कर्ण की ‘घोषयात्रा’

अङ्गराज कर्ण की अखिल आर्यावर्त दिग्विजय यात्रा को महाभारत ने “घोषयात्रा” पुकारा है। इस यात्रा की योजना उन्होंने स्वयम् को सिद्ध करने हेतु की थी।

ये घटना तब की है, जब द्यूत में पराजित पाण्डव वनवास में थे। और उन्हें वन में नीचा दिखाने के लिए दुर्योधन ने वनयात्रा की। किन्तु हुआ कुछ यों कि कर्ण सहित तमाम योद्धाओं से सुसज्जित दुर्योधन के बेड़े को गन्धर्वों ने पराजित कर बन्दी बना लिया।

अन्ततः उन्हें पाण्डवों की सहायता लेनी पड़ी!

इस एक घटना से समूचे हस्तिनापुर में कर्ण की छवि धूमिल हो गयी। सभी को प्रतीत हो गया कि कर्ण भी पाण्डवों से दुर्योधन का रक्षण न कर सकेंगे!

बहरहाल, कर्ण ने गन्धर्वों के विरुद्ध हुई पराजय का कारण सहसा निर्मित हुए युद्ध को माना। उनका मानना था कि यदि युद्ध के विषय में उन्हें पूर्व से ज्ञात होता तो वे अवश्य विजयी होते।

अब वे अपनी छवि सुधारने हेतु दिग्विजय करना चाहते थे। विजयघोष के उद्देश्य से की गयी यात्रा को “घोषयात्रा” का नाम मिला!

इस यात्रा के साथ ही समूचे आर्यावर्त में कर्ण के शौर्य की घोषित विजय हुई। “घोषयात्रा” का सूरते हाल कुछ यों है कि कर्ण ने हस्तिनापुर से कूच करते ही “पाञ्चाल” को घेर लिया। कदाचित् वे द्रौपदी स्वयम्वर में हुए अपने अपमान से अब तक क्षुब्ध थे!

उन्होंने रणभूमि में “द्रुपद” को अधीनस्थ राजाओं सहित जीत कर, रङ्गभूमि में हुए अपमान का प्रतिशोध लिया। और अगणित स्वर्ण मुद्राओं का कर लेकर अपने अभियान पर चले गए।

तत्पश्चात्, वे “अहिक्षेत्र” की ओर चले। वर्तमान में इसे “बरेली” कहा जाता है। “अहिक्षेत्र” को उन्होंने सहायक राज्य “आवशीर” और “योध्य” सहित परास्त किया।

यहाँ के पश्चात् वे नवद्वारा “अयोध्या” पहुंचे। वहां उनके सभी सैनिकों ने तलवारों को म्यान में और ढालों को पीछे कर लिया। प्रभु “श्रीराम” के भव्य जन्मस्थान पर वन्दन करने के उपरान्त वे “वत्सभूमि” को विजित् करने की इच्छा से प्रवास करने लगे!

“वत्सभूमि” यानी कि “प्रयाग” और “मिर्जापुर” का समूचा क्षेत्र, जिसकी राजधानी “कौशाम्बी” थी। “वत्सदेश” को जीत कर, वे सेनासहित “काशी” पहुंचे। यहाँ की राजकुमारी भानुमति का विवाह दुर्योधन से हुआ था। अतः कर्ण का स्वागत जमाता की भांति किया गया।

एक दिग्विजयी जमाता की भांति!

