काफ़ी होगा हमारा एक बार भी सड़क पर उतरना

मोदी सरकार के खिलाफ सिर्फ राजनीतिक पार्टियां नहीं हैं। दरअसल ये निहित स्वार्थी तत्वों का महागठबंधन है और बहुत सी पार्टियां तो बस इनका मुखौटा हैं जिन्हें पर्दे के पीछे से ये चला रहे हैं।

ये बहुत शक्तिशाली हैं। इन्हें फलने फूलने के लिए एक उर्वर, अनुकूल माहौल की ज़रूरत होती है। केंद्रीय सत्ता अगर कमजोर हो तो यह इनके लिए सबसे अनुकूल होता है। जैसे 2004 -14 के बीच सोनिया राज इनका स्वर्ण काल था। मुल्ला, मिशनरी, मार्क्स जैसे निहित स्वार्थी तत्वों ने बहती गंगा में हाथ धोया। मुल्ला-मुजाहिदीन ने रोज बम फोड़े, चर्च को धर्मांतरण की खुली छूट मिली और स्कूल-कॉलेज के नाम पर प्राइम लोकेशन पर ज़मीनें। मार्क्स तो खैर सुपर कैबिनेट नेशनल एडवाइज़री कमेटी ही चला रहे थे। बाकी देश का होनहार किसान रॉबर्ट हर जगह ज़मीन खरीद कर हल चला रहा था।

अब एक शक्तिशाली हिंदू राष्ट्रवादी सरकार से इन्हें अपने अस्तित्व को खतरा दिख रहा है। गुमराह युवा यानी मुल्ला मुजाहिदीन अब बेरोज़गार हो चुके हैं, मिशनरी को फंडिंग और धर्मांतरण के लिए मिले चंदे का हिसाब देना पड़ रहा है और मार्क्स अब पूरी तरह अप्रासंगिक होने के कगार पर हैं। सत्ता के गलियारों में विचरण करने वाले चाटुकार नौकरशाहों, पत्तलकारों को अब कोई पूछ नहीं रहा। भविष्य की कोई उम्मीद भी नहीं है। इसलिए अब ये चुप कैसे बैठें।

लिहाज़ा ये देश रहे ना रहे, ये सरकार जानी चाहिए। सरकार गिराने के लिए, ये देश फूंकने को तैयार हैं। इसलिए अब ये सारे एक प्लेटफॉर्म पर हैं। मोदी को हटाने के लिए सब साथ हैं। इसीलिए आप शाहीन बाग में खालिस्तानियों, वामियों, पुरानी सत्ता के तलवे चाटने वाले पूर्व नौकरशाहों, पत्तलकारों को एक साथ पाते हैं।

पीएफआई और एसडीपीआई भी थी वहां जिसका समर्थन राहुल गांधी को वायनाड से जिताकर संसद पहुंचाने के लिए ज़रूरी है। अमेठी से दुत्कारे जा चुके हैं शहज़ादे। ऐसे में कांग्रेस का हाथ जिहाद के समर्थन में ही रहेगा। फिर वही गिरोह सिंघू बार्डर पर जुट जाता है। शाहीन बाग की परिणिति भी दिल्ली फूंककर हुई और खालिस्तानी आंदोलन ने भी दिल्ली को जलाया। दोनों बार निहित स्वार्थी तत्वों का महागठबंधन जीता।

लिखकर रख लें। अगली बार ये किसी और चोले में आएंगे और दिल्ली फिर जलेगी। ये सिलसिला तब तक बंद नहीं होगा जब तक कि हिंदू जिसका ये देश है और जिसका हित भारत की मज़बूती में है, उठकर खड़ा नहीं होता और ये नहीं कहता कि बस बहुत हुआ, अब जवाबी कार्रवाई बहुत तीखी होगी।

मोदी हज़ारों की भीड़ पर गोली नहीं चलवा सकते। अपना देश बचाना है तो प्रत्युत्तर के लिए हमें भी कभी लाखों की संख्या में सड़क पर उतरना होगा। हम एक बार भी उतर गए तो काफी होगा। कहते हैं न कि भय बिन होत न प्रीत।

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