हिन्दी साहित्य में लघुकथा की वृहद भूमिका

हिन्दी साहित्य में कथा कहने की परम्परा आदिकाल से ही किसी न किसी रूप में रही है। विश्व के प्राचीनतम उपलब्ध ग्रन्थ ऋग्वेद में यम-यमी, पुरुरवा-उर्वशी आदि संवादात्मक आख्यानों में कथा के होने की पुष्टि होती है। इससे आगे विविध ब्राह्मण ग्रन्थों, उपनिषदों, महाकाव्यों, पुराणों, जैन, बौद्ध साहित्य में भी कथाओं का भण्डार मिलता है।

यह अलग बात है कि कथा का आकर और रूप बदलता रहा है सबसे पहले नीति कथाओं से शुरू हुई, समय बदला और कथा में उपदेश दिखने लगे, बौद्ध कथाओं में भगवान बुद्ध ने लोगों को उपदेश देने के लिए छोटी -छोटी कथाओं का सहारा लिया और उनके नाम से इन कथाओं को बोध- कथा कहा गया। संस्कॄत में रचित पंचतन्त्र और हितोपदेश ने भी विश्व में ख्याति पायी, और इनका अनुवाद दूसरी भाषाओं में भी हुआ।

यह कहना कहीं से भी गलत न होगा कि विश्व के कथा साहित्य में हमारे कथा साहित्य ने यथोचित योगदान दिया है।

साहित्य के विभिन्न विधाओं में समयानुसार परिवर्तन देखा जा सकता है, विधा की भाषा शिल्प, व्याकरण और उसके आकार में परिवर्तन होता रहा हैं।

साहित्य रचना का उद्देश्य एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से जोड़ना होता है, और समाज को समाज से परिचय करवाना होता है। हर काल में ऐसा ही होता रहा है और भविष्य में ऐसा ही होता रहेगा। ऐसा ही कुछ हम प्रेमचन्द के काल में देख सकते हैं, उनकी कहानी और कथाओं में आम आदमी की पीड़ा के साथ साथ उपदेशात्मक वर्णन सहज देखा जा सकता है।

इस दौरान लघुकथा को लघुकथा की पहचान नहीं मिली थी। आगे के दशकों में जब अध्ययन हुआ और शोधकार्य हुआ तब यह पाया गया कि कुछ कथाओं का आकार और उनका शिल्प और शैली लघुकथा से मिलती -झूलती थी. सो इनमें से कुछ को लघुकथा मान लिया गया।

लघुकथा को अब तक भी साहित्य की विधा पूर्ण रूप से नहीं माना गया था। इतना भर था, कि उपन्यास, कहानी से अलग इसका अपना एक शिल्प था। इसकी लघुता और सूक्ष्मता के साथ इसमें पैनापन था। कथा के अंत में चौंक होता था, कथा को पढ़ने के बाद अंत पढ़कर पाठक चौंक जाता था। लघुकथा की अंतिम पंक्ति चौंक पंक्ति कहा जाता था।

धीरे-धीरे लघुकथा में गम्भीरता आयी और अब समाज से जुड़ी विसंगतियों को लिखा जाने लगा। सातवें दशक में जब जे.पी आंदोलन और इमरजेंसी आई तब जो लघुकथाएँ लिखी गयी उसका आकार अधिकतम आठ या दस पंक्तियों में होता था। इसका अंत व्यंग्य से होता था।

इस दौरान लघुकथा क्योंकि छोटी हुआ करती थी इसको लिखने वालों की संख्या बढ़ गयी और व्यंग्य की मात्रा भी बढ़ गयी और इस अधिकता की वजह से लोगों को लघुकथाएँ उबाऊ लगने लगी। और यह तय किया गया कि लघुकथा में व्यंग्य हो सकता है पर हर वयंग्य को लघुकथा नहीं माना जा सकता।

इमरजेंसी के बाद आठवें और नवें दशक में लघुकथा में विषय आये जिसके अंतर्गत अलग-अलग विषयों पर लिखा जाने लगा और साथ ही पुलिसिया और राजीनीति भ्रष्टाचार पर जम कर लिखा जाने लगा।

पर कहा जाता है न कि कुछ भी स्थायी नहीं रहता और न कभी रह सकता है, हर चीज में बदलाव आता है, साहित्य भी अछूता न रहा, साहित्य की हर विधा में निरंतर बदलाव आता रहा और लघुकथा जो पहले गद्य की उपविधा मानी जाती थी अब तक उसको मुख्य विद्या की मान्यता प्राप्त हो चुकी थी।

