पीएम मोदी की अलग-अलग सी दिखने वाली कार्रवाइयों में पांच वर्ष बाद दिख रहा एक पैटर्न

11 जून 2014 को लोकसभा में अपने पहले उद्बोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि “1200 साल की गुलामी की मानसि‍कता हमें परेशान कर रही है। बहुत बार, हमसे थोड़ा ऊँचा व्‍यक्‍ति‍ मि‍ले तो, सर ऊँचा करके बात करने की हमारी ताकत नहीं होती है। कभी-कभार चमड़ी का रंग भी हमें प्रभावि‍त कर देता है…”

“अब वि‍श्‍व के सामने ताकतवर देश के रूप में प्रस्‍तुत होने का समय आ गया है। हमें दुनि‍या के सामने सर ऊँचा कर, आँख में आँख मि‍ला कर, सीना तान कर, भारत के सवा सौ करोड़ नागरि‍कों के सामर्थ्य को प्रकट करने की ताकत रखनी चाहि‍ए और उसको एक एजेंडा के रूप में आगे बढ़ाना चाहि‍ए। भारत का गौरव और गरि‍मा इसके कारण बढ़ सकते हैं।”

फिर उन्होंने पूछा कि “इस देश पर सबसे पहला अधि‍कार कि‍सका है? सरकार कि‍सके लि‍ए होनी चाहि‍ए? क्‍या सरकार सिर्फ पढ़े-लि‍खे लोगों के लि‍ए हो? क्‍या सरकार सि‍र्फ इने-गि‍ने लोगों के लाभ के लि‍ए हो?”

“मेरा कहना है कि‍ सरकार गरीबों के लि‍ए होनी चाहि‍ए। अमीर को अपने बच्‍चों को पढ़ाना है तो वह दुनि‍या का कोई भी टीचर हायर कर सकता है। अमीर के घर में कोई बीमार हो गया तो सैकड़ों डॉक्‍टर आ कर खड़े हो सकते हैं, लेकि‍न गरीब कहाँ जाएगा?…”

“शासन की सारी व्‍यवस्‍थायें गरीब को सशक्‍त बनाने के लि‍ए काम आनी चाहि‍ए और सारी व्‍यवस्‍थाओं का अंति‍म नतीजा उस आखि‍री छोर पर बैठे हुए इंसान के लि‍ए काम में आए उस दि‍शा में प्रयास होगा, तब जाकर उसका कल्‍याण हम कर पाएंगे।”

पिछले वर्ष प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि “पहले के राजनीतिक दलों की सरकारों ने जनता और गरीब का भला नहीं, सिर्फ और सिर्फ अपना और अपने परिवार के सदस्‍यों का भला किया है। वोट गरीब से मांगे, वोट दलित से मांगे, वोट पिछड़ों से मांगे, उनके नाम पर सरकार बनाकर उन्‍होंने अपनी तिजोरियां भर ली इसके सिवा कुछ नहीं किया।”

“आजकल, जो कभी एक-दूसरे को देखना नहीं चाहते थे, पसंद नहीं करते थे, वो अब एकसाथ। अपने स्‍वार्थ के लिए यह सभी परिवारवादी पार्टियां मिल करके अब जनता के विकास को रोकने पर तुले हुए हैं; उन्हें सशक्‍त होने से रोकना चाहते हैं। उस अभिजात्य वर्ग को पता है कि अगर गरीब, किसान, दलित, पिछड़े सशक्‍त हो गए तो उनकी दुकानें हमेशा के लिए बंद हो जाएगी।”

प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि “गरीबी हटाने की जो पहले सिर्फ बातें और नारे होते थे, उन्होंने उस कल्चर या संस्कृति को पीछे छोड़ दिया है। देश के गरीब का जीवन ऊपर उठाने के लिए सशक्तिकरण को टूल या औज़ार बनाया गया है। सशक्तिकरण चाहे समाज के कमजोर वर्गो का हो या फिर महिलाओं का, ‘सबका साथ-सबका विकास’ का मूल मंत्र सच्चाई में बदल रहा है।”

फिर उन्होंने कहा कि “यह सब महज़ रिफार्म नहीं है. यह ट्रांसफॉर्मेशन (समग्र परिवर्तन) है। और हमारा संकल्प है कि हम भारत को ट्रांसफॉर्म करके रहेंगे।”

आख़िरकार प्रधानमंत्री मोदी राजनैतिक खतरा मोलकर कैशलेस इकॉनमी, GST, आधार, जन-धन अकाउंट, दिवालिया कानून इत्यादि क्यों लेकर आये है? क्यों उन्होंने विश्व के प्रमुख देशों, जिसमें खाड़ी के देश, इज़राइल, चीन, जापान, इत्यादि शामिल हैं, की यात्रा की, उनके राष्ट्र प्रमुखों को भारत बुलाया? क्यों संयुक्त राष्ट्र महासभा से अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव पास करवाया? क्या वे केवल योग को बढावा देना देना चाहते थे?

लगभग पांच वर्ष के बाद मैं उनकी अलग-अलग सी दिखने वाली कार्रवाई और उनकी ‘मानसिकता’ में एक पैटर्न देख रहा हूँ।

प्रथम, प्रधानमंत्री मोदी गरीबों, कमज़ोर और मध्यम वर्ग का आर्थिक सशक्तिकरण कर रहे हैं, क्योकि बिना सशक्तिकरण के, उनका समग्र विकास संभव नहीं है। यह कार्य जन-धन, उज्जवला, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, स्वच्छता, सभी के लिए घर, टॉयलेट और बिजली, आयुष्मान, मुद्रा, इत्यादि के द्वारा किया जा रहा है।

द्वितीय, वे भारत के अभिजात्य वर्ग का रचनात्मक विनाश कर रहे हैं। क्योंकि बिना पुरानी व्यवस्था को बदले नए समाज, नयी व्यवस्था, नए उद्यम और रोज़गार का सृजन नहीं हो सकता।

तृतीय, वे भारत को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था को आज के डिजिटल युग का मुकाबला करने के लिए तैयार कर रहे हैं। सैमसंग और आईफ़ोन का भारत में बनना इसी प्रगति की दिशा में एक मज़बूत कदम है।

लेकिन यह सब करने के लिए राष्ट्र के भीतर बैठी भारत तोड़क शक्तियों को हराना होगा, जो प्रधानमंत्री मोदी को जातिवादी समीकरणों से हराने का प्रयास कर रही हैं, क्योकि ‘सांप्रदायिक शक्तियां’ ऑलरेडी विपक्ष के साथ हैं।

कृपया मतदान अवश्य करें।

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