तो था नहीं, वह अपने घर के गलियारे में एक टेबिल पर खड़ी होकर वहाँ लगी हुई जाली से बाहर देखने लगी। थोड़ी देर तक वह वहाँ ऐसे ही खड़ी हो गयी, रात हो रही थी, उसके पापा न आये, हेमा रोने लगी।
उसकी माँ रसोई घर से हेमा के पास आयीं और बोली,” तुम्हारे डैडी नही आयेंगे…” वह क्रोधित होकर दुबारा अंदर चली गयीं।
हेमा रोती रही… रात को उसकी माँ ने प्रयास कर उसको खाना खिलाकर सोने के लिए कमरे में ले गयी।
रोते रोते वह सो गयी। सुबह उठी तब उसने घर में चारों तरफ देखा, उसके पापा कहीं नहीं दिखाई दिए।
कुछ दिनों बाद उसके पापा घर लौट आये। हेमा उनसे चिपट गयी। कुछ समय खुशहाली रही, फिर वही हुआ जो हेमा को दुखी करता था।
ऐसे वातावरण में वह कब बड़ी हो गयी पता ही न चला। जब बड़ी हुई तब उसकी समझ में आया कि उसके मम्मी और पापा के बीच जब भी लड़ाई होती, उसके डैडी घर छोड़ कर चले जाते।
हेमा ने बहुत समझाना चाहा, पर उसके डैडी ने उसकी बात कभी न मानी। इस बात ने हेमा को तोड़ दिया था, पर धीरे धीरे वह इस सब की आदि हो गयी थी।
आगे यह हुआ कि उसके डैडी को लकवा हो गया, और उसके बाद वह उसकी मम्मी के साथ ही रहे, मम्मी ने खूब सेवा करी, 25 साल की बीमारी के बाद हेमा के डैडी ने फिर घर छोड़ दिया…
अब की जो वह गए तो कभी न लौटेंगे कहकर वह उस घर चले गए जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता।
हेमा तो आज भी वहीं खड़ी है….
लौट आओ पापा,
हेमा अब रो न पा रही थी….

  • कल्पना भट्ट

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