माँ की रसोई से : लाल भाजी के लाभ और बनाने की विधि

सर्दियों का मौसम और सब्ज़ियों की बहार, गर्मियों के बाद बारिश में सब्ज़ियों की कमी से त्रस्त मन जब सर्दियों में हरी सब्जियों को देखता है तो उसकी स्वाद कलिकाओं के साथ पेट में दौड़ते चूहे भी एकदम से क्रियाशील हो जाते हैं. और यह मौसम होता भी है पूरे साल की ऊर्जा ग्रहण करने का, चाहे खाने पीने की बात हो, चाहे सूर्य ऊर्जा की.
इस मौसम में आप शरीर को ध्यान में रखते हुए जितनी ऊर्जा साल भर के लिए इकट्ठी करना चाहते हैं, कर लीजिये. तो हम बात कर रहे थे सब्जियों की, गोभी, पत्ता गोभी, फलियाँ, भटा और हरी भाजियां.. मेथी, पालक सुवा, चौलाई और चौलाई की ही एक प्रजाती लाल भाजी, जिसे नोरपा भी कहते हैं…

मेथी तो फिर भी हम सुखाकर साल भर उपयोग कर सकते हैं, लेकिन कुछ भाजियां मौसम में खा लेनी चाहिए. लाल भाजी यूं तो बारिश के मौसम से ही आना शुरू हो जाती है, परन्तु सर्दियों में इसके स्वाद और पौष्टिकता की बात ही अलग है.
विटामिन और लोह तत्व से भरपूर लाल भाजी खाइए और रक्त की कमी को दूर करिए.

यूं तो जितनी भी भाजियां हैं उन्हें ऐसे ही कच्चा खाना सबसे अधिक लाभदायक है परन्तु फिर भी आप सब्ज़ी बनाकर खाना कहते हैं तो रेसिपी भी तैयार है.

यूं तो लहसुन, अदरक और प्याज साल भर औषधि की तरह ही खाना चाहिए परन्तु सर्दियों में लहसुन और अदरक खाना लाभदायक होता है इसलिए दो कटी प्याज के साथ लहसुन, अदरक और हरी मिर्च का पेस्ट बनाकर या यूं ही बारीक काटकर सरसों के तेल में छौंक लगाइए, लाल भाजी को अच्छे से धोकर काटकर उसमें डाल दीजिये, नमक डालकर भाजी का पानी सूख जाने तक पकाइए और गरमा गरम रोटी या चावल के साथ खाइए.. स्वाद और पोषण दोनों का एक साथ लाभ उठाइये.
यूं तो इस भाजी के लाल रंग को देखकर ही समझ आता है कि यह लोह तत्व यानि आयरन की कमी को पूरा करती है, फिर भी विकिपीडिया पर इसके कुछ लाभ और जानने को मिले उसे भी पढ़ लीजिये.

यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि आपकी चेतना का स्वभाव आपके भोजन के प्रकार पर निर्भर होता हो, आप जितना सादा, कच्चा और पौष्टिक भोजन करेंगे आपकी चेतना उतनी अधिक स्वस्थ और ऊर्जापूर्ण रहेगी, बीच में देह को तो लाभ होता ही है. तो आइये जानते हैं लाल भाजी के लाभ..

लाल भाजी यानी चौलाई का सेवन भाजी व साग (लाल साग) के रूप में किया जाता है जो विटामिन सी से भरपूर होता है. इसमें अनेकों औषधीय गुण होते हैं, इसलिए आयुर्वेद में चौलाई को अनेक रोगों में उपयोगी बताया गया है. सबसे बड़ा गुण सभी प्रकार के विषों का निवारण करना है, इसलिए इसे विषदन भी कहा जाता है. इसमें सोना धातु पाया जाता है जो किसी और साग-सब्जियों में नहीं पाया जाता. औषधि के रूप में चौलाई के पंचाग यानि पांचों अंग- जड, डंठल, पत्ते, फल, फूल काम में लाए जाते हैं.

इसकी डंडियों, पत्तियों में प्रोटीन, खनिज, विटामिन ए, सी प्रचुर मात्रा में मिलते है. लाल साग यानि चौलाई का साग एनीमिया में बहुत लाभदायक होता है. चौलाई पेट के रोगों के लिए भी गुणकारी होती है क्योंकि इसमें रेशे, क्षार द्रव्य होते हैं जो आंतों में चिपके हुए मल को निकालकर उसे बाहर धकेलने में मदद करते हैं जिससे पेट साफ होता है, कब्ज दूर होता है, पाचन संस्थान को शक्ति मिलती है. छोटे बच्चों के कब्ज़ में चौलाई का औषधि रूप में दो-तीन चम्मच रस लाभदायक होता है. प्रसव के बाद दूध पिलाने वाली माताओं के लिए भी यह उपयोगी होता है. यदि दूध की कमी हो तो भी चौलाई के साग का सेवन लाभदायक होता है. इसकी जड़ को पीसकर चावल के माड़ (पसावन) में डालकर, शहद मिलाकर पीने से श्वेत प्रदर रोग ठीक होता है. जिन स्त्रियों को बार-बार गर्भपात होता है, उनके लिए चौलाई साग का सेवन लाभकारी है.

अनेक प्रकार के विष जैसे चूहे, बिच्छू, संखिया, आदि का विष चढ गया हो तो चौलाई का रस या जड़ के क्वाथ में काली मिर्च डालकर पीने से विष दूर हो जाता है. चौलाई का नित्य सेवन करने से अनेक विकार दूर होते हैं.

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