श्री यन्त्र और श्री विद्या त्रिपुर सुंदरी

श्रीयंत्र को यंत्रराज भी कहा जाता है। मंत्रों में गायत्री मंत्र को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है तो यंत्रों में श्रीयंत्र को सर्वोत्तम माना जाता है। भगवती त्रिपुरसुंदरी की साधना (श्रीयंत्र साधना) सर्वोच्च और सर्वश्रेष्ठ साधना है। अनेक साधकों, गृहस्थों, संन्यासियों ने खुले हृदय से स्वीकार किया है कि यह साधना कलियुग में कामधेनु के समान है। यह एक ऐसी साधना है, जो साधक को पूर्ण मान-सम्मान और प्रतिष्ठा दिलाती है।

भगवती त्रिपुरसुंदरी की उपासना श्रीयंत्र में की जाती है, जिसे श्रीचक्र भी कहा जाता है। यह श्रीयंत्र अथवा श्रीचक्र भगवान शिव और माँ शिवा दोनों का शरीर है, जिसमें ब्रह्मांड और पिंडांड की ऐक्यता है।

एक बार जब भगवान ने सभी मंत्रों को दैत्यों द्वारा दुरुपयोग से बचाने के लिए कीलित कर दिया था, तब महर्षि दत्तात्रेय ने ज्यामितीय कला के द्वारा वृत्त, त्रिकोण, चाप अर्धवृत्त, चतुष्कोण आदि को आधार बनाकर बीज मंत्रों से इष्ट शक्तियों की पूजा हेतु यंत्रों का आविष्कार किया। इसलिए महर्षि दत्तात्रेय को श्रीविद्या एवं श्रीयंत्र का जनक कहा जाता है। यह विश्व ही श्री विद्या का गृह है।

त्रिपुरसुंदरी चक्र ब्रह्मांडाकार है। इस यंत्र की रचना दो त्रिकोणों की परस्पर संधि से होती है, जो एक दूसरे से मिले रहते हैं। इससे ब्रह्मांड में पिंड का और पिंडांड में ब्रह्मांड का ज्ञान होता है। यह यंत्र शिव और शक्ति की एकात्मता को भी प्रदर्शित करता है।

सही शब्दों में यंत्र-पूजा देव शक्ति को आबद्ध करने का सर्वोत्तम आधार है, जिसमें श्रीयंत्र पूर्णतः सफल है। एक स्थान पर स्वयं भगवान आद्य शंकराचार्य ने कहा है कि ‘मेरे संपूर्ण साधना-जीवन का सारांश यह है कि संसार की समस्त साधनाओं में त्रिपुरसुंदरी साधना स्वयं में पूर्ण है, अलौकिक है, अद्वितीय है और आश्चर्यजनक रूप से सिद्धि प्रदान करने वाली है।’ श्रीयंत्र की साधना किसी भी आयु, वर्ग अथवा जाति का साधक कर सकता है।

श्रीयंत्र के संबंध में आवश्यक सावधानियां :-

श्रीयंत्र प्राप्त करते समय एवं पूजन के संबंध में साधकों को निम्नलिखित कुछ विशिष्ट बातों का ध्यान रखना चाहिए।

श्रीयंत्र पूर्णतः शुद्ध एवं प्रामाणिक होना चाहिए। यदि श्रीयंत्र किसी धातु-पत्र पर बना हो तो वह उत्कीर्ण अथवा धंसी हुई रेखाओं में नहीं, बल्कि उभरी हुई रेखाओं में हो।
यदि वह मणि, अथवा शिला का बना हो और मेरु आकार का हो तो उसके कोण सही प्रकार से बने हों और वे खंडित अथवा संख्या में कम या अधिक न हों। उनकी संख्या 49 होनी चाहिए।
यंत्र किसी योग्य व्यक्ति द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित होना चाहिए। श्रीयंत्र को सिद्ध करने के पहले योग्य गुरु से दीक्षा प्राप्त कर लेनी चाहिए। यदि साधक जप करने की स्थिति में न हो तो श्रीयंत्र के समक्ष केवल प्रार्थना, आरती अथवा स्तोत्र पाठ करें।
साधना समर्पित भाव से करनी चाहिए। यंत्र की स्थापना के बाद प्रतिदिन उसका अभिषेक व पूजन आवश्यक है। अभिषेक यदि न भी कर सकें तो पूजन अवश्य करें। श्री यंत्र के मुख्य तीन रूप होते हैं।

भूपृष्ठ :- जो यंत्र समतल होता है, उसे भूपृष्ठ कहते हैं। यह स्वर्ण, रजत अथवा ताम्रपत्र पर बनाया जाता है। इसे भोजपत्र पर भी बनाया जा सकता है, परंतु इसकी निर्माण प्रक्रिया अत्यंत क्लिष्ट होने के कारण सामान्यतः इसे बना- बनाया ही प्राप्त किया जाता है।

कच्छप-पृष्ठ :- जो श्रीयंत्र मध्य में कछुए की पीठ के समान उभरा हुआ हो उसे कच्छप-पृष्ठ कहा जाता है।

मेरु पृष्ठ :- जिस श्रीयंत्र की बनावट सुमेरु पर्वत की आकृति में हो, उसे मेरु पृष्ठ कहा जाता है।

स्फटिक मणि से बने यंत्र अधिकांशतः मेरु पृष्ठकार होते हैं। स्फटिक से बने श्रीयंत्र की एक विशिष्टता है कि जिस समय साधक आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण होता है उस समय उसके शरीर से बाहर प्रवाहित होने वाली ऊर्जा को यह स्वयं में समाहित कर लेता है। परंतु इसके लिए यह अत्यंत ही आवश्यक है कि पूजा-स्थल में रखा हुआ श्रीयंत्र पूर्णतः प्राण प्रतिष्ठित और चैतन्य हो। साथ ही उसके कोण आदि निर्धारित संख्या में और समान आकार में हों। श्रीयंत्र वास्तव में श्री अर्थात् लक्ष्मी का निवास स्थान है। जहाँ श्रीयंत्र की स्थापना नियमानुसार होती है वहाँ लक्ष्मी का वास होता है।

श्रीयंत्र की स्वामिनी भगवती ललिता की उपासना के लिए दीक्षा एक अनिवार्य शर्त है, परंतु यदि कोई योग्य गुरु न मिलें तो श्रीयंत्र की पूजा श्रद्धा और विश्वासपूर्वक जन सामान्य भी कर सकते हैं। इससे सुख-समृद्धि के साथ-साथ मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग भी स्वतः ही खुलने लगता है। भगवती ललितांबा शक्ति संपन्न वैष्णवी शक्ति हैं, वे ही विश्व की कारण भूता परामाया हैं, भोग और मोक्ष की दाता हैं और संपूर्ण जगत को मोहित किए हुए हैं।

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