पाकिस्तान में अपमानित क्यों हैं ‘मुहाजिर’

मुहाजिर वो है जो मज़हब का संदेश फैलाने – उसे अन्यत्र याने ऑफ कोर्स गैर मज़हबी मुल्कों में स्थापित करने के लिए हिजरत करता है। इसमें यह अभिप्रेत है कि व्यक्ति मज़हब के खातिर अपने कंफर्ट ज़ोन से उठाकर जाएगा, यात्रा में भी तकलीफ़ें सहेगा, और जहां जाएगा वहाँ भी तकलीफ़ें सहेगा लेकिन मज़हब को स्थापित करेगा।

कम से कम उसकी स्थापना के लिए खुद को खपाएगा भले ही खुद स्थापन कर सके या नहीं। भले ही और स्थापित कर जाये, लेकिन नींव इसकी डली होगी या नींव की भी शुरुआत इसने की होगी।

हर कोशिश ‘सातवीं मंज़िल’ के बही-खाते में लिखी जाती है, आप की कोशिश की sincerity लिखने वाला जानता है। उसके सामने कोई बहाना नहीं चलता। यह ज़रूरी नहीं है कि आप सफल हुए, आप ने शुरुआत की, या किसी और ने की तो आप ने और बढ़ा दी, हर कोशिश का हिसाब रक्खा जाता है और कोई भी sincere कोशिश दूसरे से कमतर नहीं मानी जाती। ये मुहाजिर होता है।

ये मान्यता है, जिसको इसे सत्य मानना है कि मरने के बाद आदमी के साथ ऐसा ही होता है, माने, हम उस सत्य की बात करेंगे कि पाकिस्तान में ‘मुहाजिर’ अपमानित क्यों हैं।

पाकिस्तान तो इस्लामी हुकूमत है, ये अगर भारत से वहाँ जाये तो क्या खाक मुहाजिर कहलाने के हकदार होंगे? ये लोग दूसरे का लूटकर बांटने में मानते हैं शुरू से ही, खुद का जो है उसमें उनको हिस्सेदारी नहीं चाहिए। कुवैत, सऊदी, क़तर, इराक या सीरिया या अफगान शरणार्थी नहीं लेते, लेकिन उनको यूरोप जाने के लिए या वहाँ रहने के लिए पैसे देते हैं। यूरोपीय अमेरिकी मीडिया द्वारा आवाज़ उठाते हैं कि उन्हें शरण दो, उन्हें बर्दाश्त करो। वे तुम्हें बर्बाद कर रहे हैं उसकी बात मत करो वरना हम तुम्हें रेसिस्ट कहेंगे।

अस्तु, पाकिस्तान में इन्हें कौन मुहाजिर कहेगा? एक पाकिस्तानी के लिए तो भारत में घुसपैठ करनेवाला अवैध बांग्लादेशी या रोहिंग्या मुहाजिर हैं, भारत से पाकिस्तान आने वाले मज़हबी मुहाजिर नहीं हो सकते। लेकिन ये तो खुद की पहचान मुहाजिर ही बताते रहे तो पाकिस्तानियों ने मुहाजिर शब्द को ही हेय, गाली सा बना दिया।

मज़हबियों की यह बात समझने लायक है। अपने मुल्कों में तो मज़हब के शुरुआती दिनों की मस्जिदें, कब्रिस्तान भी तोड़ दिये हैं क्योंकि उन जगहों के लिए कोई और उपयोग सूझ आया। लेकिन वही लोग भारत में एक खंडहर बनी मस्जिद भी तोड़ने पर वर्ल्डवाइड मातम मनाते हैं। क्यों, यह भी समझने लायक है। वैसे सभी समझ रहे ही हैं। मुहाजिर शब्द सम्मानयोग्य था इसे भी तुरंत गाली बना दिया, उसकी आड़ नहीं लेने दी।

लेकिन यहाँ ये कुछ भी कहें या करें, कुछ सुनाये जाने पर ‘हमारी देशभक्ति की कसौटी ली जा रही है या अब हमें देशभक्ति का सर्टिफिकेट दिखाना पड़ेगा’ के ताने सुना देते हैं।

दो टूक बात हो यही अच्छा होगा। फिजूल या फर्जी लिहाज ठीक नहीं।

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