इक बूंद हूं मुझे ऐसी फितरत दे मेरे मालिक, कोई प्यासा दिखे तो दरिया हो जाऊं

9 अक्टूबर को सुबह जैसे ही गेट खोल घर से बाहर निकला वैसे ही स्कूल जा रहे बच्चों में से एक ने सूचना दी अंकल जिस काली वाली डाग ने बच्चे दिए थे वह रेलवे लाइन के किनारे ट्रेन से कटी हुई पड़ी है। इतना सुनते ही मैं तेजी से रेलवे ट्रैक की ओर चला। वहां पहुंच कर देखा कि पटरी के पास पड़े पत्थरों पर वह फीमेल डाग पड़ी कराह रही है उसके तीन पैर कट गए जिनसे खून बह रहा है। मुझे पास खड़ा देख थोड़ी उसकी हिम्मत बढ़ी और किसी तरह सरक कर वह उन पत्थरों से नीचे उतर आई। उसके लिए एक बर्तन में पानी रखा पर उसने नहीं पिया।

नीचे आते ही उसके घाव को धोया व ब्लीडिंग रोकने की दवा डाली। दस पंद्रह मिनट बाद ही खून बहना तो रुक गया पर भीषण दर्द उसके चेहरे से साफ पढ़ा जा रहा था। अचानक पास गली जिसमें वह अपने एक एक माह के छह बच्चे छोड़ गई थी वहां से बच्चों के रोने की आवाज आई। आवाज सुनते ही उसने खड़े होने की कोशिश करी पर तीन पैर कट जाने से वहीं गिर पड़ी। पर भूखे बच्चों की पुकार सुन कर उससे रहा ना गया और अपना दर्द व जख्म भूल कर किसी तरह उसने घिसटते हुए गली तक की करीब पचास मीटर की दूरी तय की और बच्चों के पास पहुंच कर पलट कर लेट गई ताकि उसके भूखे बच्चे स्तनपान कर सकें।दो तीन बहुत ज्यादा भूखे बच्चों ने उसका थोड़ा सा दूध पिया और खेलने लगे। मैंने फिर उसके आगे पानी रखा क्योंकि अधिक खून बहने पर प्यास बहुत लगती है। पहले उसने पानी देने पर ना पिया था पर अब बच्चों को सुरक्षित देख उसने थोड़ा सा पानी पिया।

मैने वेटनरी डाक्टर को फोन कर दिया था उन्होंने आ कर उसको कुछ इंजेक्शन दिए और कहा कि इसका इलाज यहां संभव नहीं इसको किसी हायर सेंटर पर एडमिट करना होगा। फिलहाल तो उसका दर्द इंजेक्शन लगने से कम हुआ। पर एक स्ट्रीट डाग को किसी बड़े अस्पताल में बाहर सिटी में भेज पाना मेरे लिए दुरुह था।

दिन में क्लीनिक पर बैठे बैठे सिर्फ उसके ही ख्याल दिल में आते रहे कि हमारी थोड़ी सी उंगली कट जाने पर कितना दर्द होता है, उसकी तो तीन टांगे कट गईं हैं उसको कितनी पीड़ा हो रही होगी। यदि वह जीवित रही तो आगे उसका जीवन कैसा होगा बिना पैर के यदि वह मर गई तो उसके बच्चे कैसे जीवित रहेंगे? इसी ऊहापोह में अचानक एक उसकी दर्दनाक हालत पर पोस्ट लिखी और उसे #dogitization कैंपेन की एडमिन को भेज दिया।

सौभाग्य से इस पोस्ट को उन्होंने अपने पेज पर प्रकाशित कर दिया। फिर क्या था इसको पढ़ कर सैकड़ों हाथ आगे आए जो इसके इलाज के लिए धन देना चाहते थे। उन सभी की काल्स को हाथ जोड़कर मना कर दिया कि मुझे इसके इलाज के लिए धन की आवश्यकता नहीं मुझे तो कोई ऐसा एन जी ओ चाहिए जो इसको यहां से रेसिक्यू कर इसका इलाज करवाए व इसकी व इसके बच्चों की जिम्मेदारी ले ले।

देर शाम बंगलौर से विख्यात एनिमल लवर राकेश शुक्ला जी की काल आई। उन्होंने बताया कि वह इसकी व इसके बच्चों की पूरी जिम्मेदारी लेना चाहते हैं।

आनन फानन में 11अक्टूबर को एक टैक्सी गुरुग्राम के लिए बुक हुई और उसमें वह व बच्चे बैठ सीजेएस वेटनरी हास्पिटल के लिए चल दी। देर रात बारह बजे हास्पिटल पहुंचते ही उसका इलाज प्रारंभ हो गया। बच्चों को अभी वहीं की एक डॉग लवर के शेल्टर में रखा हुआ है । फीमेल डॉग की कंडीशन सेटल होते ही उसको व बच्चों को एयर लिफ्ट करा बंगलौर भेज दिया जाएगा।

इस पूरे सुखद घटनाक्रम का एक सुखद पहलू और भी है कि जिस अटेंडेंट युवा के साथ बच्चे व मां गुरुग्राम गई थी उसकी सेवा भावना को देख उसको राकेश जी के बंगलौर शेल्टर होम में स्मार्ट सेलरी के साथ job ऑफर हुई है।

चंद तस्वीरें हैं साथ में जब एक्सीडेंट हुआ उस समय वह किस हालत में धूल मिट्टी में पड़ी थी और कुछ तस्वीरें बाद की हैं जब वह फाइव स्टार सरीखे हास्पिटल में एडमिट है।

आंधियों से ना बुझा ऐसा उजाला हो जाऊं,

तू नवाजे तो जुगनू से सितारा हो जाऊं

इक बूंद हूं मुझे ऐसी फितरत दे मेरे मालिक

कोई प्यासा दिखे तो दरिया हो जाऊं।।

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