माँ बगुलामुखी : स्वर्ण रंग की दुल्हन का स्वर्णिम आशीर्वाद

हाल ही में एक सफ़र से लौट रही थी, ट्रेन में ही थी फिर भी स्वामी ध्यान विनय का सन्देश आया – दतिया में माँ पीताम्बरी मिलेगी, उनसे कह देना मन की बात.. सन्देश को आदेश रूप में ग्रहण किया, खुद नमन किया साथ ही फेसबुक पर उसी समय जो विचार उपन्न हुआ उसे स्टेटस के रूप में डाला –

सृष्टि की स्वर्णिम नियमावलियों के लिए, कभी कभी समाज के मिट्टी के नियम ध्वस्त करना पड़ते हैं.
– (ट्रेन में दतिया से गुज़रते हुए मां पीताम्बरा से प्राप्त आशीर्वाद संदेश)

बहुतों के मन में ख़याल आता है अक्सर मज़ाक में कह भी देते हैं, दो दिन के अपने व्यक्तिगत कार्य पर की गयी यात्रा का वर्णन ऐसे करती हो जैसे किसी महान तीर्थयात्रा पर निकली हो और यात्रा वृतांत सुनाकर पाठकों को भी कृतार्थ करती हो.

मैं अक्सर जवाब नहीं देती, क्योंकि मैं जानती हूँ जिस स्तर पर मैं जीती हूँ वो एक माध्यम है जहां से कुछ तरंगों पर सवार सन्देश मेरे द्वारा उन लोगों तक पहुँचाया जाता है जो इस यात्रा के सहयात्री हैं… चंद मुट्ठी भर लोग… लेकिन ये मुट्ठी भर लोग ही हैं जो माध्यम बनकर उन तरंगों को आगे की यात्रा करवाते हैं. इसे मेरी आत्म-मुग्धता न समझें बल्कि मैं तो मात्र उपकरण हूँ इस ब्रह्माण्ड की प्रयोगशाला की.

इसलिए अक्सर कहती हूँ अपनी यात्रा को केवल अपनी मत समझिये, हम अभी इतने महान नहीं हुए हैं कि परमात्मा की रचित इस सृष्टि से परे अपने”मैं” का वर्चस्व कायम कर सके. छोटी छोटी यात्राओं के वर्णन के पीछे मेरा एक ही उद्देश्य होता है कि न जाने इस यात्रा से गुज़रते हुए कौन सी पगडंडी किस भटके हुए को मेरी तरह राह दिखा दे.

पिछले साल फरवरी में मेरे दो दिनों की इंदौर यात्रा पर बहुत सारे लोगों ने मज़ाक बनाया था, कि आप अपनी व्यक्तिगत यात्रा को इतना विस्तार देकर कैसे सार्वजनिक कर सकती हैं.

एक मित्र तो इनबॉक्स में इतना अधिक क्रोधित हो गया था कि मेरे पास उसे कुछ दिन के लिए ब्लॉक करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था. लेकिन मैंने उसे समय दिया है हम बात करेंगे एक बार फिर इस विषय पर ठीक सात साल, सात महीने और सात दिन बाद ताकि इस बीच वो मित्र अपने अनुभव की और मेरे अनुभवों को समझने की यात्रा तय कर चुका हो.

इंदौर-यात्रा के वर्णन के दौरान कई लोग ऐसे मिले जिन्होंने कहा आपने हमारा बचपन हमारे सामने एक बार फिर जीवित कर दिया, ऐसा लग रहा है आप हमारी ही कहानी बयान कर रही हैं.

ये तो बहुत सामान्य बात हुई, एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना उस यात्रा के वर्णन के दौरान घटित हुई वो बताना चाहूंगी.

मेरी इंदौर यात्रा को पढ़ते हुए फेसबुक पर एक महिला (जो मेरी मित्र नहीं थीं) ने जाना कि मैं इंदौर के मोती तबेला क्षेत्र में रहती थीं. उनका मेरे पास एक सन्देश आया – आप मोती तबेला में रह चुकी हैं, मेरी एक सखी भी वहीं रहती थी, हम बचपन में बहुत अच्छी सखियाँ थीं, समय के साथ हम बिछड़ गए, 30 साल हो गए हैं. आपकी सूरत देखी तो लगा जैसे आप वही है, आपके “जादू” पर मुझे यकीन हो चला है, मुझे पता नहीं क्यों लगता है आप उसे खोज निकालेंगी.

उस महिला ने अपनी सखी का जो नाम बताया उसे पढ़कर मुझे वही ख्याल आया जो अक्सर ऐसे मौकों पर आता है… “जिनको जिनको भी मिलना है लिखा इश्क़ मिलावाएगा..” मैंने कहा जिसे आप खोज रही हैं वो मेरी बुआ ही है. विवाह उपरान्त गुजरात में रहती हैं.

