मनुष्य को सक्रिय रखती है वित्तैषणा

पहले सारा अन्न खा लो,

फिर बीज भी खा लो,

बताइये… नया अन्न मिलेगा?

पहले सारी गाय भैंस खत्म कर दो,

बताइये… दूध मिलेगा?

कोई दुकानदार सारा माल उधार दे दे,

बताइये… नया माल आएगा?

धन एक प्रेरणा है।

वित्तैषणा मनुष्य को सक्रिय रखती है।

यह स्वभाव जब बना रहता है…

वह उद्यमी बनता है। पुरुषार्थ करता है। उसे फिट और तंदुरुस्त रखता है। संघर्ष की क्षमता जगती है।

ऑस्ट्रेलिया के मूलनिवासी वहाँ की सरकार से एक नियमित भत्ता पाते हैं।

वे उससे शराब पीकर मस्त पड़े रहते हैं। सुस्ती में ज़िंदगी गुज़ार देते हैं।

ऑस्ट्रेलिया की मुख्यधारा के सभी लोग यूरोपीय हैं। उन्हें कोई भत्ता नहीं मिलता, मगर आने वाली कई पीढ़ियों तक वे ही राज करेंगे।

क्योंकि संसाधनों से भरे इस महाद्वीप के मूलनिवासी मुफ्तखोरी में पंगु हो चुके हैं।

मुफ्तखोरी का यह एक पहलू है।

अब एक दूसरा पहलू…

आज तक एक भी मुफ्तखोरी की योजना का सीधा सटीक लाभ, 100% किसी को नहीं मिला।

प्रत्येक योजना ‘भोमिया जी के लिए बकरा कटने’ जैसी होती है।

नाम भोमिया का, मगर बोटी सबको मिलती है।

ऊपर से नीचे तक, सबको हिस्सा बंटेगा तभी राशि जारी होगी।

तीसरी बात…

कुछ लोग कमाते रहेंगे, तभी तो शेष लोग खाएंगे।

पूरे देश में, 72 हज़ार नहीं, मान लीजिए 72 करोड़ रुपए भी जेब में लेकर घूमते रहें, और करें कोई कुछ नहीं, प्रोडक्शन बन्द है, ईर्ष्या चरम पर है, तो धन आभासी बन जाता है।

यह वैसी ही स्थिति है, जैसे कोई प्यास से मर रहा है और उसकी जेब में एक लाख पानी की बोतलों का बिल है।

बोतल है नहीं, बिल है।

वस्तु की भौतिक उपलब्धि के बिना, मात्र आंकड़ों और संख्याओं से कभी आपूर्ति नहीं होती।

अर्थशास्त्र के सामान्य नियम पर आधारित।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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