अङ्गराज ने “काशी” का आतिथ्य प्राप्त करने के उपरान्त, उस समूचे स्थान को जीत लिया जिसे आजकल “बिहार” नाम से जाना जाता है। इसमें “मगध”, “मिथिला” और “केवला” आते हैं। “केवला” का वर्तमान नाम “गया” है।

यहाँ से विजयी होकर, वे “शुण्डिक” राज्य में पहुंचे। गणपति को अपने कबीले का आराध्यदेव मान कर उनकी “शुण्ड” की भांति मुखौटे लगाने वाली जाति को “शुण्डिक” अथवा “शौण्डिक” कहा गया है। वर्तमान भारत के “शौण्डिक” सङ्घ का मानना है कि ये जाति जंगलों में सुरा निर्माण और उसका क्रय किया करती थी।

इस प्रकार और भी तमाम छोटे छोटे राज्यों को जीतकर, उन्होंने अपनी पूर्वगामी गति को सहसा उत्तरगामी कर लिया। और नेपाल जा पहुंचे!

नेपाल के “विष्णुवंशी” राजवंश को पराजित कर, पर्वतीय मार्ग से ही “प्राग्ज्योतिषपुर” पहुंचे, यानी कि वर्तमान “असम”। इसप्रकार वे पुनः पूर्वगामी हुए।

यहाँ उन्होंने राजा “भगदत्त” को पराजित किया। साथ ही, समूचे पूर्वी आर्यवर्त को जीत कर, वे “वङ्गभूमि” में प्रविष्ट हुए। वर्तमान में इसे “बङ्गाल” और “बाङ्ग्लादेश” कहा जाता है।

“वङ्ग” को जीतकर उनके पास दो मार्ग थे। अव्वल तो ये कि समुद्र के तटवर्ती राज्यों को जीतने की इच्छा से “कलिङ्ग” यानी कि वर्तमान “उड़ीसा” पर आक्रमण किया जाए। अथवा मध्य आर्यवर्त के लिए नर्मदा की ओर मुड़ा जाए।

निर्णय नर्मदा के पक्ष में हुआ। कूच किया तो “कोसला” राज्य में आ पहुंचे। स्मरण रहे, ये राज्य “कोसल” (अयोध्या) नहीं। बल्कि “कोसला” है। वर्तमान में इसका कुछ भाग “बंगाल” के पास है, कुछ “उड़ीसा” के अधिकार में।

तत्कालीन “कोसला” के भाग रहे स्थानों के वर्तमान जनपदीय नाम हैं : “बारगढ़”, “बोलिङ्गर”, “बौध”, “देवगढ़”, “झरसुगुडा”, “कालाहाण्डी”, “कोरापुट”, “नुआपाण्डा”, “सम्बलपुर”, “सुवर्णपुर” और “सुन्दरगढ़”।

नर्मदा के तटवर्ती राज्यों तक पहुँचने हेतु हो रहे इस अभियान में दूसरा पराजित राज्य “कर्कखण्ड” बना। “कर्क” रेखा को धारण करने के कारण, इसे ये नाम मिला। वर्तमान में इसे “झारखण्ड” कहा जाता है।

और अन्ततः अभियान जबलपुर आ पहुंचा। नर्मदा का भव्य “भेड़ाघाट”। तत्कालीन आर्यवर्त में “जबलपुर” को “त्रिपुरी” उचारा गया है। “त्रिपुरी” की सीमाएं, दिवङ्गत शिशुपाल के “चेदिराज्य” को छूती थीं।

“त्रिपुरी” को जीतकर कर्ण ने अपनी सेनासहित “यू-टर्न” ले लिया। वे “कलिङ्ग” जा पहुंचे। वे न केवल महाबली योद्धा थे, बल्कि श्रेष्ठ रणनीतिकार भी थे।

वे जानते थे कि उनके इस अभियान की भनक समूचे आर्यवर्त में लग चुकी है। “चेदिराज्य” समूचे मालवा के साथ संधि कर रहा है। अतः वे “विदर्भ”, यानी कि वर्तमान महाराष्ट्र और गुजरात के कुछ भाग, को “फ्री-हैण्ड” नहीं छोड़ना चाहते थे।

उनकी योजना थी कि वे पूर्वीतट के “कलिङ्ग”, “विशाखापत्तनम्” को जीतकर “श्रीशैल” में प्रवेश करेंगे। यही हुआ भी! उन्होंने सफलतापूर्वक “श्रीशैल” यानी कि आन्ध्रप्रदेश तक को अपने अधिकार में कर लिया।

अब दक्षिण में कुल एक चुनौती और शेष थी!

