शांतता ! नाटक चालू आहे…

रंगमंच एक संपूर्ण का कला…. संपूर्ण इसलिए क्योंकि जहां अन्य सभी कलाएं द्वि-आयामी हैं, वहीं अभिनय बहु-आयामी… वो सब कुछ जो मनुष्य की कल्पना में आ सकता है, वो यहां संभाव्य है।

सीधे शब्दों में कहें तो यहां 20/30 के मंच पर संसार रचा जा सकता है। जो पर्दे पर चमकने वाली छायाओं का झूठ नहीं, सांस लेते जीवंत मानव पिण्डों की अभिव्यक्ति का सत्य है। जो आदि है, अनंत है, जो त्वरित संवाद और प्रतिक्रिया का सबसे उत्कृष्ट माध्यम है, वही रंगमंच है…

भारतीय वाङ्मय के अनुसार लगभग 5000 वर्षों की यात्रा कर आज रंगमंच वहां आ खड़ा हुआ है, जहां सुविधा के रंगमंच और दुविधा के रंगमंच का अंतर स्पष्ट देखा जा सकता है। यूँ भी भारतीय रंगमंच संक्रमण और परिवर्तन की लंबी प्रक्रिया का साक्षी रहा है।

देव भाषा संस्कृत से होकर अपभ्रंश, हिंदी और आज की हिंग्लिश तक, भास, भवभूति, हर्ष और कालिदास से होकर धर्मवीर भारती, मोहन राकेश और बादल सरकार तक, अंधा युग, आषाढ़ का एक दिन और पगला घोड़ा से होकर सखाराम बाईंडर, हयवदन और विजाइना स्टोरीज़ तक, क्या-क्या नहीं देखा रंगमंच ने और पता नहीं अभी और क्या-क्या देखना शेष है।

खैर! लगभग हर कालखंड में रंगमंच की मृत्यु की घोषणा की गई, औरंगज़ेबी कालखंड में तो बाकायदा अर्थी निकाली गई और मान लिया गया कि अब रंगमंच लगभग मर चुका है। पर मृतप्राय रंगमंच फिनिक्स पक्षी की तरह अपनी ही राख से पुनर्जीवित होने की कला जानता है।

वह जीवंत था, जीवंत है और जीवंत ही रहेगा इस पर संदेह का कोई कारण नहीं… पर चिंता इस बात की है कि अगर वो जीवित रहेगा तो उसका वास्तविक स्वरूप क्या होगा? हाल के दिनों में नाटक को जिस तरह से सिनेमाई रंग देने की कोशिशें तेज़ हुई हैं वो चिंताजनक है। बड़े-बड़े सेट, बहुकोणीय रंगीन प्रकाश, महंगी पोशाकें, उम्दा मेकअप, महंगे सोफे, दो मंजिले मकान, चांद – सूरज, नदी, पर्वत और न जाने क्या-क्या?

सीधे शब्दों में कहें तो अभिनय और विषय वस्तु को छोड़कर बाकी सब कुछ…. पर जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मेरे लिए रंगमंच अभिनेता और दर्शक के बीच उपजे विश्वास का नाम है। जहां हम मंच पर सिर्फ एक दीवार दिखाते हैं, शेष तीन दीवारों और छत की कल्पना दर्शक स्वयं करता है। जहां अभिनेता मंच के चार चक्कर लगाते हैं और दर्शक मान लेता है कि वो एक लंबी यात्रा पूरी कर आए हैं।

खाली कुएं में पानी की संभावना, मंच पर पत्थर रखकर बनाई गई नदी और खिड़की से दिखाए गए पहाड़ की कल्पना, दर्शक स्वयं करता है। दरअसल रंगमंच अभिनेता और दर्शक की कल्पनाशीलता का मूर्त चित्रण है। ये वास्तविकता का भ्रम नहीं, अपितु संपूर्ण वास्तविकता है।

सुप्रसिद्ध नाटककार रतन थियम से किसी पत्रकार ने पूछा था कि आप फिल्में क्यों नहीं करते? नाटक ही क्यों करते हैं? तो उन्होंने कहा था कि किसी फिल्म में जब नायक…नायिका से कहता है कि वो देखो आसमान में कितना सुंदर चांद खिला है… फ़ौरन कैमरा घूमता है और दर्शकों को पर्दे पर एक बड़ा सा गोल चांद नज़र आता है। पर जब यही घटना नाटक में घटती है, तो नायक… नायिका को विंग्स की ओर इशारा करते हुए कहता है, देखो आसमान में कितना सुंदर चांद खिला है। सब जानते हैं वहां कुछ नहीं है, पर प्रेक्षागृह में बैठे हर दर्शक के मन में उसकी अपनी कल्पना का चांद उभरता है।

दरअसल मैं दर्शक को उसकी अपनी कल्पना का चांद दिखाने के लिए नाटक करता हूं। ये सच है कि ये असुविधा, ये कष्ट, ये अभाव ही रंगमंच… को जीवंत बनाए रखते हैं। जहां आज भी चार टिफिन में पंद्रह लोग खा सकते हैं, जहां दो वक्त की काली चाय पर पूरा दिन निकाला जा सकता है।

एक स्क्रिप्ट से दो लोग काम चलाते हैं, कुल जमा बात सिर्फ इतनी है कि हम इस छोटे से मंच की सीमाएं जानते हैं पर हम खुश हैं इस संसार में… जहां कुछ भी असीमित नहीं है पर जितना भी है रंगमंच के लिए बहुत है। हम जूझते आए हैं, जूझते रहेंगे, जिंदा रहेंगे, क्योंकि हम जानते हैं रंगमंच के लिए किसी भी कालखंड में परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहीं, पर रंगमंच जीवित रहा है और जीवित रहेगा… मंच बदलता रहेगा, पात्र बदलते रहेंगे, पर जो चीज स्थाई है और स्थाई रहेगी वो है रंगमंच…. इसलिए शांति बनाए रखिए क्यों नाटक जारी है।

आप सभी को विश्व रंगमंच दिवस की अशेष शुभकामनाएँ।

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