लघुकथा के इतिहास में संघर्ष हर काल में देखा जा सकता है। आगे जाकर यह विधा ज़मीन से जुड़ती नज़र आयी और जनमानस के आस-पास घटित हो रही घटनाओं को लिखा जाने लगा, दौर बदलता गया, लघुकथा का शिल्प भी बदलता गया, किसान की समस्या हो या नारी सशक्ति करण, बाज़ार वाद हो यो विश्व की कोई भी समस्या हो या विश्व बाज़ार की बात हो या अंतरिक्ष की, वर्तमान में लघुकथा के लिए विषय नीले अम्बर की तरह विशाल और गहरे हो गए है।

ऐसा नहीं है कि पुराने विषयों पर नहीं लिखा जा रहा पर पुराने विषयों को भी नये कलेवर का चोला पहनाया जा रहा है और वर्तमान काल के इस भौतिक समाज में जब संवेदना दम तोड़ती नज़र आती है, इस आपाधापी वाले जीवन में लोगों के पास समय का अभाव है। लम्बा साहित्य पढ़ने के लिए समय नहीं और न रूचि ही होती है, लघुकथा अपने आकार और शिल्प की वजह से प्रचलित होती जा रही है।

स्थूल से सूक्ष्म तक की यात्रा और गागर में सागर को समेटे हुए यह विधा अपने कदम आगे बढ़ा रही है। पर आज भी इसके सामने एक चुनौती है कि भौतिक-वादी समाज को आईना किस तरह से दिखाया जाये? इसके लिए लघुकथा में मनोविश्लेषण को जोड़ा गया है और कथा तत्व में मनोवैज्ञानिक तरीके से समाज में घटित हो रही घटनाओं में से अपनी माइक्रोस्कोपिक दृष्टिकोण से किसी एक विसंगति को चुनकर उसके इर्दगिर्द एक कथानक को उपयुक्त शिल्प देकर सजाया जा रहा है।

वर्तमान में लघुकथा पाठकों को अपनी और आकर्षित करने में सफल हो रही है और अपनी जड़ों को और मज़बूत कर रही है।

वर्तमान में लघुकथा के लिए विषयों की कमी नहीं है, और आज के इस नैनो टेक्नोलॉजी ने अपने पंख फैलाये है और हमारे जीवन को आसान कर दिया है। आदमी का मन साहित्य की ओर खींचता ही है, क्योंकि साहित्य का लक्ष्य आनंद वितरण करना होता है।

ऐसा नहीं है कि आज उपन्यास या कहानियों को नहीं पढ़ा जा रहा पर लघुकथा ने लोगों को निश्चित ही अपनी ओर आकर्षित किया है। पड़ाव और पड़ताल में रमेश खत्री जी ने एक जगह लिखा है: लघुकथाओं में जहाँ एक ओर करुण, श्रृंगार और शाँत रसों का समावेश होता है वहीं दूसरी ओर मानव के मन की सम्पूर्ण मनोभूमि को तलाशने की कोशिश की जाती है।

यही वजह है कि लघुकथा में इंसान खुद को देख पाता है और वह अपनी सी प्रतीत होती है। निश्चित तौर पर इसमें समाहित जीवन का रस कथा के सभी सोपान को छूते हुए सहृदयता, सामाजिकता का बाना तैयार करता है और मानव मन में व्याप्त साधारिकरण को सहजता से उजागर करने में कामयाब होता है। यही लघुकथा का कौशल भी है और इसकी ताकत भी।

लघुकथा का आकार देखकर कुछ लोग इसे साहित्य जगत में प्रवेश करने का शॉर्ट कट मान रहे हैं, जब कि यह सोच ही गलत है। लघुकथा एक गम्भीर विधा है और इस बात को सिद्ध करने के लिए मैं अपना वक्तव्य आदरणीय डॉ सतीश राज पुष्करणा जी के कथन से करना चाहूंगी, पड़ाव पड़ताल के एक अंक में आपने लिखा है: लघुकथा न रिपोर्टिंग है, न वक्तव्य है, न गद्यगीत है और न ही दृश्यग्राफी है, बल्कि गद्य-साहित्य में कथा-विधा की ऐसी कलापूर्ण तथा पैनापन लिये सशक्त लघुआकारिय विधा है, जो विश्वसनीय कथ्य, सटीक भाषा-शैली, जीवन्त संघर्ष, रञ्जन, संप्रेषणीय प्रस्तुति, हृदयस्पर्शी चरमबिंदु के अतिरिक्त तमाम कथा तत्त्वों को वर्तमान की ज़मीन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में समाहित किये एक यथार्थवादी/ यथार्थवादी- सी रचना में पाठकों के समक्ष उपदेश नहीं, बल्कि कोई-न-कोई मानोवोत्थानिक सन्देश लिए आती है।

यही लघुकथा की उपयोगिता है और प्रासंगिकता है।

– कल्पना भट्ट

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