शिष्टाचार सीखें लिबरल अर्थात गेट लॉस्ट ब्लडी धिम्मीज़

श्री राम मंदिर मामले में सुन्नी वक्फ़ बोर्ड (मुसलमानों) के वकील राजीव धवन ने आज मंदिर विवाद से जुड़े दस्तावेज़ सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ के सामने ही टुकड़े-टुकड़े कर दिए और माननीय जज देखते रहे।

धवन के लिए इस तरह की हरकतें नई नहीं हैं। इससे पहले यह कई न्यायमूर्तियों के साथ तीखी बहस और अभद्र आचरण कर चुका है।

मंदिर मुद्दे में सुनवाई के दौरान लगातार इसका यही रवैया रहा है। जब दलीलें कमज़ोर हों तो सीधे जजों पर आरोप लगाए।

सोमवार को ही हुई सुनवाई में इसने आरोप लगाने के लहज़े में संविधान पीठ से कहा था कि इस मामले में सिर्फ मुसलमानों से ही सवाल पूछे जा रहे हैं और हिंदुओं से नहीं। अगले दिन इसने औरंगज़ेब की प्रशंसा में इरफान हबीब जैसों के भी रिकॉर्ड तोड़ दिए।

लेकिन हम इसे व्यक्तिगत समझने की भूल नहीं करें। राजीव धवन एक व्यक्ति नहीं बल्कि विचारधारा का प्रतिनिधि है। वो जो करता है, वह करने की हिम्मत उसे उस विचारधारा से मिलती है जो समझती है कि सिर्फ वही एक वैध और न्यायसंगत विचारधारा है, बाकी जो है वो अवैध और आपराधिक है।

तो इस ‘अवैध और आपराधिक’ विचारधारा यानी दक्षिणपंथ या रूढ़िवादियों के साथ संघर्ष में विनम्रता, शिष्टाचार व ईमानदारी जैसी चीजों को आड़े नहीं आना चाहिए। इन्हें तो बस दुरदुरा के भगा देना चाहिए।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब अमेरिका में दक्षिणपंथी विचारधारा का उभार शुरू ही हुआ था तो लियोनेल ट्रिलिंग नाम के एक विचारक ने कहा था कि रूढ़िवादी खुद को विचारों से नहीं बल्कि सिर्फ शारीरिक और चिढ़ाने वाली उन मानसिक चेष्टाओं से व्यक्त करते हैं जिसे वे विचार समझ बैठते हैं। ये किसी गंभीर विमर्श के लायक नहीं है।

इन कथित उदारवादियों के अपने विरोधियों को निपटाने के कुछ तौर-तरीके हैं। विरोधियों के प्रति आक्रामक बर्ताव, असम्मानजनक और आक्षेपों वाली भाषा और तिरस्कार। ये सारी चीजें अपने सबसे मुखर रूप में तब प्रकट होती हैं जब ये हार रहे होते हैं या हार चुके होते हैं।

तो राहुल गांधी या उसके चेले चपाटे, प्रधानमंत्री के लिए किस भाषा का प्रयोग करते हैं उसे तो छोड़िए, बिल क्लिंटन की पत्नी और ट्रंप के खिलाफ राष्ट्रपति चुनाव के दौरान खेत रहीं हिलेरी क्लिंटन से जब 2018 में एक पत्रकार ने पूछा कि आप लोग रिपब्लिकन और खास तौर से ट्रंप के खिलाफ जिस भाषा का इस्तेमाल कर रही हैं, वह कहां तक उचित है?

जवाब ऐसा था कि सुनकर हिलेरी क्लिंटन को छिछोरी क्लिंटन भी कह सकते हैं। वे कहती हैं : आप किसी ऐसी राजनीतिक पार्टी के प्रति शिष्ट कैसे हो सकते हैं जो उन सभी मूल्यों के खिलाफ है जिनके लिए हम खड़े हैं। हां, अगर हम दोबारा व्हाइट हाउस या सीनेट पर कब्ज़ा कर लें तो हम फिर से शिष्ट होना शुरू कर सकते हैं।

यहां सिर्फ भाषाई शिष्टाचार की बात नहीं है। रिपब्लिकन नेताओं और ट्रंप समर्थकों पर जानलेवा हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं, ठीक उसी तरह जैसे केरल, कर्नाटक या बंगाल में बस आरएसएस का समर्थक होना ही कत्ल कर दिए जाने के लिए काफी है। लेकिन ये सब लिंचिंग अखबारों की सुर्खियां नहीं बनतीं।

तो सत्ता से बाहर होते ही इन उदारवादियों की उदारता, सहिष्णुता का आलम ये है कि अमेरिका में अब ये रिपब्लिकन नेताओं की हत्या की कोशिशों पर उतर आए हैं। पहले बेसबॉल खेल रहे एक रिपब्लिकन जनप्रतिनिधि की हत्या की कोशिश हुई और फिर उनके प्रमुख नेता व केंटकी से सीनेटर रैंड पॉल की गला घोंटकर हत्या की कोशिश हुई।

हां जी, असहिष्णुता बढ़ रही है और क्लिंटन जैसों की मानें तो ये गालीगलौज एवं जानलेवा हमले तब तक जारी रहेंगे जब तक कि ट्रंप और मोदी जैसों को सत्ता से बाहर फेंक नहीं दिया जाता।

इसलिए भाइयों-बहनों और खासतौर से ‘लकड़बग्घों’ से अपील है क्योंकि आप हिंदू पुनर्जागरण के अश्वमेध यज्ञ में सबसे अग्रिम पंक्ति के योद्धा हैं। वामपंथियों की भाषा में कहें तो ‘किरांति’ के हरावल दस्ते। हमें प्रतिकार के रास्ते खोजने होंगे जो प्रभावी हों।

अब मज़हब की गोद में बैठे इन उदारवादियों (या धिम्मी कहना ज़्यादा सही होगा) का बहिष्कार ही नहीं तिरस्कार किया जाए। जहां भी संभव हो इन्हें दुत्कार दिया जाए। इनका मनोबल तोड़ दिया तो आधी लड़ाई जीत ली गई समझें।

गांधी के तीन बंदरों वाले ‘बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो’ वाले शिष्ट हिंदू को बदलने की ज़रूरत है। इसकी बजाय जहां भी बुरा देखो, बुरा सुनो वहां एकजुट होकर पेल दो, रेल दो।

ट्रिलिंग कह के गया था कि भक्त अपने विचार शारीरिक चेष्टाओं के माध्यम से प्रकट करते हैं। आपको अपने विचार इस तरह से प्रकट करने की सलाह नहीं दी जा सकती। लेकिन हां, जब एक पार्टी कहती है कि सत्ता छिन गई तो शिष्ट कैसे बने रहें, तो भैया शिष्टाचार निभाने का ठेका यहां भी किसने ले रखा है? गेट लॉस्ट ब्लडी धिम्मीज़।

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