वह था, महान शक्तिशाली “पाण्ड्यदेश”। “पाण्ड्यदेश” की महिमा कुछ यों है कि क्या रामायण काल, क्या महाभारत काल और क्या सम्राट अशोक का काल, तीनों ही के इतिहास में “पाण्ड्यदेश” का उल्लेख मिलता है।

“मैगस्थनीज” ने भारत के राज्य “माबर” का उल्लेख किया है। वास्तव में यह “पाण्ड्यदेश” ही है। “मैगस्थनीज” के समय वहां के राजा “हृद्रक्त” (हृद्-रक्त) थे। जिन्हें उसने “हेराक्ट” लिखा है!

ऐसे महान वैभवशाली राज्य को जीतकर “कर्ण” ने श्वेत मोतियों के रूप में अतुल धनराशि अर्जित की। “पाण्ड्यदेश” की पराजय के समाचार ने समूचे दक्षिण में युद्ध की आवश्यकता को ही समाप्त कर दिया।

अब यहाँ से अङ्गराज ने “विदर्भ” का रुख किया। तत्कालीन शासक “रुक्मी” थे। कर्ण ने उन्हें पराजित किया, और अपने साथ लेकर “मालवा” पर आक्रमण किया।

“चेदिदेश” के धृष्टकेतु, शिशुपाल के पुत्र, ने मालवा-नरेश “नील” और अवन्तिका (उज्जैन) को भी बुला भेजा।

युद्ध का क्षेत्र बना “पर्णशा” नदी का तट। ये युद्ध मालवा के ही एक राज्य “मृत्तिकावती” के आङ्गन में हो रहा था। किन्तु कर्ण के सम्मुख समूचे “मालवा” की एक न चली।

मालवा के नाम पर किया गया गठबन्धन पराजित हुआ!

अब कर्ण ने अपना ध्यान “सौराष्ट्र” की ओर किया। वहां द्वारकाधीश कृष्ण ने “वेणुदारि” नामक एक यादव को सामन्त बना कर राज्य का स्वतन्त्र प्रभार दे दिया था। कर्ण ने उस राज्य को सेनासहित जीत लिया।

तत्पश्चात्, वे द्वारका पहुंचे। श्रीकृष्ण ने उनका स्वागत अर्जुन की ही भांति अपने मित्र जैसा किया।

यहाँ से यादवों की नारायणी सेना को प्राप्त कर, कर्ण ने द्वारका से लेकर गान्धार तक “यवन” और “शशक” राज्यों को रौंद दिया।

वहां से लौटकर वे पुनः पूर्वगामी हुए। हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में उनकी छिटपुट लड़ाइयां “म्लेच्छ”, “वनवासी”, “भद्र”, “रोहितक”, “आग्रेय” जैसी कबीलाई जातियों से भी हुईं। हालाँकि समूचे आर्यवर्त को विजित् करने वाले योद्धा के लिए कबीलों से युद्ध करना कोई विशेष प्रतिष्ठा का कार्य न था।

किन्तु प्राणरक्षा हेतु क्षत्रियोचित् व्यवहार भी हुए!

“गान्धार” के “पुरुषपुर”, वर्तमान पेशावर, से वे काश्मीर होकर पुनः हस्तिनापुर लौट आए। ये यात्रा “घोषयात्रा” कहलाती है। इस यात्रा ने कर्ण को चार-चार दिग्विजयों का यश दिया। यानी कि चार दिशाओं की विजय।

ये थी, शौर्य का विजय घोष करने वाली, “घोषयात्रा”!

इति नमस्कारान्ते।

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