और उनका प्रेम देखिये मुझसे फोन नम्बर लेकर सपरिवार इंदौर से गुजरात का सफ़र तय कर बुआ से मिल आई, उनके साथ फोटो खींच मुझे भेजे. पूरे तीस साल बाद दो सखियाँ मिलीं मेरी मात्र दो दिन की इंदौर यात्रा के विस्तारपूर्वक वर्णन के कारण.

जिस उद्देश्य से यात्रा वर्णन लिखवाया गया, वो पूरा हुआ और मैं एक बार फिर प्रकृति के रहस्यों के प्रति कृतज्ञ. आज वो महिला मेरी सखी है, हम लगातार संपर्क में नहीं रहते लेकिन जब भी एक दूसरे को याद करते हैं, फेसबुक पर किसी न किसी बहाने से टकरा ही जाते हैं.

जैसे एक दिन मैं अपनी पिछले दिनों की यात्रा को याद करते हुए माँ पीताम्बरा (मां बगुलामुखी) का स्मरण कर रही थी और सामने उसी सखी का फोटो देखा माँ बगुला देवी के मंदिर में दर्शन करती हुई.

मैं हमेशा कहती हूँ हर युग की भौतिकता उसकी आध्यात्मिकता से जुड़ जाती है. फेसबुक बाकी सबके लिए मात्र संवाद और संचार का माध्यम होगा लेकिन मेरे लिए यह भी एक ज़रिया है लोगों से तार जोड़कर कुछ विशेष तरंगों पर यात्रा करवाने का जिसके वो यात्री बनना चाहते हैं.

सच कहूं पिछली यात्रा से पहले मैं जानती भी नहीं थी कि दतिया में माँ पीताम्बरा (मां बगुलामुखी) का ऐसा कोई मंदिर भी है, वो तो स्वामी ध्यान विनय ने सन्देश दिया तो जाना, और इसीलिए ये कहा कि उनका सन्देश भी मैं आदेश की तरह ग्रहण करती हूँ. न जाने भविष्य के गर्भ में उनकी कौन सी बात का क्या रहस्य छुपा हो.

तो बात एक और यात्रा की – उसी तरह ट्रेन में सफ़र कर रही थी, एक जगह से ट्रेन गुज़र रही थी, नाम मुझे याद नहीं तो सामने ऊंचाई पर था लम्बी सी सीढ़ी पारकर बना एक मंदिर. उन दिनों मानस माँ अमृता प्रीतम की कहानी “कोई नहीं जानता” पढ़ रही थी. उस कहानी में दतिया गाँव और वहां के लोगों की आस्था का ज़िक्र था.

जैसा अक्सर होता है, बात चाहे एमी माँ की हो या शक्ति स्वरूपा माँ की मन में हमेशा समर्पण और आस्था का फूल खिल उठता है. ट्रेन में बैठे बैठे ही मैंने उस मंदिर पर विराजमान शक्ति को नमन किया और सोचा एक फोटो लेने की कोशिश करती हूँ.

मैंने कम से कम आठ दस फोटो लिए लेकिन हर बार उस फोटो में एक दीये की ज्योत प्रकट हुई. पहले मुझे लगा शायद कहीं से लाइट का रिफ्लेक्शन आ रहा होगा, लेकिन धूप कहीं नहीं थी, और चलती ट्रेन के साथ उस प्रकाश किरण की दिशा नहीं बदली और हर बार वो ज्योत मेरे साथ जलती रही… प्रमाण आपके सामने हैं.

Ma Pitambara datiya Bagulamukhi
Ma Pitambari

मां बगुलामुखी से सम्बंधित जो जानकारी मुझे प्राप्त हुईं, जो मेरे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है वो मैं आप सबसे भी साझा कर रही हूँ…

मां बगलामुखी आठवीं महाविद्या हैं. इनका प्राकट्य स्थल गुजरात के सौरापट क्षेत्र में माना जाता है.

हल्दी रंग के जल से इनका प्रकट होना बताया जाता है, इसलिए इन्हें पीताम्बरा देवी भी कहते हैं.

इनके कई स्वरूप हैं. इस महाविद्या की उपासना रात्रि काल में करने से विशेष सिद्धि की प्राप्ति होती है.

इनके भैरव महाकाल हैं. (और भैरव बाबा की मुझ पर विशेष कृपा रही है.)

माँ बगलामुखी स्तंभव शक्ति की अधिष्ठात्री हैं अर्थात यह अपने भक्तों के भय को दूर करके शत्रुओं और उनके बुरी शक्तियों का नाश करती हैं.

यह स्तम्भन की देवी हैं, संपूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश हैं.

शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद में विजय के लिए इनकी उपासना की जाती है.
बगला शब्द संस्कृत भाषा के वल्गा का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है “दुल्हन”. मां के अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण ही इन्हें यह नाम प्राप्त है.

पीताम्बरा का प्रसिद्ध मंदिर मध्यप्रदेश के दतिया, नलखेड़ा (जिला-शाजापुर) और आसाम के कामाख्या में हैं.

(नलखेड़ा की पीताम्बरी देवी के चित्र के लिए प्रीति पाठक को आभार)

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