2 से बढ़ कर 120 हुईं मोबाइल कंपनियों का जलवा : एक वर्ष में स्मार्टफोन का निर्यात 8 गुना बढ़ा

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कभी 2014 में देश में केवल 2 मोबाइल बनाने वाली कंपनियों की फैक्ट्री थी, जो 2015 में शुरू किये गए मेक इन इंडिया कार्यक्रम के बाद 120 कंपनियां फैक्ट्री लगा चुकी है और इसके सकारात्मक नतीजे मिले हैं.

पिछले 3 वर्ष में मोबाइल फ़ोन के आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा की राशि 350 करोड़ डॉलर (24500 करोड़ रुपये) से घट कर केवल 50 करोड़ डॉलर यानि 3500 करोड़ रुपये रह गया. निर्यात होने वाले स्मार्टफोन की संख्या सिर्फ एक वर्ष में लगभग 8 गुना बढ़ गई.

आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल – दिसंबर 2017 के दौरान मोबाइल फ़ोन का निर्यात 10.42 करोड़ डॉलर था, जो अगले वर्ष समान अवधि में 95.57 करोड़ हो गया.रूस, दक्षिण अफ्रीका, यू ए ई और चीन को फ़ोन निर्यात होने लगा.

सबसे मजे की बात इसमें ये रही कि वैसे तो चीन के उत्पाद बाजार में टिकते नहीं लेकिन मोबाइल बनाने के लिए चीनी कंपनियों ने ही सबसे ज्यादा फैक्ट्री लगाईं और उन्होंने निर्यात अपने देश में भी करना शुरू कर दिया. ज़ाहिर है चीनी कंपनियां घटिया माल नहीं बना रही होगी.

ये खबर कांग्रेस के युवराज के लिए 440 वोल्ट के झटके से कम नहीं है जो मेक इन इंडिया का मजाक उड़ाता फिरता है और जो हर शहर के मोबाइल बनाने के सपने लोगों को दिखाता फिरता है कि हम मोबाइल बनाएंगे – मेड इन भोपाल, मेड इन मंदसौर, मेड इन जयपुर, मेड इन रायपुर — कहीं के भी मोबाइल बना देता है मगर अभी तक 3 राज्यों में कोई फैक्ट्री नहीं लगाई.

दूसरी बड़ी बात हुई कि भारत में निर्मित मोबाइल का सबसे बड़ा बाज़ार यू ए ई बन गया जहाँ मोबाइल निर्यात कई गुना बढ़ा है. यही लक्ष्य था मोदी के मेक इन इंडिया कार्यक्रम का… भारत उत्पादन का हब बने और यहाँ से निर्यात हो. मोबाइल निर्यात होना इसी लक्ष्य प्राप्ति में एक कदम है.

(ये तथ्य 14 अप्रैल, 2019 के दैनिक जागरण में दिए गए थे)

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